होलिका दहन: आप भी इसके गुनहगार तो नहीं ?

आज शाम के होलिका दहन के लिए चाहे आप लकड़ी लाएँ, चंदा दें या भूनने के लिए जौ की बालियां लाएँ अथवा यूँ ही ...


आज शाम के होलिका दहन के लिए चाहे आप लकड़ी लाएँ, चंदा दें या भूनने के लिए जौ की बालियां लाएँ अथवा यूँ ही खड़े होकर मजा लें। आप दो पेड़ों की हत्‍या के गुनाह में शामिल हो रहे हैं। क्‍योंकि सोसाइटी के पार्क या मोहल्‍ले के चौराहे पर जलने वाली एक होली में औसतन दो पेड़ों जितनी लकड़ी खाक हो जाती है।

जब पूरा देश रंगों में सराबोर होने से पहले होलिका दहन का मजा लेता है, तो वो एक करोड़ पेड़ों के सामूहिक राह संस्‍कार में शामिल हो रहा होता है। टॉक्सिक लिंक की विशेषज्ञ डॉ0 रागिनी शर्मा के अनुसार, इसमें कोई संदेह नहीं कि 50 लाख होलिकाएँ हर साल जलती होंगी। यदि पर्यावरण मंत्रालय की परिभाषा देखें तो इतने पेड़ों के कटने का मतलब है 300 हेक्‍टेयर वन क्षेत्रफल का साफ हो जाना।

भारतीय वन्‍य जीवन संस्‍थान, देहरादून के वैज्ञानिक डॉ0 सुभाष नौटियाल कहते हैं कि एक होलिका में डेढ़ पेड़ का ही औसत जोड़ें, तो अकेले देहरादून में ही 400 पेड़ होलिका दहन की भेंट चढ़ जाते हैं। बुराई मिटाने के लिए छोटी होली पर यानी शनिवार को होलिका दहन किया जाएगा। बुराई मिटेगी या नहीं यह बहस का विषय है, पर इतना तय है कि हम नहीं चेते तो पर्यावरण ज़रूर मिट जाएगा।

होलिका दहन-कुछ चिंताजनक तथ्‍य
एक आम के पेड़ की औसत आयु 100 साल होती है। एक आम का पेड़ पूरे जीवन में लगभग 1250 क्विंटल आम प्रदान करता है, जिनकी आज के हिसाब से कुल कीमत होती है लगभग 06 लाख रूपये। 

एक पेड़ अपने पूरे जीवन में लगभग 2 टन कार्बन सोखता है और पर्यावरण संतुलन के लिए आवश्‍यक पक्षियों को बसेरा तथा मनुष्‍यों एवं जानवरों को छाया प्रदान करता है। 

होलिका दहन पर प्रत्‍येक होलिका में औसतन 100 किलो लकड़ी जलती है तथा औसतन दो पेड़ों का सफाया हो जाता है।
हर साल होली में लगभग 50 लाख होलिकाऍं जलती हैं, जिससे लगभग एक करोड़ पेड़ भस्‍म हो जाते हैं। इसकी वजह से देश में प्रतिवर्ष लगभग 300 हेक्‍टेयर वन क्षेत्रफल का सफाया हो जाता है।
होलिका जलने से प्रतिवर्ष देश में 25 हजार टन ग्रीन हाउस गैसों का इजाफा होता है।
-मदन जैड़ा/भास्‍कर उप्रेती (साभार:हिन्‍दुस्‍तान)

आइए सोचें कि क्‍या हम महज इन स्थितियों के तमाशबीन बने रहेंगे अथवा होली को उसके वास्‍तविक स्‍वरूप (कृषि यज्ञ) में मनाए जाने की पहल करके धरती को बचाने के लिए आगे आएंगे?
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COMMENTS

BLOGGER: 96
  1. मैं तो शामिल हूँ इस गुनाह में पर कुछ नहीं कर सकता

    कमेन्ट में लिंक कैसे जोड़ें?

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  2. -----एक मूर्खतापूर्ण सोच है...अग्यानी लोगों की....होली पर हरे पेड नहीं काटे जाते...बडे पेडों की सिर्फ़ डालियां काटी जाती है जिनसे पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुंचती..वास्तुतः होली पर्यावरण-संतुलन का वैग्यानिक त्योहार है... ..जौ-चना आदि भूनने से/ जला डलने से भी अन्न वाष्पित होकर वातावरण को शुद्ध करता है....अधिकान्श कूडा-करकट ही जलाया जाता है जिसे अन्य देश व सम्प्रदाय समुद्र में या कहीं और फ़ैण्क कर पर्यावरण को हानि पहुचाते हैं ....जगह जगह अग्नि जलने से वातावरण शुद्ध होता है एवं मच्छर आदि कीटों से छुटकारा मिलता है....

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  3. Shyam gupta ji, kaun si duniya men rahte hain aap? Jara ghar se baahar nukar kar dekhen, shaayad aapki aankhen khul jaayengi.

    Haqeekat jaane ke liye aap is link ko bhi dekh sakte hain, jiska photo maine swayam liya hai:
    वृक्षों की असामयिक मौत.

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  4. ठीक कहा आपने. आपकी चिंता में शामिल हूँ. मेरे विचार में होलिका दहन के बिना भी होली मनाई जाती है और मनाई भी जा सकती है !

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  5. This comment has been removed by the author.

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  6. आपकी चिंता सही है ...गोबर के उपलों से बनी छोटी सी होली से भी रस्म निभाई जा सकती है ...व कुछ गरीब लोग को लाभ भी मिलेगा (उपले बेच कर )....हम घर मे ऐसी ही होली त जलाते है ...कम से कम हम पेड़ काटने के गुनाह मे सामिल नही ..

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  7. पर्व जीवन मे नया उत्साह भरते है थोडा सा बदलाव जरुरी है समय के साथ ...व पूरा आनंद लिया जा सकता है इनका ......

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  8. लोगों को जागरूक करना ज़रूरी है। व्यक्तिगत स्तर पर पहल से ही धीरे-धीरे बात बनेगी।

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  9. वक्त अमल करने का है,अन्यथा पर्यावरण की चिंता बेमानी है।

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  10. yae bhramak jaankari haen

    holi mae gobar kae upalae jalayae jaatey haen

    ghar kaa tuta phutaa ladki kaa samaan jalayaa jataa

    is samay padaedo ko chhanta jaataa kyuki pattiyaan gir rahii haen wo chhataaii holi mae jalayee jaatee haen


    this article is not correct . no one cuts trees for holi

    cowdung cakes are used , old broken wood furniture , waste wood is used

    and this is the time when trees shed leaves so trimming is done to give shape to trees and take away dead wood which is again burnt in holi

    zakir this a wrong approach altogether to bemone the hindu fsetival

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  11. हरे पेडों को काटना अपराध है इसके विरुद्ध आवाज उठानी ही चाहिए !

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  12. होलिका दहन के लिए पेड़ों का काटा जाना ज़रूरी नहीं है, गोबर के उपलों से भी काम चलाया जा सकता है, हमारे गाँव में होलिका दहन हमारे मौहल्ले में हमारे घर के ठीक सामने होता है. और वहां हमेशा उपलों का ही प्रयोग होता है.... लेकिन अज्ञानतावश शहरों में लोग लकड़ी का इस्तेमाल कर रहे हैं.

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  13. रचना जी पता नहीं कौन सी दुनिया में रहती है जो उन्हें दिखाई नहीं देता... या शायद देखना नहीं चाहती. मैं तो अभी घर से थोडा ही दूर गया तो देखा कि जगह-जगह पेड़ों के कटे हुए गुद्धे लगे हुए थे, वह कहें तो कुछ फोटो खींच कर दिखाए जा सकते हैं... लेकिन मुझे लगता है कि यह सब अज्ञानता वश ही होता है...

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  14. होली को उसके वास्‍तविक स्‍वरूप मैं ही मानना चाहिए. रचना जी शायद अमेरिका या कनाडा से ताल्लुक रखती है वरना हिन्दुस्तानी को यह बताना ज़रूरी नहीं की होलिका दहन कैसे हुआ करता है?

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  15. वैसे तो मैं प्रतीकों के खिलाफ बोलता हूँ पर पर्यावरण के संरक्षण के लिए मैं प्रतीकात्मक होलिका दहन का समर्थन करूंगा. आपको और आपके परिजनों को बिह होली की बहुत बहुत शुभकामनाये और बधाई.

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  16. समाज में कुछ लोगों के आंखें नहीं होतीं, पर कुछ लोगों की आंखे होते हुए भी नहीं दिखता, दुर्भाग्यवश ऐसे ही लोगों में डॉ0 श्याम गुप्ता और रचना का नाम शामिल है! ये इस सामाजिक बुराई को न देखकर एक तरह से इसका समर्थन ही कर रहे हैं!
    गुप्ता जी तो पुराने कीडे हैं, तस्लीम और साइंस ब्लॉगर असोसिएशन की हर बात को आंख मूंद कर गलत बताना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है! ईश्वर जाने कौन सी डॉक्टरी पढी है इन्होंने?
    लेकिन रचना मैम का मामला समझ में नहीं आता! स्वयं को नारीवादी बताती हैं, स्त्रियों को लेकर हमेशा बल्लम लिए घूमती हैं, लेकिन अन्य बुराईयां इन्हें दिखाई ही नहीं देतीं!
    ऐसे में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि हे ईश्वर इन्हें सदबुद्धि दे, जिससे ये बुराई भले ही न देख पाएं, पर उसका समर्थन कर अपनी बुद्धिमत्ता पर तो सवाल न उठवाएं!

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  17. एक बात और, मैंने आज अपनी कालोनी में घूम कर देखा, सिर्फ सेक्टर 7, जिसमें मैं रहता हूं, के एक किलोमीटर की परिधि में 6 होलिकाएं सजी हुई हैं और सभी में हरे पेड काट कर डाले गये हैं! मैंने कैमरे से कुछ फोटो खींचे कि चलें बिना आंख वालों को दिखाया जाए, पर कमबख्त कार्ड रीडर बोल गया! इसलिए दो दिन पहले खींचा गया एक फोटो ही लगा रहा हूं! शायद इस फोटो में पडी हरी डालियां इन लोगों को नजर आ पाएं!

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  18. "zakir this a wrong approach altogether to bemone the hindu fsetival"
    रचना मैडम को एक बात और बताना चाहूंगा कि यह लेख मेरा लिखा नहीं है, इसे हिन्दुस्तान अखबार ने अपने पहले पेज पर स्थान दिया है! मैंने तो सिर्फ इसे यहां जगह दी है! अगर वो लेख पर ठीक से नजर भी डालतीं, तो उन्हें इतनी सी बात समझ में आ जाती और शिकायत मुझसे नहीं अखबार से करतीं!

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  19. आपने ठीक कहा ...होली की बहुत बहुत शुभकामनाये ....

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  20. विचारणीय...

    आपको एवं आपके परिवार को होली की बहुत मुबारकबाद एवं शुभकामनाएँ.

    सादर

    समीर लाल

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  21. मुझे लगता है ज़ाकिर अली जी और शाह नवाज़ दोनों डा. गुप्ता और रचना जी की बातों को समझ नहीं सके| डा. गुप्ता और रचना दोनों ही हरे-भरे पेड़ों को काटने के ख़िलाफ़ हैं, दोनों उस सामान्यीकरण का विरोध कर रहे हैं, जिसमे प्रतीत होता है, की होलिका दहन में सिर्फ हरे पेड़ ही काटे जाते हैं. जबकि अधिकतर जगहों पर गोबर के उपले, घर की पुरानी लकड़ी की वस्तुएं भी होलिका दहन में प्रयोग की जाती हैं| ध्यान देने की बात बात यह भी है कि पूरा या आधा पेड़ नहीं, बल्कि पेड़ कि कुछ सूखी या दोनों तरह की टहनियां ही काटी जाती हैं. जो कुछ समय बाद पुनः बढ़ जाती हैं| अतः पर्यावरण को कोई दीर्घावधि नुक्सान नहीं होता| दीर्घावधि नुक्सान तो तब होता है जब पूरे पेड़ ही नहीं पूरे के पूरे खेत ही विकास के नाम पर, उद्योग-धंधों के नाम पर काट दिए जाते हैं और इनमे पुनः कोई वृद्धि भी नहीं होती| क्योकि उस जगह पर बड़ी-बड़ी इमारतें उद्योग-धंधे खड़े हो चुके होते हैं| पर्यावरण का जितना ह्रास एक साल में विकास के नाम पर होता है, उसका दशमलव आधा प्रतिशत भी होली दहन के समय नहीं होता|

    लेकिन आपकी बात भी अपनी जगह ठीक है, दरअसल, कुछ नासमझ लोग अपने एरिया में होलिका दहन में हरी टहनियों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं| जो की सरासर पाप है| आपने इस और ध्यान दिलाया इसका धन्यवाद| लेकिन ज्यादा बेहतर होता कि आप अपने एरिया के लोगों को ऐसा अपराध करने से रोकते| उनको जागरूक करना जयादा बेहतर होता बजाये ब्लॉग लिखने के|

    होली की बहुत बहुत शुभकामनाये

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  22. होलिका दहन के नाम पर हरे पेंड़ों को काटना सचमुच चिंतनीय है हमारे समाज के लिए, इसका कतई समर्थन नहीं किया जाना चाहिए ! यह गुनाह है और धर्म के नाम पर यह कृत्या एक प्रगतिशील समाज के लिए कदापि उचित नहीं है ....जनजागरण द्वारा ही इसपर अंकुश लगाया जा सकता है !

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  23. यह लेखन जनजागरण का ही एक हिस्सा है , जनजागरण के कई तरीके हैं और ब्लौग लेखन भी उसमें से एक है ....आप सभी को होली की शुभकामनाएं !

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  24. सही कहा!वास्तव में हम सब मूर्ख ही हैं जो गड्ढा खोद कर भूल जाते हैं फिर बाद में भले ही उसमे गिरकर अपना नुक्सान करलें.

    ये एक जगह का नहीं हर जगह का नज़ारा है और मैंने खुद पहाडपुर (गुडम्बा लखनऊ के पास) बरगद के प्राचीन हरे पेड़ों को कटते देखा है.

    समझदारी इसी में है कि पाठकगण इस लेख के मर्म और लेखक की जायज़ भावनाओं को समझकर होली की बेतुकी परम्पराओं का त्याग करने का संकल्प लें.

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  25. इस ब्लॉग की पूरी टीम और सभी पाठकों को सपरिवार होली की बहुत बहुत शुभ कामनाएं.

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  26. i got this email from mr arvind mishra which by itself says much more




    from arvind mishra
    to रचना
    date 19 March 2011 18:03
    subject Re: [Science Bloggers' Association] New comment on होलिका दहन: आप भी इसके गुनहगार तो नहीं ?.
    mailed-by gmail.com
    Signed by gmail.com

    hide details 18:03 (3 hours ago)

    I also think same,thanks for raising your voice against this tendency
    of criticizing Hindu festivals under the guise of Science.

    On 19/03/2011, रचना wrote:
    > रचना has left a new comment on your post "होलिका दहन: आप भी इसके गुनहगार
    > तो नहीं ?":
    >
    > yae bhramak jaankari haen
    >
    > holi mae gobar kae upalae jalayae jaatey haen
    >
    > ghar kaa tuta phutaa ladki kaa samaan jalayaa jataa
    >
    > is samay padaedo ko chhanta jaataa kyuki pattiyaan gir rahii haen wo
    > chhataaii holi mae jalayee jaatee haen
    >
    >
    > this article is not correct . no one cuts trees for holi
    >
    > cowdung cakes are used , old broken wood furniture , waste wood is used
    >
    > and this is the time when trees shed leaves so trimming is done to give
    > shape to trees and take away dead wood which is again burnt in holi
    >
    > zakir this a wrong approach altogether to bemone the hindu fsetival
    >
    >
    >
    > Posted by रचना to Science Bloggers' Association at 3/19/11 5:04 PM

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  27. आपकी चिंता सही है ....पर्यावरण की और प्राकृतिक संपदा की उपलब्धता के अनुरूप त्योहारों को मनाने के तरीकों में परिवर्तन किया जाना जरूरी है...निश्चित रूप से पेडों को काटना अपराध है ....

    रंगपर्व होली आपको असीम खुशियां प्रदान करे..... शुभकामनायें !

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  28. and mr zakir ali rajneesh

    read the mail of dr arvind mishra
    i wish he had guts to put it as a comment

    no one is happy the way you are writing against hindu customs i have the guts to say

    i have not seen one single tree being cut and why did not lodge a police complaint immediately

    because you wanted to write a post on it

    i am now waiting for you to blast arvind mishra as well because if you dont do it then you are also without guts

    all those people who saw the trees being cut and did not lodge a complaint are partners into crime

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  29. इस लेख के रचियता और प्रस्तोता धन्य वाद के पात्र हैं जो सच्चाई को जन-हित में सामने लाये.
    वस्तुतः सभी जगहों पर आँखों से देखा है बसंत पंचमी से ही हरे-भरे पेड़ काट कर चौराहों पर रख दिए जाते हैं.जो लोग इससे इनकार कर रहे हैं वे डॉ.गोयबल्स के अनुयायी हैं जिनका मत है एक झूठ सौ बार बोलने से सच हो जाता है.जो यह कहते हैं पुराना फर्नीचर जलाते हैं वे महाभ्रष्ट हैं और होली के मर्म को ही नहीं समझते हैं.
    मैं एक दूसरा लेख तो नहीं लिखना चाहता परन्तु सच्चाई को बताना बेहद जरूरी है-
    होली संस्कृत के 'होला'शब्द से बना है जिसका आशय जो ,गेहूं,चना की बालियों को अग्नि में भूनना है.यह अन्न आगे ग्रीष्म की लू आदि से बचाव करता है.आम की समिधा से सामूहिक हव् न होता था.पुराने फर्नीचर या उपले नहीं जलाये जाते.प्रहलाद =प्रजा (जनता)का आह्लाद जो तभी होता है जब हिर्नाकश्याप =स्वर्ण का बिछौना है जिसका अर्थ है हिन्दी में और हिरनाक्ष्यका अर्थ है स्वर्ण पर जिसकी आँखें लगी हैं.ये दोनों चरित्र हैं न की व्यक्ति-विशेष .ह व् न में उतनी ही समिधा प्रयोग करते थे जितनी जरूरत थी आज की तरह वृक्ष नहीं काटे जाते थे.आज के सन्दर्भ में हिर्नायाक्ष और हिर्नाकश्यप का अर्थ है ब्लैक मार्केट व्यापारी,भ्रष्ट अफसरऔर नेता ,शोषक उत्पीडक शासक आदि .खम्बा=यही भ्रष्ट व्यवस्था.नरसिंह-वे वीर देशवासी जो सिंह-शावक की भांति भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड सकें जोअग्यानी है वे गुलामी के दौरान लिखे पुरानों के आधार पर अनर्गल प्रलाप करके जनता को दिग्भ्रमित करते रहेंगे.वे तो साम्राज्यवादियों का हित साध रहे हैं उनसे देश-भक्ति की अपेक्षा व्यर्थ है.

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  30. and i fully knew that it was not your post it never is like last time you picked up a post from jain website

    this is known as cunningness dear zakir to repost things in the name of science to suit your own pallet

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  31. विचारणीय पोस्ट!
    आपको होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

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  32. विजय माथुर जी ने होली की प्रतीकात्मकता को बखूबी स्पष्ट किया है, इससे अनभिज्ञ रहकर ही हम परंपरा का अंधानुकरण करते रहते हैं. होली सहित कई आयोजनों में कई स्थानीय हीरोज हरे पेड़ काट डालते हैं और प्रबुद्ध वर्ग बहस, अख़बारों में लेख आदि द्वारा अपना विरोध प्रकट करता रहता है. समाधान इस प्रक्रिया की आलोचना में नहीं इसके विरोध में मुखर होने में है. ट्विट, फेसबुक और ब्लॉग्गिंग से ही सांस्कृतिक क्रांति में हमारी भूमिका समाप्त नहीं हो जाती,कम-से-कम अपने घर के सदस्यों को इस बेवकूफाना हरकत से रोकने से तो हम शुरुआत तो कर ही सकते हैं.

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  33. rachna rachna and rachna

    !!!
    well


    मेरे विचार में होलिका दहन के बिना भी होली मनाई जाती है और मनाई भी जा सकती है

    ReplyDelete
  34. एक अच्छे मुद्दे किस तरह से छिछियाया जाता है कोई यहाँ से सीखे .अब मामले को संप्रदाय विशेष से जोड़ कर देखा जा रहा है यह बात बहुत गलत है जाकिर अली की के लेख पर इस तरह के आरोप लगाना अत्यंत जड़ता का सूचक एवं घातक है रजनीश जी ने बिलकुल सही मुद्दा उठाया है एक सनातनी होने के नाते भी मै इस बात का समर्थन कर रहा हूँ. अफ़सोस की बात है कि लोग इसे समझ नही पा रहे है. तस्लीम पर जाकिर जी ने इस मुद्दे की स्पष्ट विवेचना की है

    पता नहीं यह जड़ों से कटते जाने का प्रभाव है, अथवा दिखावे की संस्‍कृति का कुप्रभाव कि होली के लिए चंदा मांगने वाले और बाद में शराब के नशे में धुत होकर गली-गली घूमने वाली शोहदों की टोली को तो छोडिए अच्‍छे-खासे पढ़े-लिखे लोग भी होली की प्राचीन परम्‍पराओं से भिज्ञ नहीं हैं। और शायद यही कारण है कि हम हर साल होली के नाम पर इस तरह लाखों वृक्षों का सफाया करके आनन्दित हो रहे हैं।

    होली मुख्‍य रूप से एक ‘कृषि यज्ञ’ है, जिसमें गेहूं की फसल के पकने पर उसे गाय के गोबर से बने कंडे पर भूनकर प्रसाद के रूप में बॉंटे जाने का उल्‍लेख वेदों में मिलता है। ‘यज्ञ’ से जुड़ाव होने के कारण ही होली में आम की सूखी लकड़ी डाले जाने का वर्णन मिलता है। वैदिक काल से चली आ रही इस परम्‍परा में बाद में प्रह्लाद और होलिका जैसी ‘घटनाओं’ के जुड़ने से इसमें गर्मी के मौसम की शुरूआत में घर की साफ-सफाई के दौरान निकले कबाड़ आदि को भी होलिका के रूप में जलाने का चलन बढ़ता गया।

    इन परम्‍पराओं के पीछे मुख्‍य उद्देश्‍य यही था कि इस बहाने घर की साफ-सफाई हो जाए और घर के लोग बीमारियों से मुक्‍त रहें। लेकिन धीरे-धीरे इन परम्‍पराओं में दिखावे के घुन लग गये और होली का तात्‍पर्य येन-केन-प्रकारेण पेड़ों की लकडि़यां जुटाना मात्र रह गया। जाहिर सी बात है कि इस उद्देश्‍य की पूर्ति के लिए या तो चोरी से दूसरों के पेड़ों को निशाना बना लिया जाता है, अथवा सार्वजनिक स्‍थल पर खड़े वृक्ष इस आयोजन के शिकार होते हैं। क्‍या यह उचित है?

    रचना जी अभी आपको हिन्दू परम्पराओं के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान शायद और बढ़ाना और उसे जीना होगा. किन्तु आपके इस बात से मै पूर्ण सहमत हूँ की यदि हरे पेड़ काटे जा रहे है तो पुलिस की मदद लेनी चाहिए कल लड़के जब नर्सरी से पेड़ काट कर ले आरहे थे तो मैंने उनको बोला की हरे पेड़ ना काटो उल्टा वो मुझे ही ज्ञान सिखाने लगे और तो और फारेस्ट रेंजर इस कृत्य को पुन्य कृत्य समझ रहा था. एक बात और अभी तारकेश्वर जी ने उल्लेख किया था की होलिका में उबटन भी डाले जाते है यह उबटन शरीर की गन्दगी को साफ़ करने से सम्बंधित है जिसे होलिका में डाल दिया जाता है . वस्तुतः होलिका दहन का सम्बन्ध साफ़ सफाई और पर्यावरण संरक्षण से है.मामले को पूरी तरह समझे बिना उस पर कुछ कहना नादानियत को दर्शाता है. गुप्ता जी आप जैसे ज्ञाने पुरुष को बात घुमा कर कहना शोभा नही देता . बड़े भाई अरविन्द जी को यहाँ आकर बात कहनी चाहिए थी
    and at last Mr Salim aap is mamle par na bole to jyada achha kyoki is lekh ko padh kar samajh sako tumhare liye sambhaw nhi hai

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  35. Pawan jee aapne keha "एक अच्छे मुद्दे किस तरह से छिछियाया जाता है कोई यहाँ से सीखे .अब मामले को संप्रदाय विशेष से जोड़ कर देखा जा रहा है यह बात बहुत गलत है"
    .
    kuch log jan boojh ke aisa kar rahe hain kyon ki unko naam kamane ke liye yahee ek raasta milta hai. zakir ki post koi bhee samajh sakta hai ki sahee mudda hai lekin ka karein frustrated ,log..

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  36. होलिका दहन कि कुछ बातें सभी को जान लेनी चाहिए.
    १) होलिका घर के बाहर ही जलाई जाती है घर के अन्दर जलाना अपशगुन मना जाता है.
    २)होलिका जहाँ जलाई जाती है वहाँ महिलाओं का जाना मना है.
    ३) होलिका दहन मैं हरे भरे पेड़ काट के जलना सही नहीं है.
    ४) दुराचारी का साथ देने के कारण होलिका भस्म हुई थी यह यद् दिलाने के लिए कि दुराचारी का साथ जीवन मैं कभी नहीं देना है हम यह होलिका जलाते हैं .
    अब यदि कोई नारी यह कहे कि हम भी होलिका दहन मैं जाएंगे , बराबरी के नाम पे तो उसका यह दावा धर्म के खिलाफ होगा.
    कोई यह कहे कि हरे पेड़ काट के जलना है तो प्रकृति के साथ खिलवाड़ होगा.
    और अंत मैं दुराचारी या बुरा कौन होता है? जो खुद तो दूसरों कि बुराई करे, दूसरों के धर्म पे ऊँगली उठाए लेकिन दूसरों को ऐसा करते देख नसीहत करे. होलिका तो आज जल गयी लेकिन इस समज मैं बहुत सी होलिकाएं (बुराई) अभी मौजूद हैं वो खुद को कब बदलेंगे.

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  37. हो सकता है किसी क्षेत्र के मूर्ख लोग हरे पेडों को काटते हों, लेकिन मैनें आज तक कहीं हरे पेडों का इस्तेमाल होलिका दहन के लिये होते हुये नहीं देखा है।

    मेरे क्षेत्र में लकडी का पुराना कबाड, सूखी पुरानी जमा हुई लकडियां और गोबर के उपले से ही होली दहन किया जाता है।

    @ आदरणीय एस एम मासूम जी
    हमारे क्षेत्र में होलिका की पूजा औरते करती हैं और होलिका दहन पर भी जाती हैं।

    प्रणाम

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  38. पर्यावरण की चिंता भी ज़रूरी है।
    होली की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  39. रचना जी अभी आपको हिन्दू परम्पराओं के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान शायद और बढ़ाना और उसे जीना होगा.

    aap mae sae kitnae log jaantey haen ki holi sae 8 din pehlae ghar ki auratae { suhagnae } ghar mae gobar ke chhotae chaaote uplae aur aakritiyan paaath tee haen

    yae jab sukh jaatee haen to inko ek dhangae mae piro kar puja ki thaali mae rakhaa jaataa haen

    aur anaya saamgri kae saath pati us thaali ko holika dahan mae lae jataa haen aur whaan nayee gehun ki baali aur anay saamgri jismae gulala hotaa haen unkae saath in upllo ko jalataa haen aur phir un jalaae huae uplao ko vapas laayaa jaataa haen

    patni ghar mae un uplo ki agni ki puja kartee haen aur us kae baad pati patni rang sampapit kartey haen agni ko


    intead of giving me a lecture it would be better dr pavan k mishra that sit with some old lady above the age of 70 years and find out about the holi of lucknow and close by areas


    dont be sarcastic about other persons knowledge dr pavan k mishra does not suit a educated person like you

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  40. मामले को पूरी तरह समझे बिना उस पर कुछ कहना नादानियत को दर्शाता है.

    2007 sae maamlae par purii nazar rakhae hun dr pawan

    aur dheerae dheerae daekh rahee hun ki hindu apni puja kee vidhi hi nahin jaantey haen

    assocition banaa kar islma dharm kaa prachaar ho rahaa haen sab taali bajaa rhaey


    theek festival vaale din hamko batyaa jaa rahaa haen ki hamaarey festival mae kyaa ho rhaa haen

    afsos haen un hinduo par jo is post ko vatavarn sae jod rahey haen jab ki is ka maksad holi kae tyohaar par hinduo ki bevkoofi darshana maatr haen

    ReplyDelete
  41. HOLI JALA

    "SAVE ALL LIVE TREE"

    विजयमाथुर एवं पवन मिश्रा जी की बातों पर विचार किया जाय।
    वैसे इस पर भी गौर किया जाये। कि होली जलाने के अलावा, मनाने का त्यौहार भी है
    अगर जाकिर अली जी को गुजिये खिलाकर, भांग पिलाकर रंग गुलाल से सरोबार कर दिया जाये तो वो प्रेम उमंग के विज्ञान के कई अच्छे सिद्धांतों से भरी पोस्ट लिख सकते हैं।

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  42. kyun kyun kardee dr arivnd mishra ki mail delete kyuki sachaai samane aagayaee

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  43. ---सही कहा रचना जी ने...नतो ज़ाकिर जी, न मासूम, न सलीम जी को, न अभिशेक को होली के बारे में व होली क्या है इसके बारे में कोई ग्यान है ...यह तो है ही पर्यावरण का त्योहार ...
    ---ज़ाकिर जी बाहर जाकर होली को देखिये कहीं कोई हरा पेड कता हुआ जलता हुआ नहीं मिलेगा..
    ---होली जलाये बिना होली खेलने का क्या औचित्य?.. कोई हंसी मजाक के लिये ही थोडे ही मनाई जाती है...यह नवान्न उपज , बसन्तोत्सव, व पर्यावरण -सुधारने, रितु परिवर्तन हेतु जगह जगह केम्प फ़ायर के लिये, सब पुराने, व्यर्थ पडे लकडी, काठ, पेड ,कबाड, कपडे आदि जलाने का त्योहार है ।
    ---कुछ समय बाद लोग मां- बाप, बेटे-बहू को भी प्रतीकात्मक समझने लगेंगे---यहां तक कि...प्रेम व यौन संसर्ग भी...
    -- ज़ाकिर जी तो सदा ही अन्य लोगों की जानकारी, बिना समझे-बूझे अपने ब्लोग पर साइन्स के नाम से थोप देते हैं...खासकर हिन्दू-धर्म के बारे में...

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  44. जो लोग धर्म का मतलब ही नहीं जानते धर्मोपदेश दे रहे हैं.धर्म=जो धारण करता है उसे कहते है न की उपासना पद्धति को.वाल्मीकी रामायण में १२६ बार और रामचरित मानस में ७६ बार 'आर्य' शब्द राम हेतु प्रयुक्त हुआ है -हिंदू नहीं.'हिंदू'शब्द अरब आक्रांताओं ने पहले पहल सिंधु नदी के मुहाने पर रहने वालों के लिए प्रयुक्त किया फिर ईरानी आक्रान्ताओं ने 'फारसी'भाषा के अनुसार यहाँ के लोगों की तौहीन करने के लिए चलाया जिसे ये अज्ञानी सिरोधार्य किये फिरते हैं.
    भारतीय परंपरा में कबाड -कूड़ा हरे वृक्ष आदि नहीं जलाये जाते हैं जैसे आज के खुराफाती लोग कर रहे हैं.जो लोग विदेशी द्वारा दिया नाम चिपकाए घूम रहे हैं पूर्णतयः अभारतीय हैं.भारत का पुराना नाम 'आर्यावर्त'है इसी का उल्लेख भारतीय ग्रंथों में है.विदेशी शासकों ने भारतीयों को गुमराह करने हेतु '' पुराण 'लिखवाये थे जिनका नाम लेकर यह युद्ध चला है.पुरानों में भारतीय संस्कृति को विकृत किया गया है. 'सनातन'=सबसे पुराना यानि वैदिक मत.विद्वान कहलाकर अज्ञान का प्रचार करना गुलाम प्रवृत के लोगों का शगल है.

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  45. -- ज़ाकिर जी तो सदा ही अन्य लोगों की जानकारी, बिना समझे-बूझे अपने ब्लोग पर साइन्स के नाम से थोप देते हैं...खासकर हिन्दू-धर्म के बारे में...

    shat pratishat sahii

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  46. This comment has been removed by a blog administrator.

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  47. ये कमेन्ट कहां गया ??? मेल तो मिला हैं पर यहाँ नहीं हैं


    from arvind mishra
    to रचना
    date 19 March 2011 22:03
    subject Re: [Science Bloggers' Association] New comment on होलिका दहन: आप भी इसके गुनहगार तो नहीं ?.
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    Signed by gmail.com

    hide details 22:03 (14 hours ago)

    I am away from my pc till 23rd and wd put my views straight on post
    itself after comeback.
    (3g mob)

    On 19/03/2011, रचना wrote:
    > रचना has left a new comment on your post "होलिका दहन: आप भी इसके गुनहगार
    > तो नहीं ?":
    >
    > and i fully knew that it was not your post it never is like last time
    > you picked up a post from jain website
    >
    > this is known as cunningness dear zakir to repost things in the name of
    > science to suit your own pallet
    >
    >
    >
    > Posted by रचना to Science Bloggers' Association at 3/19/11 9:17 PM

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  48. विजयमाथुर जी एवं पवन मिश्रा जी की बातों पर विचार किया जाय।

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  49. --ये कौन सी वेपर की उडारहे हैं माथुर जी... रावण भी हिन्दू ही था अतः राम को आर्य कहा गया..आर्य जाति वाचक न होकर श्रेष्ठता वाचक शब्द है...
    ---हिन्दू शब्द बहुत प्राचीन है, अरबों, फ़ारसियों से बहुर पहले की....देखिये उदाहरण..

    १-----भारतवर्ष को प्राचीन ऋषियों ने "हिन्दुस्थान" नाम दिया था जिसका अपभ्रंश "हिन्दुस्तान" है। "बृहस्पति आगम"(जो अरबों आदि से हजारों वर्ष पहले का है.. के अनुसार:
    "हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥"
    ..अर्थात, हिमालय से प्रारम्भ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।
    २----शब्द कल्पद्रुम : जो कि लगभग दूसरी शताब्दी में रचित है ,में मन्त्र है.............
    "हीनं दुष्यति इति हिंदू जाती विशेष:"
    ....अर्थात हीन कर्म का त्याग करने वाले को हिंदू कहते है।
    ---इसीपरकार भरत( सत्युग) अर्थात कई हजारों साल पूर्व..के मान पर इस देश का नाम भारत पडा..
    ---यही तो गुलाम लोगों, काले अन्ग्रेज़ों की मानसिकता है जो सब कुछ विदेशियों के लिखे को ही प्रमाण समझते हैं...

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  50. जो लोग यह समझते हैं मैं बे-पर की उडा रहा हूँ वे स त्य से कोसों दूर हैं और अपने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं.ब्लाग जगत कोई युद्ध का अखाडा नहीं है ,यह विद्व जनों का अभिव्यक्ति-मंच है.यहाँ अभद्र भाषा का प्रयोग करके जो यह दिखाना चाहें वे ही श्रेष्ठ हैं तो अपने मुंह मियां-मिठ्ठू बनते रहें कभी सत्य का साक्षात्कार नहीं कर पाएंगे.
    अभी यहाँ एटा से पधारे -श्री रघुनाथ वैदिक भूषन,अलीगढ़ से सन्यासी केवल्य जी ,बनारस के योगाचार्य जी खुले मैदान में त्रिदिवसीय कार्य-क्रम में सिद्ध करके गए हैं-हिन्दू अभारतीय अवधारणा है.श्री शेष नारायण सिंह के 'जंतर-मंतर'एवं श्री राजेन्द्र स्वर्णकार के 'शास्वरम' का अवलोकन भी करें ;पता चल जाएगा जो अनर्गल बोल रहे हैं वे ही अंग्रेजों के भक्त हैं.
    श्री राम और वाल्मीकी मुनी आज से नौ लाख वर्ष पूर्व हुए थे और अंग्रेजों के यह प्रतिनिधि कुछ हजार वर्ष रचाए गए अनार्य ग्रंथों के हवाले से हल्ला मचा रहे हैं.

    आर्ष=श्रेष्ठ=आर्य मत का पुनरुद्धार करने वाले स्वामी दयानंद,उनके प्रिय शिष्य सरदार भगत सिंह आदि असंख्य वीरों ने देश को आजाद करने के लिए क्या इसी लिए कुर्बानी दी थी की फिर से अंग्रेजों के भक्त अपनी आर्य संस्कृति को नष्ट करके गुलामी के प्रतीकों को बंदरिया के मरे बच्चे की खाल की तरह चिपटाए घुमते और असत्य का प्रचार करते रहें?

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  51. यकीनन यह एक सार्थक और सामाजिक सरोकार से जुड़ा हुआ मुद्दा है. यथार्थ से कब तक मुँह मोड़े हम परम्पराओं को ढोते रहेंगे!!

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  52. ---क्या किसी को यह समझ में आरहा है कि माथुर जी क्या कहन चाहते हैं, एक दम अस्पष्ट, विपरीतार्थक बातें- भ्रमित मन में एसा ही होता है..
    --राजेन्द्र स्वर्ण्कार या शेष नारायण सिन्ह( ये हैं कौन?) जैसे लोगों की बात ब्रहस्पत-आगम या शब्द कल्पद्रुम जैसे स्तरीय शास्त्रीय ग्रन्थों के सामने क्या हैं ...कौन पूछता है....

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  53. Kabira is sansar men bhanti bhanti ke log...

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  54. Ek Mahatvpoorn mudde ko kaise dharm ka rang diya jata hai, koi in kaowon se seekhe...

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  55. मै मासूम जी की बात नंबर दो से इत्तेफाक नहीं रखता
    और ऐसी कोई बात से इत्तेफाक नही रखता जिसका सम्बन्ध सार्थकता से ना हो इस संसार में हर पदार्थ और विचार का एक प्रभाव होता है दुनिया के हर मानवनिर्मित वस्तु का एकमात्र उद्देश्य मानव कल्याण है (इन मानव निर्मित वस्तुओं में धर्म भी शामिल है ). शायद मैं अपनी बात गलत लोगों के सामने रख रहा हूँ या मेरी बात को लोग गलत समज रहे है. यह मुद्दा अब अपने मूल स्वरुप से भटक गया है. मुझे दो टूक बात कहनी है . पहली बात तो प्रतिक्रियावादी कभी बुद्धिमान और समझदार नही होते क्योंकि उनका कृत्य दूसरो के कृत्य पर आधारित होता है . बात नंबर दो कि यहाँ तथाकथित पढ़े लिखों रचनाकारों से ज्यादा बुद्धिमान और समझदार मेरे गाँव के रामलाल और इद्दु मियाँ और मेरी काकी है
    --

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  56. रंग के त्यौहार में
    सभी रंगों की हो भरमार
    ढेर सारी खुशियों से भरा हो आपका संसार
    यही दुआ है हमारी भगवान से हर बार।

    आपको और आपके परिवार को होली की खुब सारी शुभकामनाये इसी दुआ के साथ आपके व आपके परिवार के साथ सभी के लिए सुखदायक, मंगलकारी व आन्नददायक हो। आपकी सारी इच्छाएं पूर्ण हो व सपनों को साकार करें। आप जिस भी क्षेत्र में कदम बढ़ाएं, सफलता आपके कदम चूम......

    होली की खुब सारी शुभकामनाये........

    सुगना फाऊंडेशन-मेघ्लासिया जोधपुर,"एक्टिवे लाइफ"और"आज का आगरा" बलोग की ओर से होली की खुब सारी हार्दिक शुभकामनाएँ..

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  57. यहाँ ऐसा हुडदंग मच गया कि नुझे इन्टरनेट एक्सेस का जुगाड़ करना पड़ा जबकि मैं अपने नेटिव स्थान -गांवं में हूँ कुछ दिनों के लिए ..
    हालांकि प्रश्नगत लेख एक अखबारी खबर है और उसके अंतर्वस्तु के लिए साईंस ब्लॉगर असोसिएशन जिम्मेदार नहीं है तथापि ईशनिंदा या विभिन्न धर्मों से जुड़े त्योहारों की कथित आपत्तिजनक बातों के लिए यह उपयुक्त फोरम नहीं है -मदन जैडा के लेख से ऐसी प्रतीति होती है कि जैसे केवल हरे पेड़ों को ही होलिका में हवन कर दिया जाता है -हरे पेड़ों में एरंड -रेड जैसे वीड पेड़ों को कुछ मात्रा में होलिका में डालने की परम्परा रही है जबकि मुख्यतः सूखे पेड़ ,झाड झंखाड़ ,पत्तियाँ आदि ही होली की भेंट चढ़ती है -हरे पेड़ों को काटना कानूनी जुर्म है और inkaa होली में शहरों में
    कुछ ज्यादा सक्रिय असामाजिक तत्व करते हैं .
    तस्लीम पर यही मुद्दा है और साईंस ब्लागर्स का भी इसे हायिलायिट करने से एक धर्म के लोगों की भावनाएं आहत हुयी हैं इसके लिए मुझे दुःख है-हमें इन मुद्दों को अन्य ब्लागों पर उठाना चाहिए -अन्यथा पक्षपात पूर्ण दृष्टि अपनाने के आरोप उठेगें -जैसा की एक टिप्पणीकार ने कहा भी कि हरे पेड़ों के काटने की बड़ी चिंता है और एक त्यौहार पर लाखों पशुओं को यातनापूर्ण ढंग से मारा जाता है उसकी फ़िक्र नहीं है ..निष्कर्ष यही कि इस तरह के मुद्दे के लिए यह उचित फोरम नहीं है !

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  58. मैं माथुर जी से सहमत हूँ| सनातन धर्म [वर्तमान में जिसे हिन्दू धर्म के नाम से जाना जाता है] दुनिया का एक मात्र स्वाभाविक धर्म है, जिसकी शिक्षाएं सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हैं| यह उन अब्राहमिक [नबी या पैगम्बर मूलक] मज़हबों से अलग है, जिसकी शिक्षाएं उसके मानने वालों के लिए होती हैं, जो अपने मज़हब को श्रेष्ठ और दूसरों को तुच्छ घोषित करते हैं| क्योकि इन मज़हबों का ये विशवास होता है कि जो कोई भी इनके मज़हब को नहीं मानता वो गलत रस्ते पर होता है, शैतान के चंगुल में होता है| उसको सही रास्ते पर लाने का एक ही तरीका होता है, और वो यह कि लोग अपने धर्म/मज़हब को छोड़ कर इनका मज़हब अपनाए| ये नबी मूलक मज़हब इस प्रकार अपने मज़हब को एक ख़ास नाम देकर ही अपने और पराये मज़हब में अंतर करते हैं| इसी शिक्षा के कारण ही भारतवर्ष के आक्रमणकारियों (खासकर इस्लामी) ने इस देश के लोगों को 'हिन्दू' और उनके धर्म को 'हिन्दू धर्म' नाम देकर अपने-पराये का अंतर किया| यह नाम हिन्दू भारत कि (अब पाकिस्तान में) पवित्र नदी 'सिन्धु' के नाम पर आधारित है|

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  59. Yeh charcha post ke vishay se bhatak kar charchakar ki mansha ke ird-gird bhatak rahi hai. Holi mein log lakadiyo ke sath purane gile-shikve bhi jalate hain. Magar yahan to Holi ki mool bhavana ka hi ullanghan ho raha hai. Hindu-Muslim sanbandhon se aur v piche badhte hue Hindu dharm ki vibhinn vichardharaon ke bhi panne ulate ja rahe hain. Ped, nadi, pahad sabhi pratyek dhsrm ki aastha se jude rahe hain; aur hamare swarth tatha udaasinta se inhe pahunch raha nuksaan chupa nahin hai. Ise kisi dharmik najariye se nahin balki tarkik drishtikon se dekhne ki jarurat hai. Holika ki ek bhavana paryavaran ki bhi rahi ho, aapmein se jyadatar log sahi honge ki unke aas-pas hare ped nahi jalaye jate, magar kuch logon ke najdeek ke log utne samajhdaar nahi hain to ab kya karein. Ya to police mein complain kar sthaniya aur dharmik vaimanasya ko badhava dein, ya lekhan dwara apni bhadas nikalein; jaisaki mool lekhak aur fir Rajnish ji ne kiya. Yeh bahas matra is blog aur Parva ke swarup ko bigad rahi hai.
    Sarthakta isi mein hai ki vaicharik rup se bhi herbal holi khelein aur Rajneesh ji se bhi aagrah hai ki badlav ke liye imaandar prayastabhi hoga jab ham sabhi dharmon ki paryavaran virodhi manyataon par kuch dinon pahle se hi dhyaan khinchne ke prayas,shuru kar dein.
    (Laptop mein kuch problem aa jane ki vajah se ,mobile se hi roman mein comment karna pad raha hai. Ek baat aur kahna chahunga ki abhi to ye holika ki hi chingari hai, magar yadi milavati, rasaynik rangon ki ab baat shuru karun to kya ye bhi Hindu-Muslim chasme se dekhi jayegi ? Desh ke kitne bhagon mein herbal rangon aur fulon ki holi kheli ja rahi hai; is par aatmamanthan karne ki bajaye, khud koi pahal karne ki bajaye fir kisi Rajneesh ji ki post ka intajar karein Hum Log ! Hindu bhavnaon ka samman aatmparishkar se hai, auron ko jyada kalikh laga dilhane ki vaicharik jugali mein nahin.)
    Chaliye choriye - " Holi Mubaraq ".

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  60. आदरणीय अरविंद मिश्र जी, आपका कमेंट देखकर हतप्रभ हूं! आपने कमेंट में कई बातें कही है, जिनका क्रमवार जवाब देने की कोशिश कर रहा हूं:

    ''तस्लीम पर यही मुद्दा है और साईंस ब्लागर्स का भी इसे हायिलायिट करने से एक धर्म के लोगों की भावनाएं आहत हुयी हैं इसके लिए मुझे दुःख है''

    समझ में नहीं आता कि इसमें कौन सी भावनाओं को आहत किया गया है! मैंने इस लेख के बारे में तीन ब्राहमण विद्वानों से बात की, सभी ने इसका समर्थन किया कि पेड नहीं काटे जाने चाहिए! ऐसा किसी भी धर्म ग्रन्थ में नहीं लिखा है कि पेडों को काटकर होली जलाई जाए! यदि आपने पढा हो तो कृपया अवश्य बताएं, मैं भी अपना ज्ञानवर्धन करना चाहूंगा! वैसे भी पेडों को काटकर हम अपने पैरों पर कुल्हाडी मार रहे हैं, यह आप मुझसे अच्छे से जानते हैं! फिर अगर कुछ शरारती लोगों द्वारा होली में काट कर डाले जा रहे पेडों के विरूद्ध सजग किया जा रहा है, तो इसमें धार्मिक भावनाएं कैसे आहत हो रही हैं, कृपया समझाने की कृपा करिए!

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  61. ''जैसा की एक टिप्पणीकार ने कहा भी कि हरे पेड़ों के काटने की बड़ी चिंता है और एक त्यौहार पर लाखों पशुओं को यातनापूर्ण ढंग से मारा जाता है उसकी फ़िक्र नहीं है''

    यह एक अनानिमस कमेंट है, आपने उसे ही क्यों कोट किया, अन्य पचासों कमेंट पेड काटने के विरोध में तथा पोस्ट के समर्थन में है। आश्चर्य का विषय यह है कि आपको वे नहीं दिखे! क्यों! और जहां तक पशुओं को मारे जाने की बात है, यह भारत में प्रतिबंधित नहीं है! यदि इसे कानून द्वारा प्रतिबंधित कर दिया जाए, उसके बाद यह काम किया जाए, तो अवश्य गलत कहा जाएगा! साथ ही एक बात और जानवरों को खाने के लिए मारे जाने से न तो सीधे तौर पर पर्यावरण का नुकसान होता है, न ही उनके संरक्षण के लिए सम्पूर्ण विश्व में कोई आंदोलन चल रहा है! जबकि पर्यावरण को बचाने के लिए इस समय एक अल्पज्ञ व्यक्ति भी सजग है! आश्चर्य का विषय यह है कि आप एक प्रतिष्ठित विज्ञान लेखक होकर भी इस तरह की बातें कर रहे हैं! इसी क्रम में एक बात और कहना चाहूंगा कि यह ब्लॉग पशुओं के संरक्षण के लिए नहीं बनाया गया है! इस ब्लॉग की रचना वैज्ञानिक जानकारियों को शेयर करने के लिए की गयी है और उपयुक्त पोस्ट इसी प्रवृत्ति की है!

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  62. ''..निष्कर्ष यही कि इस तरह के मुद्दे के लिए यह उचित फोरम नहीं है!''

    अफसोस के साथ कहना चाहूंगा कि आपकी यह बात भी पूरी तरह से सही नहीं है! संस्था के गठन के समय जो उददेश्य निर्धारित किये गये थे, यह लेख उसके बिन्दु सं0 1, 3, 6 एवं 7 के अन्तर्गत आता है! आपकी सुविधा के लिए उन उददेश्यों को एक अलग पोस्ट के रूप में प्रकाशित किया गया है!

    मैं आम तौर से आपकी इस तरह की बातों को बहुत दिनों से एवाइड करने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन मुझे लगता है कि इस बार जवाब देना जरूरी हो गया था!
    आशा है आप मेरी बातों को अन्यथा नहीं लेंगे! मेरे मर्म को समझने का प्रयत्न करेंगे और अनावश्यक रूप से किसी पर आरोप लगाने से बचेंगे!

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  63. .

    होलिका दहन सिम्बोलिक है , जहाँ बुराइयों का दहन करके उसके महत्त्व को दर्शया गया है । इसके लिए होली से ४० दिन पूर्व मुख्य चौक जैसे स्थल पर लोग आते-जाते , सूखी डंडियों , टहनियों , सूखी पत्तियों आदि को इकठ्ठा करके जलाते हैं । इसके लिए हरे वृक्ष कदापि नहीं काटे जाते हैं।

    अज्ञानता हर जगह व्याप्त होती है , इसलिए यदि अज्ञानतावश कहीं पर हरे पेड़ कट रहे हैं , तो देखने वाले का दायित्व है की उसे रोके और समझाए ।

    लेकिन सिम्बोलिक होलिका-दहन से , जो सूखी पत्तियों ,टहनियों और गोबर के उपलों को जलाकर किया जाता है , उससे पर्यावरण को कोई खतरा नहीं है ।

    .

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  64. तीन ब्राहमण विद्वानों

    my god what century are we living in

    and that also on science blog where
    to authenticate something we need to discuss it with a Brahman

    does this mean that only brahmins are certified hindus

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  65. @जाकिर अली 'रजनीश'
    बात हरे पेड़ को काटने की ही नहीं है बात पशु बलि का आपके द्वारा औचित्य साबित करने के लिए है जिसके लिए आप जैन धर्म तक के संदर्भ ला देते हैं जैसा कि रचना सिंह ने इशारा भी किया है -हमें एक मजहब की बुराई दिखे तो दूसरी की भी दिखनी चाहिए तभी हम निष्पक्ष हो सकते हैं ...यहाँ भी क़ानून की दुहाई देने लगे -पर्यावरण का अर्थ समझते हैं आप ? न केवल हरे पेड़ बल्कि पशु भी मनुष्य पर्यावरण के अविभाज्य हिस्से हैं और उनकी बड़े पैमाने पर कुर्बानी उनके व्यर्थ के निस्तारण की एक बड़ी चुनौती हर वर्ष खडी करता है .अब एक धर्म की बुराईयाँ अनिवार्य रूप से दिखें और दुसरे के प्रति आँखें मूद ली जायं यह सरासर पक्षपात है -मुझे आपके इस पक्षपात पर पहले से ही लोग टोकते रहे हैं -अब मैं साईंस ब्लागर्स का संस्थापक अध्यक्ष हूँ तो मेरी भी जवाबदेही बनती ही है सो मैंने रचना सिंह के जवाब पर अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया था -रचना सिंह ने उसे यहाँ पब्लिश कर ठीक ही किया ...
    अब आप मुझे ही उन नियमों को दिखा रहे हैं जिनकी ड्राफ्टिंग ही मेरी तरफ से अनुमोदित हुयी थी -
    अब आप ब्राह्मणों की बचकानी बात कर रहे हैं -ब्राहमण की परिभाषा अगर जानते होते तो ऐसी बचकानी बात न करते -मेरे हिसाब से यहाँ कई लोग ऐसे आते हैं जो कथित ब्राह्मणों से बढ़कर हैं !
    मुझे लगता है कि अब आपकी विद्वता और क्षमता ऐसी हो गयी है की मुझे भी अपने अध्यक्षीय पक्ष को भी रखने की आवश्यकता नहीं रह गयी है ...ऐसा कीजिये रचना सिंह के सुझाव पर अमल करिए और मुझे निकाल बाहर कीजिये ...
    अब मेरी यहाँ जरुरत नहीं रह गयी लगती है ......

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  66. //जहां तक पशुओं को मारे जाने की बात है, यह भारत में प्रतिबंधित नहीं है! यदि इसे कानून द्वारा प्रतिबंधित कर दिया जाए, उसके बाद यह काम किया जाए, तो अवश्य गलत कहा जाएगा!//
    कमाल हो गया! क्या आप जीवित पशुओं को मार कर होने वाली क्रूरता को तब तक नहीं रोकना चाहेंगे जब तक कोई सरकार उस पर प्रतिबन्ध न लगा दे? इससे ज्यादा समझदार तो वो लोग हैं जो किसी जीव हत्या [या दुसरे गलत कामों] को न करने के लिए, सरकारी प्रतिबन्ध के मोहताज नहीं होते|

    // साथ ही एक बात और जानवरों को खाने के लिए मारे जाने से न तो सीधे तौर पर पर्यावरण का नुकसान होता है, न ही उनके संरक्षण के लिए सम्पूर्ण विश्व में कोई आंदोलन चल रहा है!//
    लो कर लो बात! साइंस ब्लॉग के विद्वान वैज्ञानिक! इस बात को नहीं जानते की एक जानवर को मारने से पर्यावरण को कितना नुक्सान होता है? ये सम्पूर्ण विश्व में हो रहे जीव संरक्षण , जीव हत्या बंद करो आन्दोलन के बारे में भी नहीं जानते| एक विश्वप्रसिद्ध संस्था का नाम तो मैं ही बता देता हूँ People for the Ethical Treatment of Animals-"PETA "|
    श्रीमान जी, एक जीव को मारने से न सिर्फ भूमि, बल्कि पीने योग्य जल, और वायु तीनों पे कु-प्रभाव पड़ता है| पेड़ की टहनियों को काटने से वो दुबारा आ जाती हैं, पर किसी जीव की एक भी टांग अगर काट दो तो वो दुबारा नहीं आती, उलटे जीवन भर के लिए अपंगता का दंश झेलता है|
    #“The way that we breed animals for food is a threat to the planet. It pollutes our environment while consuming huge amounts of water, grain, petroleum, pesticides and drugs. The results are disastrous.”

    David Brubaker, PhD, Center for a Livable Future, Johns Hopkins University
    Environmental News Network, 9/20/99

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  67. इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि हरे पेड़ काटना प्रकृति से खिलवाड़ है लेकिन उससे भी जघन्य अपराध है मासूम जानवरों की हत्या करना। आज भैंसों के दूध से ज़्यादा उसका मांस खाया जा रहा है जिसके कारण आज भैंसें पचास-साठ हज़ार मे मिल रही हैं।

    किसी सलीम खान का एक कमेन्ट अभी चार दिन पहले पढ़ा था कि जापान ने सबसे पहले इस्लाम पर पाबंदी लगाई थी इसी लिए सुनामी आई... इससे हास्यास्पद और नीच प्रकृति का बयान यही दर्शाता है कि लोगों की मुसीबत और परेशानी मे भी अपना हित साधना कितनी निकृष्ट सोच है।

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  68. ज्ञान के लिए चाहिए साधना और संयम और उसकी प्राप्ति के लिए चाहिए यम नियम.
    जोकि यहाँ कम लोगों में है और नारियों में भी हरेक में नहीं है . होलिका और पुराणों के बारे में ऋषि दयानंद के विचार आज मार्गदर्शक हैं परन्तु हठ और दुराग्रह के कारण लोग नहीं मानते वरना हरे तो छोडो सूखे लक्कड़ कंडे भी कहीं न जलाये जा रहे होते , फ़ालतू की आग जलाकर वैश्विक ताप में वृद्धि क्यों की जा रही है ?
    इस पर भी विचार आवश्यक है .

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  69. मैं अरविन्द जी और जाकिर जी दोनों से व्यक्तिगत तौर पर वाकिफ हूँ. अरविन्द जी अग्नोस्टिक हैं जबकि जाकिर जी नास्तिक. दोनों ही पर ये इलज़ाम लगाना की वो किसी धर्म विशेष के खिलाफ या फेवर में कुछ लिखेंगे सरासर गलत है. जाकिर जी से मेरी इस बारे में कई बार गरमागरम बहस भी हुई है क्योंकि मैं इस्लाम समर्थक हूँ जबकि जाकिर जी ईश्वर अल्लाह किसी को नहीं मानते. अतः अगर वो पेड़ों के काटने के खिलाफ लिख रहे हैं या अरविन्द जी जानवरों के सामूहिक वध पर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं तो इसे फ़क़त ग्लोबल चिंता के रूप में ही देखा जाना चाहिए. इसे धर्म से हरगिज़ नहीं जोड़ना चाहिए. मेरा दोनों महानुभावों से अनुरोध है की मतभेद भूलकर उस मिशन को आगे बढायें जिसकी देश को आज सबसे ज्यादा ज़रुरत है, यानी वैज्ञानिक जागरूकता.

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  70. Totally disagree with this article.

    विज्ञान के विषय में ज्यादा नहीं जानते हुए भी इतना जानता हूँ.. कि पर्यावरण एक चक्र में चलता है.. होलिका दहन आज से ना होंकर कई सौ सालो से हो रहा है.. जिसमे भी सिर्फ उत्तर भारत में मनाया जाता है.. प्रकृति बहुत विराट और उदार है.. एक बात और कि लकडिया पुरे साल शहर की दुकानों पर उपलब्ध रहती है..

    सबसे महत्वपूर्ण बात कि हरे पेडो को होलिका दहन के लिए कोई नहीं काटता.. कमसे कम बचपन से आज तक मैंने तो अपने आस पास नहीं देखा..

    उसके बाद की बात टिप्पणियों के आरम्भ से ही जाकिर जी, आपकी भाषा तल्ख़ होती जा रही है.. किसी लेख के प्रति सकारात्मक या नकारात्मक विचार हो सकते है.. परन्तु संतुलित बात कहकर जवाब दिया जा सकता है.. ऊपर कई कमेन्ट में मूल सन्दर्भ से भटक कर इतर बात हो रही है..

    खैर मुझे अपनी बात कहनी थी.. जिस तरह से मदन जैडा जी ने कही है.. मदन जैडा जी की बात अंतिम सत्य नहीं.. नहीं मानने वाले मूर्ख नहीं है कम से कम..

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  71. बात हरे पेड़ को काटने की ही नहीं है बात पशु बलि का आपके द्वारा औचित्य साबित करने के लिए है जिसके लिए आप जैन धर्म तक के संदर्भ ला देते हैं

    आदरणीय मिश्र जी, अव्‍वल तो आपको पशु बलि पर बात करने का नैतिक अधिकार ही नहीं बनता है, क्‍योंकि आप जानते हैं कि आप मांसाहारी हैं। और एक मांसाहारी व्‍यक्ति पशुबलि पर बात करे, यह अत्‍यंत हास्‍यास्‍पद स्थिति है। मैंने आपके इस दोहरे व्‍यक्तित्‍व से चिढ़ कर ही अपने ब्‍लॉग पर मांसाहार के समर्थन में पोस्‍ट लिखी थी, जबकि आप अच्‍छी तरह से जानते हैं कि मैं शुद्ध शकाहारी व्‍यक्ति हूँ।

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  72. अब आप मुझे ही उन नियमों को दिखा रहे हैं जिनकी ड्राफ्टिंग ही मेरी तरफ से अनुमोदित हुयी थी

    इन नियमों को दिखाने की आवश्‍यकता इसलिए आन पडी क्‍योंकि आपने उक्‍त पोस्‍ट के औचित्‍य पर सवाल उठाया था। आप पूर्व में भी एक बार इस तरह की बात कर चुके थे, इसलिए मुझे मजबूर होकर वे नियम याद दिलाने पडे।

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  73. मुझे लगता है कि अब आपकी विद्वता और क्षमता ऐसी हो गयी है की मुझे भी अपने अध्यक्षीय पक्ष को भी रखने की आवश्यकता नहीं रह गयी है ...

    अगर आपने अध्‍यक्ष की गरिमा के अनुकूल व्‍यवहार किया होता, तो मुझे कोई दिक्‍कत क्‍यों होती। आपने आते ही सीधे मुझपर इल्‍ज़ाम लगाया था, एक ऐसा इल्‍जाम, जो पूरी तरह से गलत था।

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  74. ...ऐसा कीजिये रचना सिंह के सुझाव पर अमल करिए और मुझे निकाल बाहर कीजिये ...अब मेरी यहाँ जरुरत नहीं रह गयी लगती है ...

    दु:ख तो इसी बात का है कि आपने यह व्‍यवहार उस व्‍यक्ति के उकसाने पर किया, जिसने ब्‍लॉग जगत में आपकी सबसे ज्‍यादा छीछालेदर की है।

    मुझपर इल्‍जाम लगाने से पहले अगर आपने शान्‍त मन से एक बार भी पोस्‍ट पढी होती, तो शायद आपको समझ में आता कि मैं कह क्‍या रहा हूँ। आश्‍चर्य का विषय यह है कि आपने 'साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन' के साथ 'तस्‍लीम' की पोस्‍ट को भी लपेटे में ले लिया था। जबकि उसमें किस बात के द्वारा भावनाएं आहत हुई हैं, यह बात अभी तक आपने मेरे पूछने के बावजूद नहीं बतायी है।
    जहां तक किसी भी संस्‍था में रहने अथवा जाने का फैसला है, मेरे विचार में वह व्‍यक्ति का स्‍वयं का होना चाहिए। लेकिन यदि कोई व्‍यक्ति अपने किन्‍ही पूर्वाग्रहों के कारण सभी लोगों के लिए समस्‍या पैदा करे, तो जनहित में कठोर निर्णय (पूर्व में ऐसा हो भी चुका है) लिये जाने में भी कोई बुराई नहीं होती है।

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  75. दु:ख तो इसी बात का है कि आपने यह व्‍यवहार उस व्‍यक्ति के उकसाने पर किया,

    mind your words mr jakir because
    i have neither sent a email not replied to dr mishra email
    he had sent a email to me which i published

    prove it that i have provoked dr mishra only then say such things

    i am known for my tough stands on issues and i have never cared who comments in favor of me or against me but in past you have many times commented against me withour rime or reason just because i was commenting against the post of mr mishra or mr ravindra prabhat

    you may be need "baesaakhis" to walk i dont so when wirte about me write the truth and i will accept it

    so many times you have on this blog only said "naarivadi" to me why ?? do you even know the meaning of that word and what has that to do with my writing in favor of hindu customs

    have i ever said i am not a hindu any where
    at least i am true to my issues but what about you ????

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  76. "दु:ख तो इसी बात का है कि आपने यह व्‍यवहार उस व्‍यक्ति के उकसाने पर किया"

    सुश्री रचना जी, आप इस बात से इतना उत्‍तेजित क्‍यों है, जबकि मैंने तो इसमें किसी का नाम भी नहीं लिया है?

    और हॉं, आपसे एक विनम्र निवेदन है कि कृपया अपनी बात हिन्‍दी में लिखा करें, क्‍योंकि यह हिन्‍दी का ब्‍लॉग है। साथ ही यी भी बताना चाहूँगा कि मुझे आपके जितनी अंग्रेजी नहीं आती है। इसलिए यदि आप चाहें कि आपकी बात मुझ तक पहुंचे, तो कृपया हिन्‍दी भाषा का प्रयोग करें।

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  77. ...ऐसा कीजिये रचना सिंह के सुझाव पर अमल करिए और मुझे निकाल बाहर कीजिये ...अब मेरी यहाँ जरुरत नहीं रह गयी लगती है ...

    aap ne yae lines quote kar kae apna kament diyaa duabra padh lae kr zakir


    ----------
    aagaey sae roman mae hi kmaent dungi iskae liaye avshya kshma chahtee hun par hindi mae kament dena bahut baar merae liyae sambhav hi nahin hotaa

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  78. रचना जी, इतनी मासूमियत भी अच्‍छी नहीं होती। कृपया आप अपनी उस पोस्‍ट (जिसे आपने बाद में डिलीट भी कर दिया था, पता नहीं अब वह है अथवा नहीं, मुझे नहीं मालूम) को याद कर लें, जो प्रकाशन विभाग द्वारा डार्विन पर छपी किताब की सूचना मिलने पर आपने लिखी थी। क्‍या आपने उसमें डॉ0 अरविंद मिश्र का मान बढ़ाया था?
    यदि हॉं, तो मैं अपने लिखे शब्‍दों के लिए क्षमा चाहता हूँ।

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  79. jakir ji

    mae kisi bhi post sambandhit aap ki baat kaa jwaab nahin dae rahee hun mae

    "दु:ख तो इसी बात का है कि आपने यह व्‍यवहार उस व्‍यक्ति के उकसाने पर किया,

    ki baat kar rahee hun aur jannaa chahtee hun ki is post par maenae kaesae dr mishra ko उकसाने kaa kaarya kiyaa

    jabki naa to maene unko mail dee haen aur naa unki mail kaa jwaab diyaa haen

    aap kaese keh saktey haen ki maene is post mae unko uksayaa haen

    hadd haen aapki
    khud hi likh rhaey haen aur khud hi anjaan ban rahey haen aur apni baat sae mukar rahae haen

    isliiyae mae kehtee hun stand lae to uspar tikaae

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  82. Agar aapne unko nahi uksaya to unki mail yahan kyon publish ki? Maine to iske liye to nahi kaha tha.

    Ek baat aur is post men maine apni kalam se sirf itni si baat likhi hai : "आइए सोचें कि क्‍या हम महज इन स्थितियों के तमाशबीन बने रहेंगे अथवा होली को उसके वास्‍तविक स्‍वरूप (कृषि यज्ञ) में मनाए जाने की पहल करके धरती को बचाने के लिए आगे आएंगे?"

    Ismen maine kaun si aisi baat likh di hai, jisse aap itna bhadak gayeen?

    Pahle aap is baat ka jawab den, kyonki post men saara bakheda aapka khada kiya hua hai.

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  83. Agar aapne unko nahi uksaya to unki mail yahan kyon publish ki? Maine to iske liye to nahi kaha tha.

    Ek baat aur is post men maine apni kalam se sirf itni si baat likhi hai : "आइए सोचें कि क्‍या हम महज इन स्थितियों के तमाशबीन बने रहेंगे अथवा होली को उसके वास्‍तविक स्‍वरूप (कृषि यज्ञ) में मनाए जाने की पहल करके धरती को बचाने के लिए आगे आएंगे?"

    Ismen maine kaun si aisi baat likh di hai, jisse aap itna bhadak gayeen?

    Pahle aap is baat ka jawab den, kyonki post men saara bakheda aapka khada kiya hua hai.

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  85. is post ki heading daekhiyae

    holika dahan kyaa aap bhi iskae gunahgaar to nahin ???

    zakir ji yae itself galat haen aur wo bhi aen holi kae din
    aur yae post hi nahin mae hae us post par aaptti darj karaatee hi rahee hun jahaan aap ne hindu dhakosalo kae kilaaf likhaa haen kyuki wahaan kabhie bhi islam yaa kisi aur dharm kae khilaaf nahin likhaa gayaa

    jagruktaa lana jarurii haen lekin hindu dharm aur uski maanytaaye par har samay likhan aur baki dharmo khaas kar islaam ko best batana galat haen kam sae mae openly yae keh saktee hun


    partiality kyun kii jaaye sabhie dharmao ki comapritive study dae

    likhae ki kaese taabut mae ladki lagtee haen aur hindu dharma mae jalane kae samy lagtee haen to dono electric crematorium jana chahiyae tab baat bantee haen

    aur wo taziyon mae jo paper lagtaa haen wo bhi paedo sae aataa haen is blog par koi post aen us din jis din tazia nikaltaa haendikaaaesi dikhaa dae mae kshmaa mang lungi turant jisko aap alag post banaa kar publish kar saktey haen

    anythaa aap mang lae ki aap sae galti hui haen alag post mae


    dil badaa rakhana seekhiyae taaki is desh mae sab saath reh sakae

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  86. रचना जी, पोस्‍ट की हेडिंग में सिर्फ सवाल पूछा गया है। पोस्‍ट के मैटर में पर्यावरण और होली की कुछ महत्‍वपूर्ण जानकारी रखी गयी है, जो आजके हर सुधी व्‍यक्ति को जाननी चाहिए। और यह जानकारी एक ऐसे अखबार के प्रथम पृष्‍ठ पर छपी है, जिसकी पाठक संख्‍या 03 करोड् है। (अगर यह पोस्‍ट गलत है, तो आप जाकर अखबार वालों से सम्‍पर्क करिए, कहिए तो मैं उनका कांटैक्‍ट नं0 दे दूं) यह पोस्‍ट होली के दिन सुबह इसी लिए छापी गयी है, क्‍योंकि उसी दिन शाम को अथवा रात को ज्‍यादातर पेड काटकर होली में डाले जाते हैं।
    पोस्‍ट को प्रकाशित करने का उददेश्‍य सिर्फ इतना था कि लोग इस पढें और अगर यदि उनके आसपास ऐसा हो रहा है, तो उसे रोकने के लिए प्रयास करें। अगर इसमें भी आपको कोई गलत चीज नजर आ रही है, तो किसी मानसिक चिकित्‍सक से संपर्क करें, मैं कुछ नहीं कर सकता।


    जहां तक होली में हरे पेड डालने की बात है, मैंने अपने मोहल्‍ले की एक और होलिका का चित्र जो होलिका जलने से पूर्व लिया था, (लेकिन कार्ड रीडर की गडबडी के कारण उस समय नहीं प्रकाशित कर पाया था, अब प्रकाशित कर रहा हूँ।)


    और हां, जहां तक ताजिया में कागज लगाने की बात है, तो उसकी डिटेल जानकारी भेज दीजिए, मैं प्रकाशित करूंगा। लेकिन उसी शर्त पर जब आप अपने जीवन में कोई कागज बरबाद नहीं करती होंगी। (अपने बारे में मैं इतना कह सकता हूँ कि मैंने कभी कोई हरा पेड़ नहीं काटा है, इसीलिए इस पोस्‍ट को लगाने का साहस जुटा पाया था)


    एक बात और, अगर आपमें सोचने विचारने की शक्ति नहीं है, अगर आपमें समाजिक बुराइयों को जानने का साहस नहीं है और उन्‍हें सुधारने की सद्इच्‍छा भी नहीं है, तो आपसे निवेदन है कि वैज्ञानिक चेतना के ब्‍लॉगों पर मत जाया करिए। आपके अनर्गल प्रलाप से एनर्जी जाया होती है। साथ ही माहौल तथा सम्‍बंध खराब होते हैं सो अलग।

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  87. बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी...ये तो सुना था लेकिन इतनी दूर तलक जाएगी इसका अंदाज़ा नहीं था...बड़ी सीधी सी बात है अगर गीले हरे पेड़ होलिका दहन में कटते हैं तो गलत बात है और अगर नहीं कटते तो फिर बात ही ख़तम हो गयी...बहस की सम्भावना ही नहीं है...

    नीरज

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  88. aap kae aakhri kament ne sab kuch khud hi keh diyaa

    taazia mae kaagaz laegae to theek tabhie aavaaj uthaegi jab koi kaagaz kahin barbaad nahin hogaa

    aur holika dahan kae khilaaf aavaj uthani hi chahiyae


    yahii mansiktaa dikhanae kae liyae itna samay yahaan diyaa haen warna sadsytaa kae aamntrn milae par join kar liyaa hotaa yae blog aur amtrna bhi aap ne hi diyaa thaa kyuki tab aap ko mujh mae vaegyanic outlook diktaa thaa

    aakhri kament haen aap shaanti sae blog par hindu utasavo kae khilaaf avaaj uthaatey rahey

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  89. रचना जी, आपसे बात करना नितांत व्‍यर्थ है। अखबार पढना भी तो कागज की बरबादी है, जबकि न्‍यूज टीवी और नेट पर उपलब्‍ध है। अच्‍छा बताइए एक ताजिए में कितना कागज लगता है। एक अखबार के बराबर या 100 अखबार के बराबर। जबकि आप साल में 365 दिन अखबार के रूप में कागज बरबाद कर रही हैं। आप अखबार रोज पढती हैं, जोडिए आपने अपनी जिंदगी में अब तक कितने कागज बरबाद किये हैं। कागज की बरबादी रोकी जानी चाहिए, लेकिन ताजिए से कम से कम 100 गुना कागज हर व्‍यक्ति प्रतिदिन बरबाद कर रहा है। ऐसे में उसकी बात का क्‍या मतलब रह जाता है। लेकिन पेडों के काटने का काम होलिका के अलावा यदा कदा ही होता है। इसीलिए उस दिन पोस्‍ट लगाई गयी थी कि यदि आपके आसपास ऐसा हो रहा है, तो उसे रोकने का प्रयत्‍न कीजिए।
    जहां तक मानसिकता की बात है, तो उसके लिए मुझे आपका प्रमाणपत्र नहीं चाहिए। मानसिकता अगर देखनी है, तो आप अपनी देखिए, क्‍योंकि जब तस्‍लीम अथवा साइंस ब्‍लॉगर्स पर अन्‍य विषयों पर पोस्‍ट प्रकाशित होती हैं, तो आप नजर नहीं आतीं, लेकिन जहां टांग खींचने का मौका दिखता है, आप दौडी चली आती हैं। आप अपनी इस मानसिकता के बारे में सोचिए, यह आपकी व्‍यक्तिगत छवि के लिए भी फायदेमंद होगा। मेरी मानसिकता क्‍या है, यह इस पोस्‍ट के 90 प्रतिशत कमेंट में साफ देखी जा सकती है।

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  90. रचना जी, एक बात और...

    मेरा यह मानना है कि अगर आप चोर नहीं हैं, तभी चोरियों के विरूद्ध आवाज उठा सकते हैं, अगर आप भ्रष्‍टाचारी नहीं है, तभी भ्रष्‍टाचार के विरूद्ध लिख सकते हैं, यदि आप मांसाहारी नहीं हैं, तभी मांसाहार को गलत कह सकते हैं। लेकिन यदि आपमें ये सारी बुराइयां हैं, तो न तो आपको इनके विरूद्ध आवाज उठाने का नैतिक हक है, और न हीं लफ्फाजी करने का। (ऐसा करने वाले लोग दोगले कहलाते हैं और समाज में अच्‍छी नजर से नहीं देखे जाते।) एक लेखक/ब्‍लॉगर में कम से कम इतनी नैतिकता तो होनी चाहिए।

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  91. अगर आप चोर नहीं हैं आप भ्रष्‍टाचारी नहीं है
    यदि आप मांसाहारी नहीं हैं nahin hun isiilyae likhtee hun

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  92. aur iskae allawaa

    kyuki hindu hun is liyae apnae dharm . apni sanskriti mae naari par rudhivaadi sanskaaro kae khilaaf likhtee hun

    naa ki dusrae dharmao ki aastho sae kheltee hun

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  93. "kyuki hindu hun is liyae apnae dharm . apni sanskriti mae naari par rudhivaadi sanskaaro kae khilaaf likhtee hun"

    Kaash main bhi aapko is roop men dekhta paata.:) Maine to jab bhi in vishyon par likha, aapko andh-virodh karte paaya.

    Jo log mujhe kareeb se jaante hain (Dr. Arvind Mishra bhi), unhe pata hai ki main ek naastik (sirf dikhave ke liye nahi) vyakti hoon aur mujhe dhong tatha paakhabd se sakht nafrat hai. Meri nazron ke sammne jo kuchh bhi is tarah ka guzarta hai, main uspar likhta hoon, phir chahe wah kisi bhi dharm se sambandhit ho.

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  94. श्री जाकिर अली रजनीश ,
    आपने कहा ,
    "लेकिन यदि कोई व्‍यक्ति अपने किन्‍ही पूर्वाग्रहों के कारण सभी लोगों के लिए समस्‍या पैदा करे, तो जनहित में कठोर निर्णय (पूर्व में ऐसा हो भी चुका है) लिये जाने में भी कोई बुराई नहीं होती है!"
    अपने उपर्युक्त वाक्यांश स्पष्ट करें,
    मैं वर्तमान में साईंस ब्लागर्स असोसिएशन का अध्यक्ष हूँ जो सोसाईटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के अधीन एक वैधानिक दर्जा प्राप्त समिति है -एक महामंत्री /सचिव समिति के अध्यक्ष के विरुद्ध इस तरह के निर्णय नहीं ले सकता ....
    आपसे अपेक्षा की जाती है कि समिति की उपविधियों के तहत आप ऐ जी एम् का आह्वान करें ताकि अध्यक्ष के सम्बन्ध में बहुमत से निर्णय लिया जा सके -मैं त्यागपत्र देने जा रहा था कि आपका यह फरमान भी आ गया -
    आपको यह बताना भी मैं श्रेयस्कर समझता हूँ कि एक विधायी इकाई का संचालन विधिगत -नियमों के अधीन होता है न कि संस्था के लोगों की अनाप शनाप सनक(ह्विम्स ) पर ....
    यदि नियमों के विरुद्ध कोई कार्य करते हैं तो उसकी जवाबदेही नियत होगी और प्रकरण निस्तारण हेतु ऐ आर चिट फंड लखनऊ को संदर्भित होगा या माननीय न्यायालय की भी शरण ली जा सकती है ...
    संस्थाओं में सचिव /महामंत्री केवल अध्यक्ष के निर्देश का अनुपालन करते हैं -अध्यक्ष को सचिव हटा दे -यह हास्यास्पद है और आपत्तिजनक भी
    आप निश्चय ही एक सम्माननीय व्यक्ति हैं मगर संस्थायें नियम कानून से चलती हैं ...इसका ध्यान रखें ..
    हाँ तस्लीम के उपाध्यक्ष पद से मैं त्यागपत्र देता हूँ -मेरा नाम वहां से हटा दिया जाय!आपका काम यहाँ मैंने आसान कर दिया !
    साईंस फिक्शन इन इण्डिया के सहलेखक से आपका नाम हटा रहा हूँ!वह मेरा निजी ब्लॉग है और यह निर्णय मैं बहुत सोच विचार कर ले रहा हूँ !
    अभी तो बस इतना ही .....
    साईंस ब्लागर्स असोसिएशन के ऐ जी एम् की यथाशीघ्र बुलाई जाय!

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  95. nice.........................nice..............................nice...............

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  96. is aalekh ki original cutting yaa link agar uplabdh karvaa sakey to abhaar hogaa

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Name

- दर्शन लाल बावेजा,1,- बी एस पाबला,1,-Dr. Prashant Arya,2,-अंकित,4,-अंकुर गुप्ता,7,-अभिषेक ओझा,2,-अल्पना वर्मा,22,-आशीष श्रीवास्‍तव,2,-इन्द्रनील भट्टाचार्जी,3,-काव्या शुक्ला,2,-जाकिर अली ‘रजनीश’,56,-जी.के. अवधिया,6,-जीशान हैदर जैदी,45,-डा प्रवीण चोपड़ा,4,-डा0 अरविंद मिश्र,26,-डा0 श्‍याम गुप्‍ता,5,-डॉ. गुरू दयाल प्रदीप,8,-डॉ0 दिनेश मिश्र,5,-दर्शन बवेजा,1,-दर्शन लाल बवेजा,7,-दर्शन लाल बावेजा,2,-दिनेशराय द्विवेदी,1,-पवन मिश्रा,1,-पूनम मिश्रा,7,-बालसुब्रमण्यम,2,-योगेन्द्र पाल,6,-योगेश,1,-रंजना [रंजू भाटिया],22,-रेखा श्रीवास्‍तव,1,-लवली कुमारी,3,-विनय प्रजापति,2,-वीरेंद्र शर्मा(वीरुभाई),81,-शिरीष खरे,2,-शैलेश भारतवासी,1,-संदीप,2,-सलीम ख़ान,13,-हिमांशु पाण्डेय,3,.संस्‍था के उद्देश्‍य,1,।NASA,1,(गंगा दशहरा),1,100 billion planets,1,2011 एम डी,1,22 जुलाई,1,22/7,1,3/14,1,3D FANTASY GAME SPARX,1,3D News Paper,2,5 जून,1,Acid rain,1,Adhik maas,1,Adolescent,1,Aids Bumb,1,aids killing cream,1,Albert von Szent-Györgyi de Nagyrápolt,1,Alfred Nobel,1,aliens,1,All india raduio,1,altruism,1,AM,18,Aml Versha,1,andhvishwas,5,animal behaviour,1,animals,1,Antarctic Bottom Water,1,Antarctica,9,anti aids cream,1,Antibiotic resistance,1,arunachal pradesh,1,astrological challenge,1,astrology,1,Astrology and Blind Faith,1,astrology and science,1,astrology challenge,1,astronomy,4,Aubrey Holes,1,Award,4,AWI,1,Ayush Kumar Mittal,2,bad effects of mobile,1,beat Cancer,1,Beauty in Mathematics,1,Benefit of Mother Milk,1,benifit of yoga,1,Bhaddari,1,Bhoot Pret,3,big bang theory,1,Binge Drinking,1,Bio Cremation,1,bionic eye Veerubhai,1,Blind Faith,4,Blind Faith and Learned person,1,bloggers achievements,1,Blood donation,1,bloom box energy generator,1,Bobs Award,1,Breath of mud,1,briny water,1,Bullock Power,1,Business Continuity,1,C Programming Language,1,calendar,1,Camel reproduction centre,1,Carbon Sink,1,Cause of Acne,1,Change Lifestyle,1,childhood and TV,1,chromosome,1,Cognitive Scinece,1,comets,1,Computer,2,darshan baweja,1,Deep Ocean Currents,1,Depression Treatment,1,desert process,1,Dineshrai Dwivedi,1,DISQUS,1,DNA,3,DNA Fingerprinting,1,Dr Shivedra Shukla,1,Dr. Abdul Kalam,1,Dr. K. 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