क्या भारत में सचमुच 7000 साल पहले विमान उड़ते थे?

भारत में प्राचीन काल में वैज्ञानिक आविष्कारों के मुद्दे पर जाने-माने विज्ञान संचारक डॉ. अरविंद मिश्र की सटीक टिप्पणी।

रविवार, 5 जनवरी, 2015 को मुंबई में आयोजित भारतीय विज्ञान कांग्रेस ने ‘संस्कृत के माध्यम से भारतीय विज्ञान’ विषयक संगोष्ठी आयोजित करके और उसमें सेवानिवृत्त प्राचार्य कैप्टन आनंद जे बोदास के प्राचीन भारत में 7000 साल पहले विमान उड़ने सम्बंधी व्याख्यान कराके न सिर्फ हमारी वैज्ञानिक थाती को रसातल में पहुंचाने का कार्य किया है, वरन शेष विश्व के वैज्ञानिकों के हाथ में भारतीय मनीषि‍यों की हंसी उड़ाने का एक अन्य सुनहरा मौका भी उपलब्ध करा दिया है। इस ज्वलंत विषय पर पढ़ें जाने-माने विज्ञान संचारक डॉ. अरविंद मिश्र की टिप्पणी।  
भारतीय विज्ञान कांग्रेस का अधोपतन
भगवान के लिए हमारे पूर्वज मनीषियों का अपमान न करें! 
-डॉ. अरविंद मिश्र
अभी अभी भारतीय विज्ञान कांग्रेस का 102वां अधिवेशन मुम्बई में सम्पन्न हुआ। भारतीय विज्ञान कांग्रेस असोसिएशन का जन्म सौ वर्ष से अधिक पहले दो ब्रितानी रसायनविदों प्रोफ़ेसर जे एल सिमोन्सन (Jl SimonSan) और प्रोफ़ेसर पी एस मैकमोहन (PC MacMohan) की दूरदृष्टि और पहल पर हुआ था। असोसिएशन की पहली बैठक एशियाटिक सोसायटी कोलकाता (Asiatic Society Kolkata) के परिसर में 1914 में हुई थी। तब से प्रायः हर वर्ष इसका आयोजन भारत के विभिन्न शहरों में होता आया है और प्रधानमंत्री इसके मुख्य अतिथि होते रहे हैं. मैंने भी इस सम्मलेन में प्रतिभाग किये। यह दरसअल हर वर्ष आयोजित होने वाला वैज्ञानिकों का कुम्भ है। 

भारतीय विज्ञान कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य ही भारत में वैज्ञानिक माहौल को बढ़ावा देने का है। मगर अभी मुम्बई में संपन्न इस वैज्ञानिक कांग्रेस ने विज्ञान की चेतना को ही जैसे झकझोर दिया है। एक बड़ा वैज्ञानिक समुदाय खुद को शर्मसार महसूस कर रहा है। यहाँ बाकायदा एक सेशन प्राचीन भारत में विमान विज्ञान पर आयोजित हुआ जिसमें अज्ञानता जनित आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा पर जाकर दावे किये गए कि प्राचीन भारत में विमान सेवा उपलब्ध थी। यह जग हंसाई की एक बेजोड़ मिसाल है. प्रमाण कहाँ है भैया? बस किताबों में विमान शास्त्र का जिक्र देखकर यह कैसे माना जा सकता है कि प्राचीन भारत में तरह तरह के विमान उपलब्ध थे? किसी उत्खनन में कभी कोई टुकड़ा मिला क्या?
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दरसअल भारत में पढ़े लिखे अक्ल के अंधों की कमी नहीं है। सबसे बड़े पोंगे तो वे है जो पुष्पक विमान, ब्रह्मास्त्र आदि को सच मानते हैं और इस पर आपसे लड़ जाने को तत्पर रहते हैं -इन निरे मूर्खों से तो बात करना ही व्यर्थ है। इससे ऊपर के ज्ञानी आज के नए आविष्कारों की तुलना महाकाव्यों -पुराणों में वर्णित समान उपकरणों से करके यह बताना चाहते हैं कि ऐसा ही कुछ तो हमारे यहाँ पहले ही था।

मेरा साबका ऐसे लोगों से रोज ही होता रहता है और मैं उनकी उनकी बातें सुन सुन सिर धुनता रहता हूँ। और अब ऐसे लोग भारतीय विज्ञान कांग्रेस तक भी पहुँच कर उसका दामन दागदार कर रहे हैं। 

Pushpak Viman
पुष्पक विमान-या कल्पना की उड़ान?
दरअसल इन लोगों की पोंगापंथी के चलते हमारे प्राचीन भारत के वास्तविक अवदान भी छुप से जा रहे हैं -कौन नहीं जानता कि शून्य और दशमलव पद्धति की खोज हमने की थी, प्लास्टिक सर्जरी के आविष्कारक सुश्रत थे। मगर यह कहना कि पुष्पक विमान वास्तव में था हमारी मूर्खता का ही परिचायक है। हाँ इसके बजाय इसे अगर सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाय-यानि की हमारे पूर्वज कितने उर्वर मेधा के धनी थे कि उन्होंने पुष्पक विमान, टेस्ट ट्यूब बेबीज, क्लोनिंग, मायायुद्ध, गाइडेड मिसाइल्स आदि की आईडिया पहले ही सुझा दी थी और उनका यह मौलिक योगदान है तो बात सही परिप्रेक्ष्य में होगी, बुद्धिगम्य होगी और विश्व स्तर पर मान्य भी होगी। 

मगर हम तो इन जुगतों को सही ठहराने में अपनी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं और प्रकारांतर से अपने मनीषियों के वास्तविक अवदान का अवमूल्यन कर रहे हैं, उनका अपमान कर रहे हैं। 

ऐसे लोगों को पता नहीं कि वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय ने ई वी डैनिकन के 'चैरियट आफ गॉड्स' में किये गए ऐसे ही दावों को क्षद्मविज्ञान की श्रेणी में काफी पहले ही डाल रखा है। हम एक ऐसा ही दुष्चक्र और रच रहे हैं और संभवतः प्रायोजित और निहित उद्देश्य पूर्ति में लग गए हैं। यह समय है जब हमें ऐसे तत्वों से सावधान रहना है जो वस्तुतः हमारी वैज्ञानिक थाती को ही रसातल में पहुँचाने लग गए हैं। 

माननीय प्रधानमंत्री जी भी कृपया ध्यान दें क्योंकि भारत में वैज्ञानिक चेतना या मनोवृत्ति को बढ़ाने में वे नेहरू जी की परम्परा में आसीन हैं जिन्होंने समूचे विश्व को 'साइंटिफिक टेम्पर' की अभिनव सोच दी थी!
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COMMENTS

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  1. अरविंद जी को ​बधाई. व्यक्ति इसलिए अज्ञानी नहीं होता कि उसे ज्ञान के अवसर प्राप्त नहीं होते. बल्कि इसलिए भी ज्ञान—वंचित रह जाता है क्योंकि वह अपने अज्ञान को ढोते रहने की आदत पाल लेता है. निस्संदेह, भारत प्राचीन काल में कई क्षेत्रों में आगे था, मगर उस संपदा को गंवाने में ऐसे ही दुराग्रही लोगों का बड़ा योगदान था, जो अपने आगे किसी की कुछ भी सुनने को तैयार न थे.
    जाकिर भाई को भी बधाई. एक श्रेष्ठ वक्तव्य को प्रकाशित करने के लिए

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  2. वैज्ञानिक परिकल्पना(Hypothesis), विज्ञान(Science) और तकनीक(Technology) तीनो मे जो अंतर है जो अधिकतर लोग समझ नही पाते है। पुराणो और मिथको मे "वैज्ञानिक परिकल्पना" की पूरी संभावना है। लेकिन उनके समर्थन मे वैज्ञानिक सिद्धांत हो आवश्यक नही। यदि वे वैज्ञानिक सिद्धांत से समर्थित हो तब भी तकनीकी रूप से संभव हो आवश्यक नही है।
    जैसे हम जानते है कि "समय यात्रा" वैज्ञानिक रूप से संभव है लेकिन तकनीक का क्या करें ? उसके लिये तकनीक अगले हजार वर्ष मे बन पाना संभव नही लग रहा ना! इसके लिये एच जी वेल्स साहब को समय यान का आविष्कारक तो नही कह सकते!
    यही बात पुराण के विमान, ग्रीक मिथको के यान, अरब के उड़न कालीन जैसी बातो पर लागु होती है। ये सब सैद्धांतिक रूप से संभव है लेकिन तकनीकी रूप से उस काल मे तो संभव नही थी।

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  3. अरविंद जी का आलेख सामयिक है। इस पर खुल कर चर्चा की जानी चाहिए।अरविंद जी क्या आपने उस पुस्तक को देखा है जिसकी उल्लेख कैप्टन आनंद जे बोदास ने किया। किस क्षेणी की पुस्तक है विज्ञान कथा तो नहीं। कुछ मिश्र धातुओं का उल्लेख हुआ है उनकी संभावना को जाँचना आज कठिन कार्य नहीं है।सच तो निकाला जाना चाहिए आपको इस पर भी प्रकाश डालना चाहिए तभी बात पूरी हो पाएगी।

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  4. यदि हम अपने पुराणो में बतायी गयी बातो को माने तो इसमें कोई शक नही की हमारे ऋषि मुनि ज्ञानी थे , हम उनका सम्मान करते हैं !

    लेकिन आधुनिक विज्ञान एक अलग विषय है इसको पौराणिक मान्यताओ से अलग रखना ही बेहतर है ,आधुनिक विज्ञान के आविष्कार को जिस तकनीक , जिन मूल सिद्धांतो, जिन फॉर्मूलों और गणनाओ के आधार पर बनाया गया है, उनको बनाने का कोई मंत्र या विधि पुराणो में नही है , उनका दूर दूर तक कोई जिक्र नही है पुराणो में , इसलिए इन आविष्कारो का पौराणिक काल में मौजूद चीज़ो से तुलना करना सही नहीं है, किन्तु कुछ लोगो को जब ये बात अच्छी नही लगती कि आज वैज्ञानिक अपनी मेहनत और काबलियत के आधार पर सफल है , या फिर आधुनिक विज्ञान में किसी चीज़ का आविष्कार अन्य देश के वैज्ञानिक ने किया है तो वो ऐसे मौको कि तलाश में रहते है जिसकी तुलना वो भारतीय पुराणो में कही गयी चीज़ो से करके अपनी बात को श्रेष्ठ साबित कर सके !

    अभी 2 दिसंबर 2014 को उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद श्री पोखरियाल निशंक जी ने भरी लोकसभा में हमारे विज्ञान की इज्जत तार तार कर दी , उन्होने कहा कि " विज्ञान , ज्योतिष के आगे बौना है ", वो यही नही रुके उन्होने ये भी कह दिया कि परमाणु बम आज से लाखो वर्ष पहले से भारत में मौजूद है उसका परीक्षण संत कणाद ने किया था !

    अरे भाई आज के युग में जिन वैज्ञानिको के आविष्कारो कि वजह से हमको सुविधा है उनको थोड़ा महत्व देने से हमारे भारतीय पुराणो का कोई अपमान नही होगा !

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  5. चतुर्वेदी जी कृपया इस लिंक पर जाकर पढ़ें

    http://www.downtoearth.org.in/content/did-our-ancestors-fly-airplanes#.VK3VLPZKyLA.twitter

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  6. इनके लगातार ऐसे आधारहीन और हास्यास्पद दावों के बीच सच्ची उपलब्धियों पर भी लोग यकीन करना छोड़ देंगे...

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  7. आधारहीन और हास्यास्पद कहना जल्दबाजी होगी। पिरामिड है मगर कैसे बने कौन जानता है। अनेक प्राचीन रहस्यों से पर्दा उठना शेष है। हमें पश्क्ष विपक्ष बने बिना सोचना होा।प्रमाणों की अनुपस्थिति किसी के नहीं होने का प्रमाण तो नहीं होसकती है। ( Absence of evidence is not evidence of absence )

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  8. प्रत्‍येक आवि‍ष्‍कारक पहले दुनि‍या के हास्‍य का पात्र बनता है। बाद में उसीके सिदधांतों का स्‍वीकार होता है। सबसे पहलेे जि‍सने यह कहा था कि‍ धरती सपाट नहीं गोल है उसका पूरी दूनि‍या मजाक उडाया था। कई वैज्ञानि‍कों को तो केवल इस लि‍ए फांसी चढा दि‍या गया क्‍योंकि‍ उन्‍होंने परंपरा से हटकर सोचा था । ज्ञात हो कि‍ डा बोडास ने प्राचीन भारत में केवल वि‍मान होने की बात नहीं कि‍ वरन् रि‍वर्स गि‍यर के वि‍मानों का दावा कि‍या है। जि‍सपर आज तक रि‍सर्च नहीं हुआ है। भवि‍ष्‍य में जब नासा/अमेरि‍का रि‍वर्स गेयर के वि‍मान बना लेंगे तो हमें इस बात पर वि‍श्‍वास होगा। लेकि‍न तब तक बहुत देर हो जायेगी और हम भारतीय पछताते रह जायेगे। ज्ञात हो कि‍ जि‍न बोसान कणों पर पि‍छले दो-तीन वर्षों से रि‍सर्च जारी है, वह हमारे देश के महान वैज्ञानि‍क डा. जगदीश चंद्र बोस की ही है उन्‍होने आइनस्‍टाइन को इस के बारे में पत्र भी लि‍खा था अधि‍क जानकारी के लि‍ए आप स्‍वयं शोध करें। वि‍षय पर इतना कहना पर्याप्‍त है।

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  9. मुझे विश्पवसनीय स्त्रोतों से ज्ञात हुआ है कि विमानशास्त्र पुस्तक नासा ने नीजि तरिके से मंगवाई थी। विमान नहीं थे तो ऋग्वेद में विमानों का उल्लेख किस कारण हुआ क्या कोई इस पर प्रकाश डालेगा।

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  10. विष्णु जी ने सच ही कहा है---आधारहीन और हास्यास्पद कहना जल्दबाजी होगी। पिरामिड है मगर कैसे बने कौन जानता है। अनेक प्राचीन रहस्यों से पर्दा उठना शेष है। हमें पश्क्ष विपक्ष बने बिना सोचना होा।प्रमाणों की अनुपस्थिति किसी के नहीं होने का प्रमाण तो नहीं होसकती है। ( Absence of evidence is not evidence of absence )

    राहुल ने भी सच कहा----भवि‍ष्‍य में जब नासा/अमेरि‍का रि‍वर्स गेयर के वि‍मान बना लेंगे तो हमें इस बात पर वि‍श्‍वास होगा। लेकि‍न तब तक बहुत देर हो जायेगी और हम भारतीय पछताते रह जायेगे।
    ----- क्या जिस पेड़ से गिरे फल के करण न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण की खोज की वह दोनों साक्ष्य आज मौजूद हैं ?
    --- क्या नज़ाक है ये कथा वाले स्वयं तो कल्पित विज्ञानं कथाएं लिखते रहते हैं औए भारतीय शास्त्रों में लिखी हुई कथाओं में उन्हें कोइ विज्ञान का तत्व नहीं दिखाई देता ------
    -------ये आजकल के जो विज्ञान कथा वाले हैं या विज्ञान की खोजों की नक़ल यहाँ लिखते रहते हैं उनका वास्तव में विज्ञान से कोइ सम्बन्ध नहीं है ,,,,न उन्हें विज्ञान के इतिहास व विज्ञानं की तात्विक जानकारी है ..अतः व्यर्थ के सवाल उठाते रहते हैं ..... पहले वे संस्कृत के साहित्य को पढ़ें |

    - माना हमें नक़ल करने की बुरे आदत है,
    गैर के नक़्शे कदम पे चलने की बुरी आदत है |


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  11. विज्ञान कांग्रेस की स्थापना विज्ञान के नए नए आयामों, एतिहासिक पृष्ठभूमि, साहित्य व व्यवहारिक जीवन से सम्बन्ध की परख व उत्कर्ष के हेतु की गयी थी या सिर्फ पाश्चात्य वैज्ञानिकों की नई-पुरानी खोजों की प्रशंसा गाथा हेतु....

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    1. he paper published by IISc analysed these inventions and considered all of them as impractical and non-feasible for flight because they did not adhere to basic principles of physics. This treatise has an interesting history.

      read-----http://www.downtoearth.org.in/content/did-our-ancestors-fly-airplanes#.VK3VLPZKyLA.twitter

      --- I do not accept the version of these investigaters....

      ---what are the basic principles ---- the described by todays scientists ---- why these principles be taken as a truth.... The principles in those days must have been different and more advanced then today......

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  12. read------http://www.downtoearth.org.in/content/did-our-ancestors-fly-airplanes#.VK3VLPZKyLA.twitter

    ---- यह एक ब्लॉग है ...प्रामाणिक लिंक नहीं ....
    ---निष्कर्ष स्वीकार्य नहीं है...
    ---जांचकर्ता ने आधुनिक वैज्ञानिक बेसिक सिद्धांतों पर जाँच की है...जो अभी स्वयं में ही आधे-अधूरे हैं.... प्राचीन वैज्ञानिक नियम इनसे अधिक अडवांस रहे होंगे ....
    -----

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  13. श्याम गुप्ता आप जैसे ही अधकचरे ज्ञानवाले महानुभावों ने भारतीय प्राचीन विज्ञान की भी ऐसी की तैसी करके भारत की
    जगहंसाई करवाई है -आप कोई और काम नहीं कर सकते ? अगर नहीं कर सकते तो चुप रहिये -मानवता आपकी चिर ऋणी रहेगी!

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    Replies
    1. अरविद जी --- जब आप जैसे विना ज्ञान वाले लोग बोलेंगे तो क्या कहें--
      बीते काल बसंत ऋतू भये कीर-पिक मौन ,
      अब दादुर वक्ता भये हमहीं पूछिहै कौन ...

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  14. वैज्ञानिक परिकल्पना(Hypothesis), विज्ञान(Science) और तकनीक(Technology) तीनो मे जो अंतर है जो अधिकतर लोग समझ नही पाते है।

    --- यह तो हाई स्कूल का क्षात्र भी समझता है भैया जी....किन अधिकाँश की बात कर रहे हो...क्या अधिकाँश भारतीय मूर्ख हैं क्या .....

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  15. बहस यही है कि ऐसा साशस्त्र लिखा जाना भी एक उपलब्धि है. भले ही उसके सिद्धांत पर विमान बन सके या नहीं. क्योंकि लगातार परिष्कार से ही अविष्कार सम्भव है. इस बात की प्रशंसा के स्थान पर मजाक उड़ाना गलत है. उस काल में हवा के सहारे उड़ने वाले यंत्र की कल्पना ही बड़ी उपलब्धी है. कितने लोग जानते थे कि इस तरह की किताब है भी. तो यह एक उपलब्धी रही कि बहुत कुछ अज्ञात से बाहर आया है.

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  16. क्या वाकई ऐसा व्याख्यान उस मंच से दिया गया? अविश्वसनीय सा लगता है। यह ओझा-सोखा और मदारियो-संपेरों का देश अपनी छवि को वैसी ही बनाये रखने के लिए कमर कस चुका है क्या इस मोदी राज में? हद है जी।

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  17. Respected sir
    Ho sakta hai us samay me kisi bade janwar ke jariye viman udaya jata hoga ye kon janta hai
    Vaise bhi kitabo me kaha jata hai ki
    Bahot samay pahle dharti pe dayna shor jaise bade pakshi hua karte the

    SORRY
    FOR THIS COMMENT

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  18. सबसे पहले तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि किन-किन विषय-वस्तुओं को प्रमाण की आवश्यकता होती है ? सिद्धांत, नियम, तथ्य, कथन, खोज, सूत्र, तकनीकी ज्ञान और जानकारियों के लिए प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं। अर्थात प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जैसा की ऊपर की पंक्तियों से स्पष्ट है कि ये सभी आठों बिना प्रमाण के समाज में नहीं स्वीकारे जाते हैं। और न ही ये आठों प्रत्यक्ष अर्थात भौतिक अवस्था में पाए जाते हैं। जिनकी उपस्थिति को हम छूकर, देखकर या सूंघकर ज्ञात कर लेते। इसलिए हम इनकी उपस्थिति की प्रमाणिकता को अपनी समझ को विकसित करके स्वीकारते हैं। जिनमें से साक्ष्य विज्ञान का सबसे कम विश्वसनीय प्रमाण है। भले ही न्यायालय में साक्ष्य को बहुत अहमियत दी जाती हो। परन्तु विज्ञान में साक्ष्य देने का तरीका सबसे कम विश्वास करने योग्य माना जाता है। आप १९८६ की चर्चित फिल्म "एक रुका हुआ फैसला" को देखकर यह अनुमान लगा सकते हैं कि साक्ष्य को विज्ञान में कम अहमियत क्यों दी जाती है। इस फिल्म में १९ वर्षीय एक लड़के को उसके पिता की हत्या के आरोप में सजा देने से पहले इस केस के पुनः अध्ययन के लिए १२ अलग-अलग पेशे के लोगों को न्यायलय द्वारा कहा जाता है। न्यायलय द्वारा यह शर्त रखी जाती है कि आप सभी १२ लोगों को कसूर या बेक़सूर के लिए एक मत होना पड़ेगा। फिल्म की शुरुआत में ही ११ व्यक्ति एक मत होकर उस लड़के को कसूरवार ठहराते हैं। जबकि शेष एक व्यक्ति की समझ उस हत्या की घटना का स्पष्ट चित्रण बना सकने में असमर्थ थी। इसलिए उस व्यक्ति ने कुछ भी न कह सकने की स्थिति में उस कथन अर्थात वह लड़का कसूरवार है, को नहीं स्वीकारा। निश्चित नहीं होने की स्थिति में उस व्यक्ति ने घटना के पुनः अध्ययन की मांग उठाई। और फ़िल्म के अंत में वह लड़का दोषमुक्त ठहराया गया। जबकि फिल्म में एक से अधिक घटना के साक्षी अर्थात साक्ष्य को गवाह के रूप में दिखाया गया है। तो फिर विज्ञान में साक्ष्य को किस स्थिति में स्वीकारा जाता है ? और किन कारणों से अस्वीकारा जाता है ?

    संबंधित लेख : प्रमाण प्रस्तुत करने के तरीके । विज्ञान के अनुप्रयोग
    www.basicuniverse.org/2015/01/Praman-Dene-ke-Tarike.html । www.basicuniverse.org/2015/01/Vigyan-ke-Anuprayog.html

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  19. यह लेख नजर से छूट गया था आज पढ़ने को मिला। हमें अपने पूर्वजों का सम्मान करना चाहिए परंतु मूर्खतापूर्ण दावों से उनका मज़ाक बनाने से बचना जरूरी है

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  20. iase log har dharm aur har jati me maujud hai jo apne dharm aur jati ki shrethta sabit karne ke liye unke prachin grantho me varnit kahanio ka sahara lete hai aur ye btlane ki chesta karte hai ki dekho ham duniya se kitne aage the hmari jaati kitni budhiman thi. jaruri hai vartman me jiya jaye aur aaj ke vikash ke bare me socha jaye

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Name

- दर्शन लाल बावेजा,1,- बी एस पाबला,1,-Dr. Prashant Arya,2,-अंकित,4,-अंकुर गुप्ता,7,-अभिषेक ओझा,2,-अल्पना वर्मा,22,-आशीष श्रीवास्‍तव,2,-इन्द्रनील भट्टाचार्जी,3,-काव्या शुक्ला,2,-जाकिर अली ‘रजनीश’,56,-जी.के. अवधिया,6,-जीशान हैदर जैदी,45,-डा प्रवीण चोपड़ा,4,-डा0 अरविंद मिश्र,26,-डा0 श्‍याम गुप्‍ता,5,-डॉ. गुरू दयाल प्रदीप,8,-डॉ0 दिनेश मिश्र,5,-दर्शन बवेजा,1,-दर्शन लाल बवेजा,7,-दर्शन लाल बावेजा,2,-दिनेशराय द्विवेदी,1,-पवन मिश्रा,1,-पूनम मिश्रा,7,-बालसुब्रमण्यम,2,-योगेन्द्र पाल,6,-योगेश,1,-रंजना [रंजू भाटिया],22,-रेखा श्रीवास्‍तव,1,-लवली कुमारी,3,-विनय प्रजापति,2,-वीरेंद्र शर्मा(वीरुभाई),81,-शिरीष खरे,2,-शैलेश भारतवासी,1,-संदीप,2,-सलीम ख़ान,13,-हिमांशु पाण्डेय,3,.संस्‍था के उद्देश्‍य,1,।NASA,1,(गंगा दशहरा),1,100 billion planets,1,2011 एम डी,1,22 जुलाई,1,22/7,1,3/14,1,3D FANTASY GAME SPARX,1,3D News Paper,2,5 जून,1,Acid rain,1,Adhik maas,1,Adolescent,1,Aids Bumb,1,aids killing cream,1,Albert von Szent-Györgyi de Nagyrápolt,1,Alfred Nobel,1,aliens,1,All india raduio,1,altruism,1,AM,18,Aml Versha,1,andhvishwas,5,animal behaviour,1,animals,1,Antarctic Bottom Water,1,Antarctica,9,anti aids cream,1,Antibiotic resistance,1,arunachal pradesh,1,astrological challenge,1,astrology,1,Astrology and Blind Faith,1,astrology and science,1,astrology challenge,1,astronomy,4,Aubrey Holes,1,Award,4,AWI,1,Ayush Kumar Mittal,2,bad effects of mobile,1,beat Cancer,1,Beauty in Mathematics,1,Benefit of Mother Milk,1,benifit of yoga,1,Bhaddari,1,Bhoot Pret,3,big bang theory,1,Binge Drinking,1,Bio Cremation,1,bionic eye Veerubhai,1,Blind Faith,4,Blind Faith and Learned person,1,bloggers achievements,1,Blood donation,1,bloom box energy generator,1,Bobs Award,1,Breath of mud,1,briny water,1,Bullock Power,1,Business Continuity,1,C Programming Language,1,calendar,1,Camel reproduction centre,1,Carbon Sink,1,Cause of Acne,1,Change Lifestyle,1,childhood and TV,1,chromosome,1,Cognitive Scinece,1,comets,1,Computer,2,darshan baweja,1,Deep Ocean Currents,1,Depression Treatment,1,desert process,1,Dineshrai Dwivedi,1,DISQUS,1,DNA,3,DNA Fingerprinting,1,Dr Shivedra Shukla,1,Dr. Abdul Kalam,1,Dr. K. N. 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Science Bloggers' Association: क्या भारत में सचमुच 7000 साल पहले विमान उड़ते थे?
क्या भारत में सचमुच 7000 साल पहले विमान उड़ते थे?
भारत में प्राचीन काल में वैज्ञानिक आविष्कारों के मुद्दे पर जाने-माने विज्ञान संचारक डॉ. अरविंद मिश्र की सटीक टिप्पणी।
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Science Bloggers' Association
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