आईये आज आपको चार्वाक के बारे में कुछ बताएं !

भारतीय दर्शनशास्त्री चार्वाक और उनके दर्शन से परिचय कराता लेख।

चार्वाक के बारे में और यहाँ? लोग सहज ही सवाल उठायेगें! स्पष्ट कर दूं यह ब्लॉग महज विज्ञान की परिभाषाओं, गणनाओं और क्रियाविधियों के बारे में ही नहीं है- यह ब्लॉग है वैज्ञानिक दृष्टि और विज्ञान संचार का भी। मैं चार्वाक को भारत के आदि विज्ञान संचारकों में मानता हूँ। वे मुझे वृह्स्पति, विश्वामित्र की परम्परा में ही लगते हैं और शंकराचार्य भी उन्ही की चिंतन परम्परा में आये। बृहस्पति, विश्वामित्र और शंकराचार्य के बारे में फिर कभी।

आज तो आपको चार्वाक के बारे में बताने की इच्छा हो आई है। हमारी प्राचीन दुनिया में विज्ञान का कोई विशेषीकृत स्वरुप तो था नहीं-प्रौद्योगिकीय उन्नति भी कोई खास नहीं थी। मगर मनुष्य के साथ उसकी तार्किक क्षमता तो सदैव रही है- ऐसे ही एक तार्किक और विचारशील मनीषी थे चार्वाक, एक समर्पित विज्ञान संचारक!

उन्होंने कहा था-
1- जो प्रत्यक्ष है वही प्रमाण है.
2- आत्मा का देह से पृथक कोई अस्तित्व नहीं है (चैतन्य विशिष्टः काय -A body with soul is consciousness)
3- मृत्य ही मोक्ष है (मरणमेव अपवर्गः -Death is salvation)
4- न स्वर्ग है, न अंतिम मोक्ष और न कोई शरीर के परे आत्मा, न चार वर्णों के कर्म व्यवस्था का कोई फल ही होता है-
न स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पार्लौकिकः
नैव वर्नाश्रमादीनाम क्रियश्चफल्देयिका 
5- उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को इसलिए नकारा क्योंकि उन्हें इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं दिखा -जबकि ईश्वर के नाम पर लोगों को शोषित करने का निंदनीय काम समाज में शुरू हो चुका था! लोगों को यह बताया जाता था कि इस दुनिया मे तो ठीक मगर उस दुनिया में जाओगे तो अपने किये का क्या मुंह दिखाओगे? व्याज चुकता नहीं करोगे तो कौन सा मुंह लेकर ऊपर जाओगे? वहां नरक में धकेल दिए जाओगे -इसलिए कर्ज का पूरा पैसा चुकता कर के ही मरना है -लगता है दुष्ट साहूकारों, बाहुबलियों और कथित लालची पुरोहितों का दुश्चक्र तब पूरी तरह से हावी था -जो एक ओर तो लोगों को साहूकारों से कर्ज लेने को प्रोत्साहित करते, फिर उस कर्ज की वापसी के तरह तरह के अमानवीय हथकंडे अपनाए जाते! और मिथ्याभाषी पुरोहित भी उनसे गठजोड़ कर कर्ज लिए लोगों को स्वर्ग-नरक का भेद समझाते !कहते अगर इस जन्म में कर्ज वापस नही किये तो नरक भोगोगे और दुबारा जन्म होने पर कर्ज वापस करना होगा! ऐसे ही परिदृश्य में चार्वाक अवतरित हुए-

यावत् जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः 
अर्थात जब तक जियो मौज से जियो और कर्ज लेकर घी पियो मतलब मौज मस्ती करो
कैसी चिंता, शरीर के भस्म हो जाने के बाद फिर वह वापस थोड़े ही आती है।
इस तरह उन्होंने लोगों को दिन-ब-दिन की चिंता से मुक्त करना चाहा।

प्रसिद्ध विचारक और दार्शनिक, अपने राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक इंडियन फिलासाफी के खंड एक में माना है कि "चार्वाक दर्शन -युग को भूतकाल के उस बोझ से मुक्त करना चाह रहे थे जो उसे निरन्तर दबा रहा था।"

चार्वाक का यह कथन कितना तार्किक है कि मुक्ति चाहे शरीर से हो या दुःख से पूरी तरह से मरने के बाद ही संभव है-मतलब मृत्यु ही केवल मुक्तिदाता है! चार्वाक ईश्वर की कल्पना को एक अनावश्यक कल्पना मात्र मानते थे. कर्मकांड उनके लिए व्यर्थ उपक्रम था और स्वर्ग नरक पुरोहितों का खयाली पुलाव् ! परलोक का कोई प्रमाण नहीं है, उनका कहना यही था !

मगर इस महान विचारक को पीट पीट कर मार डाला गया और वह भी युधिष्ठिर जैसे धर्मनिष्ठ और सत्यवादी के सामने! कितने कृतघ्न और बर्बर हैं हम अपने ही उद्धारकों के लिए! चार्वाक पर कुछ और फिर कभी .....
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COMMENTS

BLOGGER: 58
  1. चार्वाक के उपदेशों का सही अमल तो अब हो ही रहा है ...गलत समय में जन्म लिया उन्होंने ...अभी होते तो बाकायदा हर चौराहे पर सजाये और पूजे जाते ...!!

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  2. आज चावार्क होते तब अपने शिष्यों को पतांजलि के चेलों की शरण में जाता देख सर पिटते ..अतिवाद हर जगह बुरा होता है ..और वे चरम भौतिकता के प्रचारक थे.

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  3. यह युग युग की रीत है। पाखण्डियों की हर कहीं जीत है।

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    1. ये पाखण्ड नहीं है। ये उनका विचार है।

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  4. तात्कालिक रुप से कितना ही उपयुक्त लगे, पर वही दर्शन "दर्शन" जो सभी काल में जन साधारण में मन्यता प्रप्त अव व्यवहार मे हो

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  5. Sraddha Pandey10/31/09, 1:23 PM

    शर्मनाम है यह। इस घटना के बाद भी युद्धिष्ठि को धर्मराज कहा जाता है, यह शर्मनाक है।

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  6. वैदिक धर्म विस्तृ्त नियम प्रणाली से प्रतिबद्ध तथा मुख्यत: भौतिकवादी धर्म रहा है ओर चार्वाक का विरोध इसके भौतिकवास से नहीं वरन सिर्फ कर्म-काँड से ही था । स्वयं भौतिकवाद होने के कारण ही इसका प्रभाव न तो उस समय के समाज पर हो पाया ओर न वैदिक धर्म के विरूद्ध् एक जीवित परम्परा ही बन सका । शायद इसी कारण से आज इसके विकास और सिद्धान्तों का कोई क्रमिक इतिहास भी कहीं उपलब्ध नहीं होता । सिर्फ अन्य दर्शनों के ग्रन्थों में प्राप्त होने वाले प्रसंग ही इस सम्प्रदाय के विषय मे परिचय का आधार बने हुए हैं । चार्वाक दर्शन का निरीश्वर भौतिकवाद आधुनिक विज्ञान की भान्ती ही एक विकासहीन क्रान्ति से अधिक नहीं रहा । जिस समाज को वैदिक कर्मकांड के पथ से हटाकर एक दूसरे मार्ग पर लाने के उदेश्य से इस दर्शन का उदय हुआ....ापने नितांत भौतिकवाद के कारण ही न तो यह उनके बीच ही अपने लिए कोई जगह बना पाया ओर न ही विद्वानों एवं विचारकों के लिए संतोषकारक सिद्ध हो सका । इसे सिर्फ इतना ही महत्व मिल पाया कि विभिन्न दर्शन ग्रन्थों में आलोचना अथवा इसके खंडन के उदेश्य से चर्चा होती रही.......
    मेरे विचार से एक गलत समय में जन्म लेना ही इसकी अकाल मृ्त्यु का कारण बना अन्यथा यदि आज का समय होता तो चाहे ओर कोई न सही लेकिन आधुनिक विज्ञान परम्परावादी तो अवश्य ही इस मत के अनुयायी होते ।
    ओर शायद आप भी :)

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  7. sabki apni apni soch hoti hai aur apni apni manyatayein........ha rkoi apni sahliyat ke hisaab se use apnata hai.

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  8. चार्वाक को भली भांति‍ पढ़े बि‍ना उन पर कमेंट करना अनुचि‍त होगा। http://rajey.blogspot.com/

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  9. एक अच्छी जानकारी!

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  10. मगर इस महान विचारक को पीट पीट कर मार डाला गया और वह भी युधिष्ठिर जैसे धर्मनिष्ठ और सत्यवादी के सामने !

    ये बात तो मुझे पता ही नहीं थी....चार्वाक पर एक बेहतर आलेख...जल्दी ही लिखियेगा फिर चार्वाक पर, मै खासा उत्सुक हूँ....

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  11. सुन्दर लेख!
    प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्?
    बहुत बधाई!

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  12. यथार्थवादियों को सदा ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

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  13. चार्वाक को धर्मराज के सामने मार डाला गया यह जानकारी कहाँ है कृपया सोर्स बतायें ।

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    1. Mahbharat yudh k baad jab pandvoon ne yagya kiya to Duryodhan k mitter Charvak ne virodh kiya. Tab ritiviko ne abhmantrit kushaaon se use maar daala. Bas kewal itna hi vivaran milta hai.

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  14. @कोकास जी ,मेरे डर को आपने पकड़ लिया -ढूंढता हूँ स्रोत -मिलते ही खबर करूंगा ! फिलहाल तो स्मृति के आधार पर लिखा !

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  15. वैसे तो वत्स जी ने ठीक ही कहा है, परन्तु वह गलत समय में जन्म लेने के कारण नहीं अनुचित परम्परा व विचार के कारण दंड का भागी बना ,अन्यथा युधिष्ठर से उसकी सम कालीनता एवं वर्णित प्रसंग कही सुना-पढा नहीं है | वस्तुतः तो उसके दर्शन के बारे में दिए उद्दरण --" ऋणं कृत्वा ..." से ही उसकी अति-भौतिकवादी दृष्टि ,अनैतिक विचार , अनीति परक सोच व मूर्खता का परिचय होता है | तभी तो उसका कहीं भी जन-सामान्य वसाहित्य में नामो-निशाँ नहीं है, यह भारतीय -मनीषा की उदारता का ही भाग है कि एक विरोधी दर्शन को भी एक दर्शन का स्थान ( चाहे गलत ही है ) दिए हुए है | इसके पीछे यह बात है कि समाज को गुमराह करने वाले तत्वों की भी जानकारे से इतिहास व समाज गुमराह न हो

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    1. Bhai sahab kyunki unse sambhandit sbhi books... Ko apke so called purohit samaj ne jala dala...

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  16. इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हिन्दू धर्म बहुत व्यापक है और इस में बडी विपरीत विचारधाराओं का स्थान है. द्वैत, अद्वैत और ईश्वरहीनता. चौरासी लाख देवता और एक भी नहीं. चार्वाक इस धर्म का मान्य अंग है.

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  17. चार्वाक के विषय में सर्वाधिक प्रचारित तथ्य है- ‘कर्ज़ लेकर घी पियो।‘ मुझे यह भ्रामक और झूठा प्रचार लगता है। मुझे नहीं लगता कि एक संवेदनशील, तार्किक और वैज्ञानिक बुद्धि वाला व्यक्ति इस तरह का अजीबो-गरीब सिद्धांत प्रतिपादित करेगा। बाकी सब बातों पर इस दार्शनिक से सहज ही सहमति बनती है।

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    1. CHARVAK NE KARZ LEKAR BHEE GHEE PEENE KI BAAT IS LIYE KAHI HAI KYONKI YADI HUMAARA SHAREER TANDUROOST HOGA TO HUM LIYA KRZ TANDUROOST SHAREER SE MEHNAT KR UTAAR SAKENGE. PR KUCHH NAKAARATMK VICHAARO VALE LOGO NE IS BAAT KO NEGATIVE HI LIYA HA. JARA SOCHO KI CHARVAAK NE KRZ LEKR MADEERA PEENE KI BAAT TO NA KAHI, YA KHIN BHI AISA TO NAHI LIKHA K KRZ LEKR VAAPIS NA DO, DARASAL YE HAMAARI KALOOSHIT SOCH KA HI NATEEZA HAI KE HUMNE CHARVAK KO GALAT SAMJHA. JAI HO RISHI CHARVAAK KI

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    2. Chaarvaak ne mehnat ki kamaai se ghee kharidkar pine ko kaha hota to mein uski izzat karta muftkhori se aiyaashi ki jaati hai samaaj aur parivaar nahi chalta koi bhi samaaj parivaar desh chaarvaak darshan se nahi chalta Islam mein koi gyaan aur philosophy nahi hai lekin woh shariyat ke kanoon se chalraha hai

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  18. चार्वाक -inke bare mein aap ki post se hi maluum hua.

    in ke bare mein aur adhik jankari zarur chahenge.
    ------------

    waise Main yadi kahun ki Ishwar-khuda -paap-puny-Swarg -narak ka dar [fear] INSAAN ko na ho to Is dharati par paapi badhenge hi...

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    1. क्या धर्मवादीयों ने कभी पाप नही किया क्या ?

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  19. बढ़िया रही चार्वाक चर्चा.
    @ शरद कोकास जी--- जब संदर्भित सोर्स मिल जाए तो मुझे भी बता दीजिएगा अरविन्द जी. प्रतीक्षा रहेगी.

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  20. चार्वाक के बारे में कुछ लिखने के लिए आपका धन्‍यवाद।
    हमारे देश की एक सबसे बड़ी समस्‍या तो यह भी है कि हमारे यहां स्‍वयंभू चिंतकों और विचारकों की पूरी फौज खड़ी है जो पढ़ते लिखते तो कम हैं मगर लगातार कुछ न कुछ उवाचते रहते हैं। सबसे मजेदार बात तो यह है कि ज्‍यादातर स्‍वयंभू चिंतक या विचारक या तो इतिहासग्रस्‍त हैं या इतिहास विमुख।
    भौतिकवाद को लोग केवल खाने, पीने और ऐश करने का चिंतन समझते हैं।
    वैसे कौन कहता है कि चार्वाक को पूछने वाला कोई नहीं है। अगर उन्‍हीं की समझदारी से तर्क करें तो भी ऋण लेकर घी पीने की बात तो आज ही सबसे अधिक दिखायी पड़ रही है। टाटा, से लेकर अंबानी तक हर पूंजीपति ऋण लेकर घी पी रहा है। शेयर मार्केट का खेल आखिर किस आधार पर चल रहा है। और बैंक क्‍या करते हैं। उनका तो काम ही ऋण लेना और देना है और इस प्रक्रिया में सारा घी पी डालते हैं।
    बेलआउट पैकेज क्‍या है।
    लोग क्‍या इतने अंधे हो गए हो गए हैं कि सामने की चीजें भी उन्‍हें दिखायी नहीं दतीं। और ऊपर से घमण्‍ड ये कि चिंतन बघारें।

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  21. बहुत सुन्दर , जय सिंह ---आज सभी जगह चार्वाक के अनुयायी हैं , और हर सामान्य व्यक्ति परेशान है , अति- भौतिकता से जन सामान्य त्रस्त है |
    ---संजय जी आपने चार्वाक को वैज्ञानिक दृष्टि वाला कैसे समझ लिया , क्या अति-भौतिकता मानने वाला ,ईश्वर-धर्म के विरुद्ध वक्तव्य देने वालों को, ऋण लेकर भी घी पीने वालों को , आप वैज्ञानिक मानते हैं|

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  22. गुप्‍ता जी टिप्‍पणी करने की जल्‍दी में आपने वही गलती कर दी जिसकी तरफ मैंने अपनी पोस्‍ट में इशारा किया है।
    पहले लोकायत दर्शन पर थोड़ी पढ़ाई और चिंतन मनन कीजिये फिर कोई निर्णय कीजिएगा।
    हालांकि अपनी टिप्‍पणी में मैंने जो बाते नहीं कही हैं आप अपने पूर्वाग्रह के कारण उन्‍हें मुझपर आरोपित कर रहे हैं।
    वैसे आपके हिसाब से वैज्ञानिक कौन होता है :
    1. जो प्रत्‍यक्ष को नहीं बल्कि धर्मग्रन्‍थों के अंधविश्‍वासों को प्रमाण मानता हो
    2. जो सामने मौजूद चीज (शरीर और जीवन) के बजाय अज्ञात चीजों (स्‍वर्ग और आत्‍मा) को सही मानता हो
    3. जो भगवान का भय दिखाकर मनुष्‍यों को लूटने, खसोटने और ठगने का काम करता हो और स्‍वयं जिंदगी के वे सारे मजे करता हो जिनके लिए वो दूसरों को मना करता हो

    खैर इस तरह के तुर्की बतुर्की संवादों से इस प्रकार के विषय पर बहस नहीं की जा सकती। बेहतर हो हम लोग थोड़ा पढ़े और चिंतन मनन करें। कई बार पूर्वाग्रहित होने के कारण बहुत सीधी सी बात भी समझ में नहीं आती है।

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    1. Mein kaunsa nastik banu Jain Buddhist ya chaarvaak aur in teeno mein kaun sahi hai in teeno ne desh ke liye Kya kiya rashtra nirmaan mein inka Kya yogdaan hai rashtra shabd bhi vedic ki den hai rashtra ko hi devta kaha gaya hai chaarvaak to kahega jhande ko salaam mat Karo woh kapde ka tukda hai dharti ko maa mat kaho Zameen ka tukda hai desh ke liye jaan Dena bhi andhvishwaas hai aankho se jo chiz dikhai nahi deti woh microscope se dikhai deti hai rishiyo ne microlevel par kuch dekha hoga anubhav kiya hoga apni divya drishti se dekha hoga usiko aatma kaha hoga aatma aur kuch nahi atomic particle hai jaise democracy ki aatma freedom hoti hai vaise hi jeev ki atma hoti hai jo amar hai kyonki atma aur parmatma ek hai yaani manushya ke bhitar hi parmatma hai. Agar kitabo mein likhi baat nahi manenge to satya ko bhi nahi manenge kyonki satya bhi kitaabi baate hi hai

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  23. आप लोग अंग्रेजी को ही आदर्श मानते हैं , सुना होगा "the things are not what they are seen " अर्थात मौजूद चीज जो दिखाई देती है सिर्फ वही सत्य नहीं होता , उसके चारों और अदृश्य तथ्य होते हैं जो धर्म, विवेक व ज्ञान से दिखाई देते हैं ,वही स्वर्ग व आत्मा होते हैं | धर्म ग्रंथों को अंध विश्वास कहना ही तो अंधविश्वास है | विल्कुल सही कहा आप लोग थोडा पढो-लिखो , तभी समझाने लायक होगे |
    ' प्रमाण ' क्या होता है व कौन-कौन से होते हैं ,कितने प्रकार के अपने ब्लॉग पर स्पष्ट करूंगा |

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    1. six means of valid knowledge: Pratyakṣa (perception), Anumāṇa (inference), Upamāṇa (comparison and analogy), Arthāpatti (postulation), Anupalabdi (non-perception, cognitive proof) and Śabda (testimony of past or present reliable experts). While Carvaka school accepted just one Pratyakṣa (perception).

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  24. जयसिंह जी, आपने तो मेरी ही लिखी चार लाइनों को ठीक से नहीं पढ़ा, बाकी आप जो अध्ययन करते होंगे वह आपकी व्यक्तिगत उपलब्धि है। हमारे यहां एक अजीबो-ग़रीब धारणा सी बन गयी है कि जो दिन-रात किताबों में घुसा-फंसा रहे वही अव्वल दर्जे का चिंतक है। ऐसा भी होता है कि पूरे साल पढ़ने वाला छात्र फेल हो जाता है और घण्टे दो घण्टे पढ़ने वाला अव्वल आ जाता है। ‘पढे-लिखे’ आचार्य-प्राचार्यों द्वारा बनाया गया माहौल भी एक वजह है कि हिंदी लेखक की दशा आज भी जर्जर बनी हुई है। बहरहाल मैंने कहा कि बाकी सब बातों पर इस दार्शनिक से सहज ही सहमति बनती है। इसलिए भौतिकता-अभौतिकता का दर्शन मुझे समझाने का आपका मंतव्य खामख्वाह ज्ञान झाड़ना नहीं तो क्या है ? टाटा और अंबानी चार्वाक के वक्त नहीं हुआ करते थे । वहां बात व्यक्तिगत संदर्भ में थी। और उस अर्थ में ऋण लेकर घी पीना और उसे लौटाने की नीयत रखने वाले का उपहास करना क्या समाज में घोर अराजकता की स्थिति पैदा करने वाली सोच का समर्थन नही ंतो क्या है ? टाटा-अंबानी को ही आदर्श और उदाहरण मानना है तो देश के सारे शिक्षालय बंद करके वहीं मार्डन गुरुकुल बनवा लीजिए ना।
    बाकी श्याम जी से क्या कहूं ! ये तो उन्हीं बाबाओं जैसी बातें कर रहें जो विज्ञान के बिना एक दिन भी गुज़ारें तो उनका खाना-हंगना तक असंभव हो जाए मगर रटेंगे अध्यात्म-अध्यात्म। कहेंगे माया से दूर रहो मगर योगासन सिखाने तक के प्रति आसन के हिसाब से चार्ज कर लें। इन हिप्पोक्रेट बातों का आदमी आखिर एक दिन में कितनी-कितनी बार तक जवाब देता रहे।

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  25. अरविन्द जी इस लेख के लिए बधाई !
    कुछ टिप्पणियां आयी हैं जो शायद भारतीय फलसफे के ' लोकायत दर्शन ' से अनभिग्य हैं.इस 'school of thought ' में अन्य दार्शनिकों ने भी जोड़ा है. टिप्पणी में सब कहना संभव नहीं है .न्यू यार्क की कोलंबिया विश्वविद्यालय में 'लोकायत ' पर '९४ में एक सेमिनार भी हुआ था .उसका आदर भी, क्योंकि वह शायद अमेरिकी जीवन की ' you have only one life to live ' के फलसफे के करीब है.

    चार्वाक में एक वैज्ञानिक दृष्टि थी और उन्होंने स्वयं के फलसफे को सम्पूर्ण भी नहीं माना था . सिर्फ किसी भी सत्य के लिए प्रमाण के पक्षधर थे .यही वैज्ञानिक द्रिस्टी भी है.

    सच है की वे विद्रोही थे और तात्कालिक 'पाप पुन्य ' की अवधारणा में निहित ' स्वार्थी दर्शन ', को भ्रांत कर ,समाज के ठेकेदारों के द्वारा की जाने वाली जन शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थी. जबकि ध्यान दिया जाये तो वह दर्शन समाज को स्वस्थ नियामक और स्वच्छ रखने के लिए ही बनाया गया था. दुर्भाग्य है की वही ' दर्शन ' आज भी अंधविश्वास पैदा कर ,शोसन और चरित्रहीनता का अनैतिक हथियार बना हुआ है.

    रही बात चार्वाक को युधिस्ठिर द्वारा पीट पीट कर मार डालने की ,तो वे महाभारत के युधिस्ठिर नहीं बल्कि एक तत्कालिन राजा थे उसी नाम के . महाभारत के युधिस्ठिर तो पौराणिक चरित्र थे .चार्वाक तो मेरी जानकारी के हिसाब से शंकर से सिर्फ कुछ ही सौ साल पहले के विचारक थे . लोकायत दर्शन का काल खंड भी वही है.
    फिर भी लोकायत दर्शन की अकाल मृत्यु शोसक धर्माचार्यों का षड़यंत्र ही था , जो अपने math बना उसके नाम पर हर अनैतिकता का पोषण करते रहे .
    जरूरत है आज ' लोकायत दर्शन ' पर पुनर्विचार की और उसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को
    समझने की .

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  26. संजय जी पता नहीं समस्‍या समझदारी की है या किसी और बात की लेकिन आप क्‍यों इतना भड़क उठे मेरी समझ में नहीं आ रहा है लगता है कि आपने स्‍वयं मेरी टिप्‍पणी का मंतव्‍य और इशारा नहीं समझा है।

    आपकी ही तेरी मेरी भी इस दार्शनिक से सहज सहमति बनती है और ऋण लेकर घी पीने की बात भी उस ऐतिहासिक परिस्थिति को ध्‍यान में रखे बिना नहीं समझी जा सकती है।
    यह तो एकदम आश्‍चर्य की बात है कि मेरी आपसे सहमति बन रही है (ज्‍यादातर मसलों पर) और आप नाहक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। टाटा, अंबानी वाली मेरी बात का इशारा किस तरफ था और समाज में किस तरह के लोग उसके निशाने पर थे यह भी आपने नहीं समझा। खैर अब इसके साथ ही इस अंक का पटाक्षेप हो जाना चाहिए और न भी हो तो मैं अपनी तरफ से इसे और आगे नहीं बढ़ाउंगा। और भी मुद्दे हैं जिनपर बात-तकरार होती रहेगी।

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  27. भैया संजय जी , आपने कुछ झूठे बाबाओं ( वस्तुतः झूठे विज्ञानी, झूठे ज्योतिषी , झूठी वैज्ञानिक खोजें , फंटेसी कथाए , झूठे सीरिअल -कथाएँ ,झूठे राजनीतिग्य, झूठे समाज सेवी की तरह ही ) को देख -सुन कर अपनी धारणा बना ली है; उच्च कोटि के बाबाओं, विद्वानों , साधुओं , ज्ञानियों से बात करिए , वस्तु स्थिति पता चलेगी | विज्ञान में कितनी बेईमानी होती है, विज्ञान झूठा नहीं होजाता, इसी तरह कुछ बे ईमानों के संसार में आप जीना बंद नहीं कर सकते, इसी तरह कुछ झूठे बाबाओं के कारण दर्शन, ज्ञान झूठा नहीं होता | वस्तुतः आपको 'ईशोपनिषद ' व बाद में गीता पढ़ने की अत्यावश्यकता है , संसार और व्यवहार , ज्ञान ,विज्ञान , दर्शन व जीवन काअर्थ जानने-समझने के लिए |

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  28. मुझे लगा कि कुछ बातें और हैं जिन्हें कहना ज़रुरी है। और मैं इस ब्लाग पर लड़ने तो आया नहीं। कठोर भाषा के प्रत्युत्तर में बाज दफा वैसी ही भाषा निकल जाती है। मेरी समझ में चार्वाक, बुद्व और महात्मा फुले के स्तर के चिंतक हैं, सिर्फ एक बात की वजह से उनका सारा चिंतन और छवि मटियामेट हो गयी है। और मुझे व्यक्तिगत रुप से अगर ऐसा लगता है कि इस स्तर का चिंतक कर्ज़ लेकर घी पीने और फिर उस कर्ज़ को भी डकार जाने की बात नहीं कर सकता, तो इसमें किसी को कोई एतराज़ क्यों होना चाहिए ! लोकतांत्रिक समाज में सभी को अपनी बात रखने का हक है। और किताबों में लिखी बातें पहले भी कई बार ग़लत निकल चुकी हैं। गैलीलियो और बाइबिल का उदाहरण हमारे सामने है। सबसे बड़ी विडम्बना है कि इस तरह की बातों से विरोधियों के लिए नास्तिकता को बदनाम करना निहायत ही आसान हो जाता है। जबकि मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह रहा है कि नास्तिक ज़्यादा ईमानदार और तार्किक होते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि घी पीना भौतिकवाद है लेकिन कर्ज लेकर न लौटाना बेईमानी है। हम भौतिकवाद और बेईमानी को मिक्स करने का खतरनाक काम क्यों करते जा रहे हैं आखिर !? इसी एक बात का आपके वे विरोधी भी लगातार फ़ायदा उठाते आ रहे हैं जो व्यवहार में आपसे कई गुना ज़्यादा भौतिकतावादी और बेईमान हैं। आपकी मुश्किल यह है कि आप उसे एक सिद्वांत कें तौर पर प्रतिपादित कर रहे हैं भले व्यवहार में न कर पाते हों। फिर आपको तो पता ही है न कि ‘बद अच्छा बदनाम बुरा’। तो क्यो खामख्वाह अपनी, चार्वाक की और नास्तिकवाद की मिट्टी पलीत कर रहे हैं।
    अगर आप यही मानते रहना चाहते हैं कि आदमी किताबी ज्ञान से ही चिंतक बनता है तो आपकी स्वतंत्रता है। मेरी समझ में किताबें आपको सूचनाएं भर देती हैं। उनसे निष्कर्ष निकालना और उनका समुचित ढंग से इस्तेमाल करना अंततः आपके ही मस्तिष्क, विवेक और तर्कबुद्वि पर निर्भर करता है। मेरी समझ में यह तो संभव है कि बिना किताब पढ़े कोई चिंतक हो जाए। मगर यह ज़रुरी नहीं कि किताबें पढ़ता रहने वाला हर आदमी चिंतक हो। कबीरदास किसी स्कूल में नहीं पढ़े। उनके स्वाघ्याय करने का ज़िक्र भी कहीं नहीं मिलता। मुल्ला नसरुद्दीन भी किसी हंस या कथादेश के आजीवन सदस्य नहीं थे। बुद्ध राजा के बेटे थे तो शिक्षित तो रहे ही होंगे मगर घोर पढ़ाकू थे या किसी लायब्रेरी के मेम्बर थे, ऐसा वर्णन तो कहीं नहीं मिलता। जीवन की ही कुछ घटनाओं ने उनकी सोच का रुख बदल डाला था। और भी उदाहरण हैं।

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  29. बढियां विमर्श चल रहा है -मुझे पोंगा पंथियों से चिढ है बस -ईश्वर को भी ज्ञानमार्ग प्रिय है .मगर दुःख यह है की ज्ञान देने वाले गुरु ही कन्फ्यूज्ड हैं -बनते तो वे ज्ञान के भाष्यकार है मगर हैं सरस्वती की कृपा से विहीन ! विजडम गायब है ! वह चेत्ब्ना गायब है जो नीर क्षीर विवेक करती है ! ऐसे लोग खुद अज्ञान के कुएं में गिर जाते हैं चेलों को भी ले लेते हैं -इनसे दूर से ही नमस्कार !

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  30. @@राज सिंह जी ,
    आपके एक एक शब्द से सहमति -मैंने थोडा और गहरे उतर कर देखा तो यह जानकारी मिली है और अंग्रेजी में चार्वाक को गूगल करने पर याहं भी यह जानकारी मिलती है कि महाभारत काल में (यह सोलहो आने मिथक नहीं है ) एक और चार्वाक हुए थे जिन्हें भीम और कुछ लोगों ने पथरों से पीट पीट कर मार डाला था ! संभवतः वह अभिशप्त चार्वाक परम्परा का ही रहा हो और नाम भी चार्वाक रहा हो !
    दुखद है कि भारत में चिंतन को नई दिशा देने वाले कई लोगों को देश निकाला मिल गया -बुद्ध निर्यातित हो गए -तंत्र विद्या का उदगम तो हुआ मगर बाद में उसे भी संदूषित कर खत्म कर दिया गया -विश्वामित्र ने समांतर ब्रहमांड का संकल्प लिया (प्रतीकात्मक ) और अग्नि को यग्य से विरत करा चाहा तो भी चिल्ल पो मची !
    बस भाग्यवादी ,पुनर्जन्म विश्वासी ,अवतार वादी यही सब काबिज रहे हैं और आज भी सीना चौडा किये हुए हैं -क्योंकि अधिसंख्य लोग मूढ़ हैं और अपनी समस्याओं का निराकरण किसी तारणहार में देखना चाहते हैं ! और आज कितने ही ठेकेदार उन्हें यह सस्ते ही कुछ मूर्खतापूर्ण कर्मकांडों के जरिये उपलब्ध करा देने की गारंटी देते हैं ! यह अकथ कहानी है -कहाँ तक कहा जाय !
    बहुत आभार !

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  31. हाँ, यही सत्य है, शाश्वत ,सनातन है ;' हरि अनंत हरि कथा अनंता , जिसे ' गावहि सुनहि वेद,श्रुति संता ' बाकी सब झूठ इसीलिये समय के पृष्ठ से मिट गए | जैसे-------चार्वाक दर्शन .

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  32. प्रिय अरविन्द जी ,
    आप की सतत गवेश्नात्मक वृत्ति से बहुत ही प्रभावित और आनंदित हूँ. मनुष्य की परेशानियों से जनित समस्यायों के झूठे निदान के नाम पर मूढ़ और ज्ञान वंचित जन छले जा रहे हैं और इस छल में हर तथाकथित 'धर्म ' और उसके धूर्त, पाखंडी या खुद ही अज्ञानी, व्याख्याकारों द्वारा पूरे इतिहास में शोषण ही होता रहा है , सेवा कम .कोई भी धर्म और समाज इस से नहीं बचा है और पूरी दुनिया भर में .

    हाँ विज्ञान के आलोक ने ,और समाज के प्रबुद्ध होने ने , जहां जहां तार्किकता को अपनाया ,पाखंड और धूर्तता का ध्वंश होता रहा है.और इसी के सहारे से कुछ संभावनाएं बन सकती हैं.

    यहाँ विज्ञानं को शायद कुछ लोग शुद्ध भौतिकवाद मान रहे हैं ,उसे ठीक करें. वैज्ञानिक खोजों से लाभ हानि या विकास निर्माण या विनाश ,वह नैतिकता का विषय है और मनुष्य या समाज पर अवलंबित है की प्रयोग कैसे करे.न्यूक्लीयर शोधों ने तो हालिया वक़्त में यह साबित भी कर दिया है .विज्ञानं और भौतिकवाद का घालमेल करने से कन्फ्यूसन ही बढेगा .
    इस पोस्ट के संवाद में बड़ी अच्छी चर्चा हो रही है और कुछ एक से असहमत/ अंशतः सहमत या सहमत होने के बावजूद कहूँगा की यह बड़ा ही शुभ प्रयास है.हाँ सभी से कहूँगा की व्यक्तिगत आस्था / विस्वास से नहीं सत्य और तार्किकता से ही विमर्श करें तो परिणाम भी शुभ होगा .कम से कम यह मान कर की यह विज्ञानं का ब्लॉग है.इसमें तकरार /टकराव का स्थान तो न ही हो.

    आज विज्ञानं की दी हुयी इलेक्ट्रानिक मीडिया पर भी जब देखता हूँ की अन्धविश्वास का कचरा और ज्योतिष के नाम पर जो दुकानदारी चल रही है तो मन और व्यथित हो जाता है. इस अकथ कहानी से हम आप जैसे लोगों का उद्धिग्न होना और असहाय महसूस करना समझ में आता है ,पर अपनी सामर्थ्य और सीमाओं में भी लड़ाई जारी ही रखनी पड़ेगी .मूढ़ता ,अज्ञान और पाखंड का भी वाईरस अगर समाज में इतनी गहराई तक उतर आया हो तो निकालना आसान चुनौती तो नहीं ही हो सकती .

    @ डा.श्याम गुप्ता जी ,
    आभारी होऊंगा यदि कुछ उच्च कोटि के बाबाओं ,विद्वानों,साधुओं ,ज्ञानियों का पता अगर मालूम हो तो बताएं.अभी तक तो झूठे ही झूठे और पाखंडी ही मिले .हर श्रम कर उनसे मिलने की इक्क्षा रहेगी.हाँ आपकी ' इशोप्निषद ' तथा ' गीता ' की बात से सहमती है और वह आध्यात्म और दर्शन का ,मेरी नजर में ,उच्चतम पड़ाव है .
    @संजय ग्रोवर जी ,
    आपसे सहमत हूँ .चार्वाक को मैं भी बुद्ध और महात्मा फ़ुले के स्तर का चिन्तक मानता हूँ और मेरा भी मानना है की उस स्तर का चिन्तक कर्ज डकार जाने की बेईमानी नहीं बताएगा.अपने शाश्त्रों में भी कितना घोल मेल किया गया है वह इसी से जाना जा सकता है की तुलसी की रामचरितमानस तक में ,गीता प्रेस के संस्करण के पहले तक ,कई वर्जन पाए जाते थे .' लोकायत ' दर्शन भी बेईमानी की बात नहीं करता .मेरा भी विश्वास और ( व्यक्तिगत ) अनुभव रहा है की नास्तिक ज्यादा इमानदार होते हैं ,तार्किक तो होते ही हैं.

    सभी का धन्यवाद ,खास कर अरविन्द जी का ,जिन्होंने इस विषय को उठाया ,और मैं भी कई नयी जानकारियां पा सका .

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  33. राज सिंह जी , सहमति जताने से और उच्चतम पड़ाव मानने से ही थोड़े ही कुछ होता है ; यदि वह उच्चतम है तो सारी बात खत्म , किसी सच्चे साधू ,बाबा आदि को ढूढने की क्या आवश्यकता(जिन खोजा तिन पाइया गहरे पानी पैठ ,खुद ही ढूँढना पङता है ) ; उसमें कहीं चार्वाक दर्शन से सहमति नहीं , बहस समाप्त |गलत बात को प्रश्रय देने से वह अनावश्यक रूप से फैलती है ; ईशोपनिषद दर्शन पर पोस्ट लिखने की बजाय चार्वाक पर लिखने की क्या आवश्यकता पड़ीं, क्यों ? हम क्या प्राप्त करना चाहते हैं !!
    समझने के लिए मेरी पोस्ट " मुस्लिम आक्रान्ताओं व अँगरेज़ आक्रान्ताओं में अंतर " पढें |

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  34. चार्वाक के दर्शन पर तो मैंने पहले भी काफ़ी कुछ पढा है और मेरा बड़ा प्रिय भी है यह दर्शन. लेकिन जीवन के बारे में कोई जानकारी नहीं है. आपने एक हैरतअंगेज़ जानकारी दी कि उन्हें युधिष्ठिर के सामने पीट कर मार डाला गया. वैसे तो मैंने सुना है कि चार्वाक कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक परम्परा है. यह भी सुना है कि उन्होंने युधिष्ठिर का विरोध किया था. अगर जीवन पर आपके पास तथ्यात्मक जानकारी हो तो जरूर बताएं. हमें इंतज़ार रहेगा.

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  35. प्रविष्टि और टिप्पणीयों ने काफी ज्ञानवर्धन कर दिया मेरा ।

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  36. The major atheist school of India was the Charvaka or Lokayat Darshan (Darshan = philosophy). Brihospoti who wrote a major part of the Rig Veda, probably the world's first rational Nastik, is considered the spiritual Guru of the school. The school developed around the 6th century B.C. The Brahmins could not defeat the logic of the Charvaka school and ended with personal attacks. They demonized the rationalists in their attempt to contain the free-thinking which was becoming popular among the common people. The Brahmins even gave the name of the school (Charvaka) from an immoral monster called Charvaka in the Mahabharat hoping that the common people would come to hate it
    And just like some modern western schemes, the Vishnu Puran and ...

    ----ab aap sab sochen ki jo aalekh yaa lekhak -birahaspati ( jo lekhak ke anusaar ved kaa lekhak hai ) ko , NASTIK, asur, lokaayat kaa guru --likhataa ho , jabaki birahspati --jaane maane DEV-GURU hain ; aaj tak kaheen ,kisee pustak, shaastr men unhen ASUR mana gayaa hai ? , vedon ko muslim, angrez aakraantaaon dwaara sadiyon jalaayaa-barvaad kiyaa jaataa raha par ve aaj bhee hain, kyon? par lokayat ka koee granth naheen upalabdh KYON/--kyonki usko jan samarthan naheen thaa. vah ek anaachaar-kaa darshan thaa .

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  37. @Dr Gupta,सुर कौन है असुर कौन है इसकी पड़ताल मुश्किल है -इन्द्र को ही देखिये हैं तो देवताओं के राजा कार्य हैं आसुरी ! दरअसल भारत बार बार नए नायकों और संस्कृतियों के आघातों को झेलता रहा है और एक मिश्रित संस्कृति याहं वजूद में है जिसने सबसे कुछ कुछ ग्रहण किया -इतिहास विजेताओं का होता है -अब जेता ने किसी सुर को असुर कह दिया हो और असुर को सुर तो आश्चर्य कैसा -आर्यों ने शंकर को लिंग देवो भव कह तिरस्कृत किया पर आज शंकर मुख्य धारा में है -कारण ? हम मूलतः शंकर की संस्क्रती के संवाहक है -मगर वहीं रावण को तिरस्कृत किया -जो की शंकर भक्त था ! गीता में कृष्ण ने कविनाम बृहस्पति कवी नहीं कहा है -कहा कविनाम उसना गुरू ! कवियों में मैं शुक्राचार्य हूँ ! राक्षस गुरु को कृष्ण स्वयं अपना रूप मान रहे हैं !
    भैया ,आप पनी छोटी छोटी आँखों से जो महा संस्कृति देख रहे अहं यह उतना सहज सरल नहीं है जितना आप समझ बैठे हैं -जरा संत समागम ककिया करिए नित्य !

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  38. हुज़ूर ,आपने जो कहा वही तो सत्य है( अज्ञान ता के कारण समझा नहीं है )सुर -असुर की पड़ताल कोइ मुश्किल नहीं , पढें तो वैदिक-पौराणिक साहित्य ( वास्तव में;- अंग्रेजों व उनके पिट्ठुओं चाटुकारों देशी अंग्रेजों के लिखे नहीं ),इस देश में अधर्मी को त्यागा जाता है ,रावण को त्यागा जता है ,चाहे वह ब्राह्मण ही क्यों हो ,शुक्राचार्य ब्राह्मण थे ,ब्रहस्पति के गुरु भाई थे , ज्ञानी व कवि; कृष्ण (सभी )उनका सम्मान करते थे ,परन्तु अधर्मी असुरों का साथ ( ब्रहस्पति से प्रतिस्पर्धा के कारण )देने के कारण वे आलोचनीय बने | कृष्ण(उत्तम व्यक्ति,पुरुषोत्तम ) के लिए व्यक्ति नहीं --गुण सम्माननीय है | यही तो महानता है इस संस्कृति की |
    संतों को कभी तो आप झूठा कहकर नकारते हो , कभी समागम का सन्देश , क्या कुंठा है ? अंग्रेजों के लिखे इतिहास को भूल जाओ ,नए सिरे से स्वयं वेद-उपनिषद्-पुराण पढो , सारे भ्रम दूर होजाएंगे |

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  39. charvak ke bare me itna padh kar ek bhram utpann ho gaya hia

    krapya nivaran kareen

    yadi main paryapt shakti ekatrit kar leta hoo to mujhe aapki hatya karke aapki sampda kyoun nahi cheen leni chahiye.

    yadi main paryapt shakti ekatrit kar leta hoo tab


    ab svarg aur apvarg to kuch hote nahi hai na


    please answer me.

    It is my deepest request

    ReplyDelete
  40. gupta ji namaskar, aap bhi khamakha bahas kiye ja rahe hai, ki aap to angrejon k anuyayi hai, meri kuch batoon ka jawab dijiye aap, ati kripya hogi aapki,

    1. agar Ishwar naam ki koi takat is dunia mein hai ya thi, to angrejon ne bharat ka itne saloon tak shoshan kaise kiya, jabki bharat to sabse shantipriya aur Dharmik desh raha hai, jab angrej bharat ko lut rahe the tab kaha tha aapka wo dongi Parmatma.

    2. aapke purano mein kaha gaya h, 'jab jab is sansar mein pap badhta hai tab tab bhagwan avtaar lete hain, aur dusto ka naash kartein hain, main aapse puchta hu kya aaj sansaar me papiyo ki kami h, ya aapke ishwar k paas time nahi hai avtaar lene ka,


    aaj pal pal nirdosh praniyo ki hatya, ablaon k sath blatkar ho rahe hain, kaha hai aapka wo krishan jisne dropdi ko shari pahnai thi, aaj lagta hai wo bhi gopiyon k sath ras leela karne me vaysat hai,


    kripya jawab jarur dijiyega

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    Replies
    1. Eeshwar ne Kshatriya dharma diya tha jab kshatriyo ko ahimsawaadi pakhandi afeem khilakar napunsak banadiya gaya to desh ko ghulam hona hi tha aaj agar Indian army ahimsawaadi ban jati hai ya chaarvaak darshan ke mutabik Bharat ko maa nahi maanti Zameen ka tukda maanti hai to desh phir se ghulam ban jayega iske liye bhagwaan nahi insaan zimmedar hoga

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  41. ----सुनिल जघडा जी---इश्वर, धर्म व शास्त्र ने कब कहा कि मुझे भूलकर, अग्यान के अन्धकार में भटक कर कर्म न करो, आलस्य में झूठे आडम्बरों में, पापाचार में...विदेशियों से मिलकर लूट-वलात्कार में लिप्त होजाओ-
    ----अन्ग्रेज़ों के साथ मिलकर जो आपके बहुत से पुरखे पिछली पीढी वाले देशद्रोही, अधर्मी, लालची,अनीश्वर वादी लूट( जैसे आज भी एसे लोग वहस में व विभिन्न आसुरी रूप धरकर अनाचार में लिप्त हैं)-वलात्कार जैसे कुकर्म करते रहे ---उन्हें के कारण असभ्य, अनाचारी, अनैतिक अन्ग्रेज़ आप पर राज्य करते रहे...
    ---- क्रश्ण तो कबके मर चुके ...अब तो आप स्वयं उन्के पद चिन्हों पर चलकर कर्म करो...क्यों आप स्वय़्ं कर्म नहीं करते...वैसे कल्कि अवतार का नाम पढा है जो कलयुग में होचुका है...उसका रूप तो काम होजाने पर ही सबको पता चलता है---अन्ना व राम देव भी उनके सहयोगी हो सकते हैं.????

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  42. chawark ke anusar bhagwan nahi h or n hi sarwag or nark h to iska matlab ham kisi sanp ko dekhkar aankh band karle or sanp aakar hame kate to kya sanp nahi h?

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  43. जय सिंह जी एवम् मिश्रा जी के विचार अच्छे और तर्कसंगत लगे
    और हां गुप्ता जी से न लड़िये उनसे जीत पाना कठिन लगता है😁

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  44. जय सिंह जी एवम् मिश्रा जी के विचार अच्छे और तर्कसंगत लगे
    और हां गुप्ता जी से न लड़िये उनसे जीत पाना कठिन लगता है😁

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  45. चार्वक दर्शन पर प्रामाणिक ग्रन्थ है और इसके सूत्रों को खोलने का काम हो चुका है। इसीने लोकतंत्र तथा चरित्र का पक्ष लिया था। इसके सूत्रों को चाणक्य ने अपनाया है और अकबर के समय जो धर्म सभा बुलाई गई थी उसमें इस दर्शन के विचारों को सराहा गया था। ऋण कोई भीख नहीं है जो रोज मिल जाए। घी या भौतिकवाद हेतु स्वास्थ्य ठीक होना चाहिए और उसके लिए चरित्र को भी ठीक रखना चाहिए। इस दर्शन पर निष्पक्ष काम नहीं हुआ। २०११ में जर्मनी से पुस्तक प्रकाशित हुई है।

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  46. चार्वाक बुद्ध जैन सभी सत्य है लेकिन हिन्दू धर्म से बढ़कर कोई नही हिन्दू धर्म में सब बताया गया ये सब मोहरे है समय समय पर इनका मात्र जन्म हुआ है
    हिन्दू धर्म सुख की बाते भी कही गयी है और दुख की बाते भी कही गयी है
    तुम जैसे जियोगे वैसे ही तुम्हे फल मिलेंगे..
    दुख के पीछे सुख अथवा सुख के पिचे सुख छिपा हुआ है
    सभी धर्मों ने जितने भी वाक्य कहे है वो सब हिन्दू धर्म मे उपस्थित है...
    हिन्दू धर्म सभी धर्मों की जन नि है यह मै मानता हूं मैं कोई उच्च वर्णीय तथाकथित नही हु लेकिन परम ज्ञान यही है सभी को परमात्मा ने अलग अलग ज्ञान दिया जीस्का उद्धेश्य ईश्वर की प्राप्ति करना ही है ईश्वर मतलब स्वयम की खोज....
    एक ईश्वर वाद वाले भी पापी है बहुईश्वर वाद वाले भी पापी है कुछ अच्छे है कुछ बुरे है
    तो इस से क्या फक्र पड़ता है कि हिन्दू बहुईश्वर वाद के लिए प्रचलित है गीता में एक ईश्वर वाद की कल्पना है ये कोई प्रमाण देने की जरूरत नही है

    ज्ञान क्या आसमान से टपकेगा अगर ईश्वर नही है तो....
    बुद्ध ने कहा था ईश्वर है या नही मुझे नही पता है उनका काम सिर्फ कर्मकांडो को खंडित करना था अगर वे बताते थे कि ईश्वर है वही फिरसे कर्मकाण्ड चालू हो जाता जितने भी पुण्यात्मा हुई है उन्होंने ईश्वर के बारेमे कोई खुलासा नही किया यहां तक कि हिन्दू पुण्यात्मा ने भी
    स्वयम की खोज करो ईश्वर तुम्हारे सामने होगा....

    जैन और बुद्ध में एक ही धर्म का उचित था लेकिन परमात्मा कभी किसी पे अन्याय नही करते क्या यह सत्य नही है...
    यहूदी से इस्लाम का जन्म और जीसस का क्या यह सत्य नही है लेकिन मार्ग अलग है ये धर्म भी इसलिए बने थे
    मूल धर्मो में कुच इंसानो द्वारा भ्रमित बाते थी....
    जो इन्होंने दूर किया वैसेही हिन्दू धर्म मे भी बुद्ध जैन सिख आये...

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  47. महाभारत में विजय प्राप्त करने के उपरांत युधिष्ठिर जब राजमहल में पहुँचे तो बहुत लोग एकत्र थे उन्होंने युधिष्ठिर का स्वागत किया एक ओर बहुत से ब्राह्मणों के मध्य ब्राह्मण-वेश में चार्वाक नामक राक्षस भी खड़ा था वह दुर्योधनके परम मित्रों में से था उसने आगे बढ़कर कहा-मैं इन ब्राह्मणों की ओर से यह कहना चाहता हूँ कि तुम अपने बंधु-बांधवों का वध करने वाले एक दुष्ट राजा हो तुम्हें धिक्कार है तुम्हारा मर जाना ही श्रेयस्कर है युधिष्ठिर अवाक् देखते रह गये ब्राह्मण आपस में खुसपुसाए कि हमारी ओर से यह ऐसा कहने वाला कौन है जबकि हमने ऐसा कहा ही नही उन्हें अपमान की अनुभूति हुई तभी कुछ ब्राह्मणों ने उसे पहचान लिया उन्होंने युधिष्ठिर को आशीर्वाद देते हुए बतलाया कि वह दुर्योधन का मित्र है- राक्षस होते हुए भी ब्राह्मण-वेश में आया है इससे पहले कि युधिष्ठिर कुछ कहें ब्राह्मणों के तेज़ से जलकर चार्वाक वहाँ गिर गया वह अचेतन तथा जड़ हो गया श्रीकृष्णने बताया कि पूर्वकाल में चार्वाक ने अनेक वर्षों तक बद्रिकाश्रम में तपस्या की थी तदनंतर उसने ब्रह्मा से वर प्राप्त किया कि उसे किसी भी प्राणी से मृत्यु का भय न रहें ब्रह्मा ने साथ ही यह भी कहा कि यदि वह किसी ब्राह्मण का अपमानकर देगा तो उसके तेज़ से नष्ट हो जायेगा दूसरे ब्राह्मणों की ओर से बोलने की बात कहकर उसनेब्राह्मणों को रुष्ट कर दिया- इसी से उनके तेज़ से वह भस्म हो गया ब्राह्मणों ने सामूहिक रूप से युधिष्ठिर का अभिनंदन किया...

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  48. Chaarvaak is nothing but intellectual shit . A society can not run on chaarvaak philosophy. Society needs rules and laws chaarvaak said their is no bad fruits for bad actions their is no good fruits for good action. Their is no heaven hell. So whom should I fear. Why should I not rape and enjoy the sensual pleasure. Their is no fear because their is no god. Lol chaarvaak philosophy is nothing but a license for all crimes rape and corruption is no sin because their is no god why one will fear any body. Islam spreaded fast because of this rationalist intellectual shits

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Name

- दर्शन लाल बावेजा,1,- बी एस पाबला,1,-Dr. Prashant Arya,2,-अंकित,4,-अंकुर गुप्ता,7,-अभिषेक ओझा,2,-अल्पना वर्मा,22,-आशीष श्रीवास्‍तव,2,-इन्द्रनील भट्टाचार्जी,3,-काव्या शुक्ला,2,-जाकिर अली ‘रजनीश’,56,-जी.के. अवधिया,6,-जीशान हैदर जैदी,45,-डा प्रवीण चोपड़ा,4,-डा0 अरविंद मिश्र,26,-डा0 श्‍याम गुप्‍ता,5,-डॉ. गुरू दयाल प्रदीप,8,-डॉ0 दिनेश मिश्र,5,-दर्शन बवेजा,1,-दर्शन लाल बवेजा,7,-दर्शन लाल बावेजा,2,-दिनेशराय द्विवेदी,1,-पवन मिश्रा,1,-पूनम मिश्रा,7,-बालसुब्रमण्यम,2,-योगेन्द्र पाल,6,-योगेश,1,-रंजना [रंजू भाटिया],22,-रेखा श्रीवास्‍तव,1,-लवली कुमारी,3,-विनय प्रजापति,2,-वीरेंद्र शर्मा(वीरुभाई),81,-शिरीष खरे,2,-शैलेश भारतवासी,1,-संदीप,2,-सलीम ख़ान,13,-हिमांशु पाण्डेय,3,.संस्‍था के उद्देश्‍य,1,।NASA,1,(गंगा दशहरा),1,100 billion planets,1,2011 एम डी,1,22 जुलाई,1,22/7,1,3/14,1,3D FANTASY GAME SPARX,1,3D News Paper,2,5 जून,1,Acid rain,1,Adhik maas,1,Adolescent,1,Aids Bumb,1,aids killing cream,1,Albert von Szent-Györgyi de Nagyrápolt,1,Alfred Nobel,1,aliens,1,All india raduio,1,altruism,1,AM,18,Aml Versha,1,andhvishwas,5,animal behaviour,1,animals,1,Antarctic Bottom Water,1,Antarctica,9,anti aids cream,1,Antibiotic resistance,1,arunachal pradesh,1,astrological challenge,1,astrology,1,Astrology and Blind Faith,1,astrology and science,1,astrology challenge,1,astronomy,4,Aubrey Holes,1,Award,4,AWI,1,Ayush Kumar Mittal,2,bad effects of mobile,1,beat Cancer,1,Beauty in Mathematics,1,Benefit of Mother Milk,1,benifit of yoga,1,Bhaddari,1,Bhoot Pret,3,big bang theory,1,Binge Drinking,1,Bio Cremation,1,bionic eye Veerubhai,1,Blind Faith,4,Blind Faith and Learned person,1,bloggers achievements,1,Blood donation,1,bloom box energy generator,1,Bobs Award,1,Breath of mud,1,briny water,1,Bullock Power,1,Business Continuity,1,C Programming Language,1,calendar,1,Camel reproduction centre,1,Carbon Sink,1,Cause of Acne,1,Change Lifestyle,1,childhood and TV,1,chromosome,1,Cognitive Scinece,1,comets,1,Computer,2,darshan baweja,1,Deep Ocean Currents,1,Depression Treatment,1,desert process,1,Dineshrai Dwivedi,1,DISQUS,1,DNA,3,DNA Fingerprinting,1,Dr Shivedra Shukla,1,Dr. Abdul Kalam,1,Dr. K. N. Pandey,1,Dr. shyam gupta,1,Dr.G.D.Pradeep,9,Drug resistance,1,earth,28,Earthquake,5,Einstein,1,energy,1,Equinox,1,eve donation,1,Experiments,1,Facebook Causes Eating Disorders,1,faith healing and science,1,fastest computer,1,fibonacci,1,Film colourization Technique,1,Food Poisoning,1,formers societe,1,gauraiya,1,Genetics Laboratory,1,Ghagh,1,gigsflops,1,God And Science,1,golden number,2,golden ratio,2,guest article,9,guinea pig,1,Have eggs to stay alert at work,1,Health,73,Health and Food,14,Health and Fruits,1,Heart Attack,1,Heel Stone,1,Hindi Children's Science Fiction,1,HIV Aids,1,Human Induced Seismicity,1,Hydrogen Power,1,hyzine,1,hyzinomania,1,identification technology,2,IIT,2,Illusion,2,immortality,2,indian astronomy,1,influenza A (H1N1) virus,1,Innovative Physics,1,ins arihant,1,Instant Hip Hain Relief,1,International Conference,1,International Year of Biodiversity,1,invention,5,inventions,30,ISC,2,Izhar Asar,1,Jafar Al Sadiq,1,Jansatta,1,japan tsunami nature culture,1,Kshaya 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Science Bloggers' Association: आईये आज आपको चार्वाक के बारे में कुछ बताएं !
आईये आज आपको चार्वाक के बारे में कुछ बताएं !
भारतीय दर्शनशास्त्री चार्वाक और उनके दर्शन से परिचय कराता लेख।
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