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बाप की सजा भुगते बेटा...

निष्क्रिय (अक्रिय) रूप से किया गया धूम्रपान भी बच्चों को आक्रामक बना सकता है 

एक अभिनव अध्ययन ने सचेत किया है जिन बालकों को अपने बाल्यकाल के प्रारम्भिक दौर में धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के मुख से उगले गए सेकिंड हेंड स्मोक को झेलना पड़ा  है उनके बड़े होने पर गैर सामाजिक और आक्रामक बन जाने के मौके बढ़ जाते हैं.

कैनाडा के मोंट्रियल विश्वविद्यालय (Montreal University) के शोधकर्ताओं ने पता लगाया है बच्चों के आक्रामक व्यवहार का रिश्ता बचपन में उनके सेकिंड हेंड स्मोक (second hand smoke) से असर ग्रस्त होने से जुड़ता है, भले वह उस वक्त गर्भस्थ ही रहें हों या फिर उनके माँ बाप के गैर सामाजिक होने का पूर्व वृत्तांत रहा आया हो तब भी.

अन्वेषणकर्ताओं के मुताबिक़ धूम्रपानी द्वारा उगला गया धुआं उसके द्वारा सेवित कश लगाते वक्त अन्दर खींचे गए धुएं से भी ज्यादा नुक्सानदायक होता है. दुनिया भर में तकरीबन चार फीसद बच्चे इस सेकिंड हेंड स्मोक से असर ग्रस्त हो रहे हैं. यह धूम्रपानियों  के बच्चों की मौजूदगी में अपने घरों के बंद कमरों में किये गए धूम्रपान का नतीजा है. बचपन के शुरूआती दौर में यह धुआं (अक्रिय धूम्रपान) और भी ज्यादा खतरनाक सिद्ध होता है. क्योंकि बच्चे का दिमाग अभी विकासमान ही होता है. रिसर्चर Linda Pagani का यही कहना है, मानना है.

गर्भावस्था के दौरान आयोडीन की कमी रह जाने पर गर्भस्थ का बुद्धि कोशांक भी कम रह जाता है 

गर्भावस्था में महिलाओं में आयोडीन की कमीबेशी का रहजाना भारत की महिलाओं के लिए एक आम बात है. इसका इनके बच्चे के मानसिक विकास पर बड़ा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

ब्रितानी साप्ताहिक विज्ञान पत्रिका 'लांसेट' (Lancet) में प्रकाशित एक अभिनव अध्ययन के अनुसार पता चला है आयोडीन का पर्याप्त सेवन जो दुग्ध उत्पादों तथा समुद्र से प्राप्त खाद्यों से प्राप्त होता है थाइरोइड ग्रन्थि द्वारा तैयार किये जाने वाले कुछ ऐसे हारमोनों के पर्याप्त उत्पादन के लिए ज़रूरी समझा जाता है जो भ्रूण के दिमागी विकास पे सीधा सीधा प्रभाव डालते हैं.

हाल ही  में भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के 324 जिलों में एक सर्वेक्षण किया था, जिसमें पता चला कि इनमें से 263 जिलों में आयोडीन की कमीबेशी व्याप्त है. नतीजा है आयोडीन की कमी से पैदा होने वाले विकार (Iodine Deficiency Disorders ,IDD). दिमाग का क्षतिग्रस्त होना (Brain damage) भी इन विकारों में शरीक है. गर्भ का असमय पर ही गर्भावस्था की पूरी अवधि भुगताये बिना गिर जाना, मानसिक मंद बुद्धिता (Mental retardation) तथा कद काठी में नाटा रह जाना (Dwarfism) ऐसे ही अन्य विकार हैं.

Surrey (सुर्रे) तथा ब्रिस्टल विश्वविद्यालय (Bristol University) के शोध करता समूहों ने ब्रिटेन की 1000 गर्भवती महिलाओं का गर्भावस्था की  अवधि में जायजा लिया था. इनके मूत्र में गर्भावस्था की पहली तिमाही में आयोडीन के सांद्रण का मापन किया गया था. विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा निर्देशों के अनुरूप सिफारिश किये गए आयोडीन सान्द्रण के मद्दे नजर इन महिलाओं को वर्गीकृत किया गया  है.

जिन महिलाओं के मूत्र में आयोडीन और सीरम क्रीटे-नाइन का अनुपात (Iodine/Creatinine Ratio) 150 से कम  रहा उन्हें आयोडीन की कमी से ग्रस्त बतलाया गया जबकि 150 से ऊपर रहने पर या और भी ज्यादा पाए जाने पर उन्हें आयोडीन सक्षम (सामान्य) घोषित किया  गया.

67% महिलाओं को कमीबेशी से ग्रस्त पहले वर्ग में पाया गया. इनके (सभी महिलाओं के) नौनिहालों के मानसिक विकास (IQ) का जायजा आठ साला होने पर लिया गया. बालकों के नौसाला होने पर साफ़ साफ़ और शुद्ध रूप पढ़ने  की क्षमता का भी आकलन किया गया. पहले वर्ग की महिलाओं के नौनिहालों में निम्न बुद्धि कोशांक, शुद्ध पाठन तथा पढ़ते वक्त बोधन क्षमता (Reading comprehension) कमतर रह जाने की संभावना अधिक रही.

सन्दर्भ सामग्री:  Passive smoking can make kids aggressive, Iodine deficiency during pregnancy lowers child's IQ, The Times of India
Keywords: Reading comprehension, Mental retardation, Brain damage, Dwarfism, Bristol University, Iodine Deficiency Disorders, Lancet Science Magazine, Montreal University, Second Hand Smoke, Iodine/Creatinine Ratio

निष्क्रिय (अक्रिय) रूप से किया गया धूम्रपान भी बच्चों को आक्रामक बना सकता है 

एक अभिनव अध्ययन ने सचेत किया है जिन बालकों को अपने बाल्यकाल के प्रारम्भिक दौर में धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के मुख से उगले गए सेकिंड हेंड स्मोक को झेलना पड़ा  है उनके बड़े होने पर गैर सामाजिक और आक्रामक बन जाने के मौके बढ़ जाते हैं.

कैनाडा के मोंट्रियल विश्वविद्यालय (Montreal University) के शोधकर्ताओं ने पता लगाया है बच्चों के आक्रामक व्यवहार का रिश्ता बचपन में उनके सेकिंड हेंड स्मोक (second hand smoke) से असर ग्रस्त होने से जुड़ता है, भले वह उस वक्त गर्भस्थ ही रहें हों या फिर उनके माँ बाप के गैर सामाजिक होने का पूर्व वृत्तांत रहा आया हो तब भी.

अन्वेषणकर्ताओं के मुताबिक़ धूम्रपानी द्वारा उगला गया धुआं उसके द्वारा सेवित कश लगाते वक्त अन्दर खींचे गए धुएं से भी ज्यादा नुक्सानदायक होता है. दुनिया भर में तकरीबन चार फीसद बच्चे इस सेकिंड हेंड स्मोक से असर ग्रस्त हो रहे हैं. यह धूम्रपानियों  के बच्चों की मौजूदगी में अपने घरों के बंद कमरों में किये गए धूम्रपान का नतीजा है. बचपन के शुरूआती दौर में यह धुआं (अक्रिय धूम्रपान) और भी ज्यादा खतरनाक सिद्ध होता है. क्योंकि बच्चे का दिमाग अभी विकासमान ही होता है. रिसर्चर Linda Pagani का यही कहना है, मानना है.

गर्भावस्था के दौरान आयोडीन की कमी रह जाने पर गर्भस्थ का बुद्धि कोशांक भी कम रह जाता है 

गर्भावस्था में महिलाओं में आयोडीन की कमीबेशी का रहजाना भारत की महिलाओं के लिए एक आम बात है. इसका इनके बच्चे के मानसिक विकास पर बड़ा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

ब्रितानी साप्ताहिक विज्ञान पत्रिका 'लांसेट' (Lancet) में प्रकाशित एक अभिनव अध्ययन के अनुसार पता चला है आयोडीन का पर्याप्त सेवन जो दुग्ध उत्पादों तथा समुद्र से प्राप्त खाद्यों से प्राप्त होता है थाइरोइड ग्रन्थि द्वारा तैयार किये जाने वाले कुछ ऐसे हारमोनों के पर्याप्त उत्पादन के लिए ज़रूरी समझा जाता है जो भ्रूण के दिमागी विकास पे सीधा सीधा प्रभाव डालते हैं.

हाल ही  में भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के 324 जिलों में एक सर्वेक्षण किया था, जिसमें पता चला कि इनमें से 263 जिलों में आयोडीन की कमीबेशी व्याप्त है. नतीजा है आयोडीन की कमी से पैदा होने वाले विकार (Iodine Deficiency Disorders ,IDD). दिमाग का क्षतिग्रस्त होना (Brain damage) भी इन विकारों में शरीक है. गर्भ का असमय पर ही गर्भावस्था की पूरी अवधि भुगताये बिना गिर जाना, मानसिक मंद बुद्धिता (Mental retardation) तथा कद काठी में नाटा रह जाना (Dwarfism) ऐसे ही अन्य विकार हैं.

Surrey (सुर्रे) तथा ब्रिस्टल विश्वविद्यालय (Bristol University) के शोध करता समूहों ने ब्रिटेन की 1000 गर्भवती महिलाओं का गर्भावस्था की  अवधि में जायजा लिया था. इनके मूत्र में गर्भावस्था की पहली तिमाही में आयोडीन के सांद्रण का मापन किया गया था. विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा निर्देशों के अनुरूप सिफारिश किये गए आयोडीन सान्द्रण के मद्दे नजर इन महिलाओं को वर्गीकृत किया गया  है.

जिन महिलाओं के मूत्र में आयोडीन और सीरम क्रीटे-नाइन का अनुपात (Iodine/Creatinine Ratio) 150 से कम  रहा उन्हें आयोडीन की कमी से ग्रस्त बतलाया गया जबकि 150 से ऊपर रहने पर या और भी ज्यादा पाए जाने पर उन्हें आयोडीन सक्षम (सामान्य) घोषित किया  गया.

67% महिलाओं को कमीबेशी से ग्रस्त पहले वर्ग में पाया गया. इनके (सभी महिलाओं के) नौनिहालों के मानसिक विकास (IQ) का जायजा आठ साला होने पर लिया गया. बालकों के नौसाला होने पर साफ़ साफ़ और शुद्ध रूप पढ़ने  की क्षमता का भी आकलन किया गया. पहले वर्ग की महिलाओं के नौनिहालों में निम्न बुद्धि कोशांक, शुद्ध पाठन तथा पढ़ते वक्त बोधन क्षमता (Reading comprehension) कमतर रह जाने की संभावना अधिक रही.

सन्दर्भ सामग्री:  Passive smoking can make kids aggressive, Iodine deficiency during pregnancy lowers child's IQ, The Times of India
Keywords: Reading comprehension, Mental retardation, Brain damage, Dwarfism, Bristol University, Iodine Deficiency Disorders, Lancet Science Magazine, Montreal University, Second Hand Smoke, Iodine/Creatinine Ratio

कश्‍मीर का नया सिरदर्द....

पर्यावरण को सुधारने के नाम पर समय-समय पर वानिकी कार्यक्रम के अंतर्गत कई निर्णय लिए जाते रहे हैं, मगर संभवतः दूरदर्शिता के अभाव के कारण कई बार ऐसे निर्णय ले लिए जाते हैं कि ये पर्यावरण के लिए ही नुकसानदेह बन जाते हैं. ऐसी ही  एक समस्या हाल में कश्मीर में भी उभरती नजर आ रही है. 

हिमपात खत्म होने के बाद बदलते मौसम में कश्मीर की वादियाँ जहाँ अपनी खूबसूरती की नई परतें उतार रही थीं, वहीँ एक नई प्राकृतिक समस्या भी उभर रही थी.मगर ये समस्या आयातित ही ज्यादा प्रतीत हो रही है. रुसी पोपलर के नाम से जाने वाले एक वृक्ष से रुई की तरह उड़ते पराग से स्थानीय निवासियों में एलर्जी की समस्या खतरनाक रूप से बढ़ रही है.


जल्दी बढ़ने की खासियत को देखते हुए 80 के दशक में सामाजिक वानिकी योजना के तहत यहाँ ‘रुसी चिनार’ भी कहलाये जाने वाले इन वृक्षों का रोपण करवाया गया था, मगर आज इस मौसम में ये सांस तथा स्वास्थ्य संबंधी कई बिमारियों की वजह बनते जा रहे हैं. वैसे ही जैसे आज देश के दूसरे हिस्सों से यूकेलिप्टस, गाजर घास जैसी प्रजातियों के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं. फिलहाल तो श्रीनगर जिला प्रशासन द्वारा इन पेड़ों के लगाये जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. पहले से मौजूद पेड़ों को हटाने के लिए विशेषज्ञों से रिपोर्ट भी मांगी गई है. 

अक्सर पाया जाता है कि इस तरह के आयातित समाधान हमारी समस्याओं को बढ़ाने वाले ही साबित हुए हैं. ऐसे में क्या उचित नहीं कि ऐसे किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले उचित शोध और कृषि वैज्ञानिकों से पर्याप्त चर्चा व सहमति कायम करने के प्रयास कर लिए जायें ताकि हमारे देश का पर्यावरण सुरक्षित रह सके.....

पर्यावरण को सुधारने के नाम पर समय-समय पर वानिकी कार्यक्रम के अंतर्गत कई निर्णय लिए जाते रहे हैं, मगर संभवतः दूरदर्शिता के अभाव के कारण कई बार ऐसे निर्णय ले लिए जाते हैं कि ये पर्यावरण के लिए ही नुकसानदेह बन जाते हैं. ऐसी ही  एक समस्या हाल में कश्मीर में भी उभरती नजर आ रही है. 

हिमपात खत्म होने के बाद बदलते मौसम में कश्मीर की वादियाँ जहाँ अपनी खूबसूरती की नई परतें उतार रही थीं, वहीँ एक नई प्राकृतिक समस्या भी उभर रही थी.मगर ये समस्या आयातित ही ज्यादा प्रतीत हो रही है. रुसी पोपलर के नाम से जाने वाले एक वृक्ष से रुई की तरह उड़ते पराग से स्थानीय निवासियों में एलर्जी की समस्या खतरनाक रूप से बढ़ रही है.


जल्दी बढ़ने की खासियत को देखते हुए 80 के दशक में सामाजिक वानिकी योजना के तहत यहाँ ‘रुसी चिनार’ भी कहलाये जाने वाले इन वृक्षों का रोपण करवाया गया था, मगर आज इस मौसम में ये सांस तथा स्वास्थ्य संबंधी कई बिमारियों की वजह बनते जा रहे हैं. वैसे ही जैसे आज देश के दूसरे हिस्सों से यूकेलिप्टस, गाजर घास जैसी प्रजातियों के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं. फिलहाल तो श्रीनगर जिला प्रशासन द्वारा इन पेड़ों के लगाये जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. पहले से मौजूद पेड़ों को हटाने के लिए विशेषज्ञों से रिपोर्ट भी मांगी गई है. 

अक्सर पाया जाता है कि इस तरह के आयातित समाधान हमारी समस्याओं को बढ़ाने वाले ही साबित हुए हैं. ऐसे में क्या उचित नहीं कि ऐसे किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले उचित शोध और कृषि वैज्ञानिकों से पर्याप्त चर्चा व सहमति कायम करने के प्रयास कर लिए जायें ताकि हमारे देश का पर्यावरण सुरक्षित रह सके.....

अब सुनामी की त्‍वरित चेतावनी संभव....

अब सुनामी के उठते ही चंद मिनटों में चेतावनी प्रसारित हो सकेगी. यह नतीजा है उस ग्लोबल पोजिशनिंग सैटेलाईट प्रणाली(GPS) का जो आसपास के भू-स्थल में आये विक्षोभ का पता लगा सकेगी. इससे सुनामी के पैदा होते ही चंद मिनिट बाद ही उसकी व्यापक स्तर पर चेतावनी प्रसारित की जा सकेगी.

सुनामी Subduction Earthquakes का नतीजा होती है. सब-डकशन जोंस में जल के नीचे के धरातल पर एक प्लेट दूसरी प्लेट के ऊपर जब फिसलती है (चढ़ती उतरती है) तब पैदा होती है सुनामी. जल की विशाल राशि के दोलन से. हम जानते हैं ये विवर्तन प्लेटें अपनी पीठ पर महाद्वीप लादे डोलती रहती हैं. सुनामी जल के इन विवर्तन प्लेटों के परस्पर एक दूसरे पर आरोहण अवरोहण का ही नतीजा बनती हैं. यूं समुद्र की सतह का प्लेटों की परस्पर फिसलन से पैदा परिणामी उठाव (Uplift of the sea floor) भी कुछ सीमा तक तटीय क्षेत्रों को भी प्रभावित करता है. तट के साथ साथ भू-विरूपण (Ground Deformation) का भी GPS जायजा लेता चलता है.

अति परिष्कृत आंकडा संशाधन (High precision real time processing and inversion of these data) के द्वारा जल के नीचे सागर की तलहटी में प्लेटों की फिसलन से आये भू-कम्पीय स्रोत का पता लगा लिया जाता है.

फिलवक्त सुनामी की चेतावनी भू-कम्पीय मापन के तरीकों के सहारे दी जाती रही  है. 5-10 मिनिट की समय सीमा में ये परम्परागत तरीके भूकम्प की विकरालता का उसकी भू-कम्पीय पैमाने पर शक्ति का सही जायजा नहीं ले पाते हैं. अनुमान ही लगा पाते हैं. इसीलिए सही अनुमान लगाने में चूक हो जाती है. यही कारण है कि तरंगों की लम्बाई (वास्तव में उत्तालता, Wave heights, Crests) का भी सही आकलन नहीं हो पाता है. GPS द्वारा लिया गया जायजा इन खामियों से मुक्त है.

जापान  में 2011 में आये विनाशकारी भूकंप का जायजा लेने में टीम को मात्र तीन मिनिट लगते इतना द्रुतगामी है यह तरीका GPS द्वारा ग्राउंड डी-फोर्मेशन की टोह  लेने का. यहाँ GPS द्वारा जुटाए गए आंकड़े का विश्लेषण पलक झपकते ही हो जाता है.

इस अभिनव अध्ययन के नतीजे नेचुरल हैजार्ड्स एंड अर्थ सिस्टम साइंसिज़-Natural Hazards and Earth System Sciences (प्राकृत आपदा और भू-तंत्र विज्ञानों के प्रपत्र) में प्रकाशित हुए हैं. यह यूरोपियन जिओसाइंसेस यूनियन (European Geosciences Union) का इंटरेक्टिव ओपन एक्सेस जर्नल (Interactive Open Access Journal) है.

अधिकाँश सुनामी (जिनमें सुमात्रा में आई विनाशकारी सुनामी भी शामिल है, इंडोनेशिया में जो 2004 में आई थी तथा 2011२ की जापान में आई सुनामी भी) जल के नीचे पैदा सबडकशन जोंस में पैदा   भू-गति (ग्राउंड मोशन) से उठती हैं. विशाल राशि जल की आंदोलित होती है, सतह के ऊपर उठ दोलन करती है ऊपर नीचे, सरल आवर्त गति में ऊपर नीचे उठती गिरती है जबकि सुनामी अन्दर ही अन्दर आगे बढती जाती है. गहरे समुन्दर के साथ शांत रहती है लेकिन तट पे पहुँचते पहुँचते ये भयंकर रुख ले लेती है.

सन्दर्भ सामग्री: MumbaiMirror.co
अब सुनामी के उठते ही चंद मिनटों में चेतावनी प्रसारित हो सकेगी. यह नतीजा है उस ग्लोबल पोजिशनिंग सैटेलाईट प्रणाली(GPS) का जो आसपास के भू-स्थल में आये विक्षोभ का पता लगा सकेगी. इससे सुनामी के पैदा होते ही चंद मिनिट बाद ही उसकी व्यापक स्तर पर चेतावनी प्रसारित की जा सकेगी.

सुनामी Subduction Earthquakes का नतीजा होती है. सब-डकशन जोंस में जल के नीचे के धरातल पर एक प्लेट दूसरी प्लेट के ऊपर जब फिसलती है (चढ़ती उतरती है) तब पैदा होती है सुनामी. जल की विशाल राशि के दोलन से. हम जानते हैं ये विवर्तन प्लेटें अपनी पीठ पर महाद्वीप लादे डोलती रहती हैं. सुनामी जल के इन विवर्तन प्लेटों के परस्पर एक दूसरे पर आरोहण अवरोहण का ही नतीजा बनती हैं. यूं समुद्र की सतह का प्लेटों की परस्पर फिसलन से पैदा परिणामी उठाव (Uplift of the sea floor) भी कुछ सीमा तक तटीय क्षेत्रों को भी प्रभावित करता है. तट के साथ साथ भू-विरूपण (Ground Deformation) का भी GPS जायजा लेता चलता है.

अति परिष्कृत आंकडा संशाधन (High precision real time processing and inversion of these data) के द्वारा जल के नीचे सागर की तलहटी में प्लेटों की फिसलन से आये भू-कम्पीय स्रोत का पता लगा लिया जाता है.

फिलवक्त सुनामी की चेतावनी भू-कम्पीय मापन के तरीकों के सहारे दी जाती रही  है. 5-10 मिनिट की समय सीमा में ये परम्परागत तरीके भूकम्प की विकरालता का उसकी भू-कम्पीय पैमाने पर शक्ति का सही जायजा नहीं ले पाते हैं. अनुमान ही लगा पाते हैं. इसीलिए सही अनुमान लगाने में चूक हो जाती है. यही कारण है कि तरंगों की लम्बाई (वास्तव में उत्तालता, Wave heights, Crests) का भी सही आकलन नहीं हो पाता है. GPS द्वारा लिया गया जायजा इन खामियों से मुक्त है.

जापान  में 2011 में आये विनाशकारी भूकंप का जायजा लेने में टीम को मात्र तीन मिनिट लगते इतना द्रुतगामी है यह तरीका GPS द्वारा ग्राउंड डी-फोर्मेशन की टोह  लेने का. यहाँ GPS द्वारा जुटाए गए आंकड़े का विश्लेषण पलक झपकते ही हो जाता है.

इस अभिनव अध्ययन के नतीजे नेचुरल हैजार्ड्स एंड अर्थ सिस्टम साइंसिज़-Natural Hazards and Earth System Sciences (प्राकृत आपदा और भू-तंत्र विज्ञानों के प्रपत्र) में प्रकाशित हुए हैं. यह यूरोपियन जिओसाइंसेस यूनियन (European Geosciences Union) का इंटरेक्टिव ओपन एक्सेस जर्नल (Interactive Open Access Journal) है.

अधिकाँश सुनामी (जिनमें सुमात्रा में आई विनाशकारी सुनामी भी शामिल है, इंडोनेशिया में जो 2004 में आई थी तथा 2011२ की जापान में आई सुनामी भी) जल के नीचे पैदा सबडकशन जोंस में पैदा   भू-गति (ग्राउंड मोशन) से उठती हैं. विशाल राशि जल की आंदोलित होती है, सतह के ऊपर उठ दोलन करती है ऊपर नीचे, सरल आवर्त गति में ऊपर नीचे उठती गिरती है जबकि सुनामी अन्दर ही अन्दर आगे बढती जाती है. गहरे समुन्दर के साथ शांत रहती है लेकिन तट पे पहुँचते पहुँचते ये भयंकर रुख ले लेती है.

सन्दर्भ सामग्री: MumbaiMirror.co

डॉ0 अरविंद मिश्र को तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान

डॉ0 मनोज पटैरिया एवं प्रो0 रामदेव शुक्ल डॉ0 अरविंद मिश्र को सम्मानित करते हुए

'तस्लीम' एवं 'सर्प संसार' को 'अन्तर्राष्ट्रीय बॉब्स सम्मान' मिलने के क्रम में 'तस्लीम' ने अपने ब्लॉग के प्रमुख सहयोगी एवं प्रेरणास्रोत 'साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ विज्ञान संचारक डॉ0 अरविंद मिश्र को 'तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान' से विभूषित किया। यह सम्मान दिनांक 24 मई, 2013 को 'तस्लीम' संस्था की ओर से इस्लामिया कॉलेज आफ कॉमर्स, गोरखपुर में आयोजित 'ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार' कार्यशाला के दौरान प्रदान किया गया। उन्होंने यह सम्मान एनसीएसटीसी, नर्इ् दिल्ली के निदेशक डॉ0 मनोज पटैरिया एवं गोरखपुर ​विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 रामदेव शुक्ल के हाथों से ग्रहण किया।

डॉ0 अरविंद मिश्र को साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन की परिवार की ओर हार्दिक बधाईयां।

कार्यशाला सम्बंधी विस्तृत समाचार पढने के लिए कृपया यहां पर क्लिक करें।
डॉ0 मनोज पटैरिया एवं प्रो0 रामदेव शुक्ल डॉ0 अरविंद मिश्र को सम्मानित करते हुए

'तस्लीम' एवं 'सर्प संसार' को 'अन्तर्राष्ट्रीय बॉब्स सम्मान' मिलने के क्रम में 'तस्लीम' ने अपने ब्लॉग के प्रमुख सहयोगी एवं प्रेरणास्रोत 'साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ विज्ञान संचारक डॉ0 अरविंद मिश्र को 'तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान' से विभूषित किया। यह सम्मान दिनांक 24 मई, 2013 को 'तस्लीम' संस्था की ओर से इस्लामिया कॉलेज आफ कॉमर्स, गोरखपुर में आयोजित 'ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार' कार्यशाला के दौरान प्रदान किया गया। उन्होंने यह सम्मान एनसीएसटीसी, नर्इ् दिल्ली के निदेशक डॉ0 मनोज पटैरिया एवं गोरखपुर ​विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 रामदेव शुक्ल के हाथों से ग्रहण किया।

डॉ0 अरविंद मिश्र को साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन की परिवार की ओर हार्दिक बधाईयां।

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अनंत ऊर्जा वाली सुपरमशीन...

भारत उस अंतरराष्ट्रीय टीम का हिस्सा है जो सस्ती और साफ़ ऊर्जा का यह अजस्र स्रोत बनाने में जुट गया है. इस सुपर मशीन की सबसे बड़ी इकाई टोकामक (Tokamak) बनाने का जिम्मा भारत ने आगे बढ़के लिया है. हाइड्रोजन जैसे हलके तत्वों को परस्पर सूरज के केन्द्रीय भाग से भी दस गुना ऊंचे तापमान पर गला कर इसका फ्यूज़न करके अपेक्षाकृत भारी तत्व बनाने की प्रक्रिया के लिए सुपर मशीन के इसी हिस्से में अति उत्तप्त गैस हॉट प्लाज्मा तैयार की जायेगी. यह गैस आयनित हो जाती है उच्चतर तापमान पर जिसे हाइड्रोजन का ज्वलन तापमान (ज्वलनांक, Ignition Temperature) कहा जाता है. इसी क्रिया को नाभिकीय संलयन क्रिया फ्यूज़न कहा जाता है. 

सितारों की एटमी भट्टी में यह संलयन क्रिया स्वत: स्फूर्त संपन्न होती है खुद -ब -खुद. केन्द्रीय भाग में हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में जलाने के लिए आवश्यक ताप सितारों के केन्द्रीय भाग (Core) मौजूद रहता है. इस सुपर मशीन का मतलब लेब में एक सूरज से भी ज्यादा शक्तिशाली सितारा खड़ा कर लेना है अजस्र ऊर्जा स्रोत रूप में. इस ग्लोबी प्रोजेक्ट को नाम दिया गया है आईटर (ITER ).लातिनी भाषा में जिसका अर्थ है यही रास्ता है "THE WAY". 

टोकामक अवधारणा के तहत इस अति उत्तप्त आयानित गैस को डोनट (छल्ले के आकार की एक अमरीकी मिठाई कुछ कुछ हमारी इमरती जैसी शक्लोसूरत में बालूशाही सी) की दीवारों से परे रखा जाता है चुम्बकीय बल डालके. इस प्रक्रिया को मेग्नेटिक कनफाइनमेंट (Magnatic Confinement) कहा जाता है. उच्च स्तरीय निर्वात बनाए रखा जाता है इस डॉनट में. ईंधन के रूप में इस मशीन में हाइड्रोजन के ही दो समस्थानिकों (Isotopes) ड्यूटीरिअम (Deuterium) और ट्रीटियम (Tritium) को काम में लिया जाएगा. इन्हें 15 करोड़ सेल्सिअस (15 Million Celsius) तापमान तक गर्माया जाएगा. 

इस अति उत्तप्त प्लाज्मा को टोकामक की दीवारों से परे केंद्र की जानिब संपीडित किए रखने के लिए कम्प्रेस किये रहने के लिए अतिशक्तिशाली चुम्बकीय बल काम में लिए जायेंगे. यह सुपर मशीन तौल में होगी 23,000 मीट्रिक टन. सुपरमशीन का यह वजन तीन आईफेल टावर्स (Eiffel Tower) के बराबर होगा. इसमें कैद प्लाज्मा का आयतन 840 घन मीटर (840 Cubic Meters) रहेगा. 180 हेक्टेअर (01 हेक्टेअर का मतलब 10,000 वर्ग मीटर) का क्षेत्र घेरे रहेगी यह आईटर साईट (ITER Site). दक्षिणी फ्रांस के Cadarche में अवस्थित रहेगी. इस मशीन के लिए आदम कद का 01 किलोमीटर लम्बाई, 400 मीटर चौड़ाई वाला 42 हेक्टेअर क्षेत्र में फैला एक प्लेटफोर्म तैयार किया जाएगा. यह क्षेत्र 60 फ़ुटबाल के मैदान की बराबरी करेगा. 

टोकामक इमारत पेरिस की Arc de Triomphe से भी ऊंची रहेगी. दिसंबर 2015 से शुरू आईटर का पहला Cryostat's Component आईटर साईट पर भारत पहुंचाएगा. यह हमारे वक्त का एक अति महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है. इस भवन का शिलान्यास फ्रांस में 2010 में हो गया था. 34 देशों के सहयोग से पहली प्लाज्मा 2020 में हकीकत में आ जायेगी ऐसी उम्मीद की जाती है. भारत इस टोकामक के सबसे भारी कुल मिलाके 54 खंडों का समन्वयन करेगा. साईट पे इन खंडों को लेजाके समन्वित कर खड़ा करेगा. पहले इन्हें चार खण्डों में समायोजित किया जाएगा. बाद इसके इन्हें Assembly Building तक पहुंचाया जाएगा. वर्कशॉप (कार्यशाला) का निर्माण भारत की घरेलू एजेंसी करेगी. आईटर-इंडिया कम्पोनेंट्स मुहैया करवाएगी.
भारत उस अंतरराष्ट्रीय टीम का हिस्सा है जो सस्ती और साफ़ ऊर्जा का यह अजस्र स्रोत बनाने में जुट गया है. इस सुपर मशीन की सबसे बड़ी इकाई टोकामक (Tokamak) बनाने का जिम्मा भारत ने आगे बढ़के लिया है. हाइड्रोजन जैसे हलके तत्वों को परस्पर सूरज के केन्द्रीय भाग से भी दस गुना ऊंचे तापमान पर गला कर इसका फ्यूज़न करके अपेक्षाकृत भारी तत्व बनाने की प्रक्रिया के लिए सुपर मशीन के इसी हिस्से में अति उत्तप्त गैस हॉट प्लाज्मा तैयार की जायेगी. यह गैस आयनित हो जाती है उच्चतर तापमान पर जिसे हाइड्रोजन का ज्वलन तापमान (ज्वलनांक, Ignition Temperature) कहा जाता है. इसी क्रिया को नाभिकीय संलयन क्रिया फ्यूज़न कहा जाता है. 

सितारों की एटमी भट्टी में यह संलयन क्रिया स्वत: स्फूर्त संपन्न होती है खुद -ब -खुद. केन्द्रीय भाग में हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में जलाने के लिए आवश्यक ताप सितारों के केन्द्रीय भाग (Core) मौजूद रहता है. इस सुपर मशीन का मतलब लेब में एक सूरज से भी ज्यादा शक्तिशाली सितारा खड़ा कर लेना है अजस्र ऊर्जा स्रोत रूप में. इस ग्लोबी प्रोजेक्ट को नाम दिया गया है आईटर (ITER ).लातिनी भाषा में जिसका अर्थ है यही रास्ता है "THE WAY". 

टोकामक अवधारणा के तहत इस अति उत्तप्त आयानित गैस को डोनट (छल्ले के आकार की एक अमरीकी मिठाई कुछ कुछ हमारी इमरती जैसी शक्लोसूरत में बालूशाही सी) की दीवारों से परे रखा जाता है चुम्बकीय बल डालके. इस प्रक्रिया को मेग्नेटिक कनफाइनमेंट (Magnatic Confinement) कहा जाता है. उच्च स्तरीय निर्वात बनाए रखा जाता है इस डॉनट में. ईंधन के रूप में इस मशीन में हाइड्रोजन के ही दो समस्थानिकों (Isotopes) ड्यूटीरिअम (Deuterium) और ट्रीटियम (Tritium) को काम में लिया जाएगा. इन्हें 15 करोड़ सेल्सिअस (15 Million Celsius) तापमान तक गर्माया जाएगा. 

इस अति उत्तप्त प्लाज्मा को टोकामक की दीवारों से परे केंद्र की जानिब संपीडित किए रखने के लिए कम्प्रेस किये रहने के लिए अतिशक्तिशाली चुम्बकीय बल काम में लिए जायेंगे. यह सुपर मशीन तौल में होगी 23,000 मीट्रिक टन. सुपरमशीन का यह वजन तीन आईफेल टावर्स (Eiffel Tower) के बराबर होगा. इसमें कैद प्लाज्मा का आयतन 840 घन मीटर (840 Cubic Meters) रहेगा. 180 हेक्टेअर (01 हेक्टेअर का मतलब 10,000 वर्ग मीटर) का क्षेत्र घेरे रहेगी यह आईटर साईट (ITER Site). दक्षिणी फ्रांस के Cadarche में अवस्थित रहेगी. इस मशीन के लिए आदम कद का 01 किलोमीटर लम्बाई, 400 मीटर चौड़ाई वाला 42 हेक्टेअर क्षेत्र में फैला एक प्लेटफोर्म तैयार किया जाएगा. यह क्षेत्र 60 फ़ुटबाल के मैदान की बराबरी करेगा. 

टोकामक इमारत पेरिस की Arc de Triomphe से भी ऊंची रहेगी. दिसंबर 2015 से शुरू आईटर का पहला Cryostat's Component आईटर साईट पर भारत पहुंचाएगा. यह हमारे वक्त का एक अति महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है. इस भवन का शिलान्यास फ्रांस में 2010 में हो गया था. 34 देशों के सहयोग से पहली प्लाज्मा 2020 में हकीकत में आ जायेगी ऐसी उम्मीद की जाती है. भारत इस टोकामक के सबसे भारी कुल मिलाके 54 खंडों का समन्वयन करेगा. साईट पे इन खंडों को लेजाके समन्वित कर खड़ा करेगा. पहले इन्हें चार खण्डों में समायोजित किया जाएगा. बाद इसके इन्हें Assembly Building तक पहुंचाया जाएगा. वर्कशॉप (कार्यशाला) का निर्माण भारत की घरेलू एजेंसी करेगी. आईटर-इंडिया कम्पोनेंट्स मुहैया करवाएगी.

दिल की बीमारी को दावत देती है कैल्शियम की गोली।


एक ऐसे मुल्क में जहां अस्थि सम्बन्धी समस्याएं उतना ही गंभीर रुख लिए रहतीं हैं जितना दिल की बीमारियाँ, केल्शियम की गोलियों के प्रयोग को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है माहिरों में. एक अमरीकी अध्ययन के मुताबिक़ गाहे बगाहे केल्शियम की गोली निगलने वाले लोगों के लिए दिल की बीमारी से मरने के मौके बढ़ सकते हैं. सन्देश यही है कि केल्शियम सम्पूरण लिया तो जाए मगर एहतियात के साथ, अधाधुंध तरीके से नहीं.

प्रवर हार्ट सर्जन डॉ रमाकांत पांडा के विचार में भारत को भी इस दिशा में कुछ सोचना चाहिए. विमर्श ज़रूरी है. भारतीय भी बे-तहाशा केल्शियम की गोलियां खा रहे हैं. ताज़ा अध्ययन  भारत के संदर्भ में भी विचारणीय ही नहीं प्रासंगिक भी है. जब तक बॉन स्केन  के बाद यह सुनिश्चित न हो जाए के कमीबेशी है या अन्य विटामिनों की शरीर में कमी है और माहिर इसका समर्थन न करे विवेक से काम लें. दूध, दही, चीज़ बंद गोभी, मच्छी आदि केल्शियम के अच्छे स्रोत समझे जाते हैं.

US National Institutes के सौजन्य से यह अध्ययन  सामने आया है जिसमें 50 से लेकर 71 साला लोगों को 12  वर्षों तक प्रेक्षण पर रखा गया. पता चला जो लोग रोजाना 1000 मिलीग्राम से भी ज्यादा केल्शियम रोजाना लेते रहे हैं उनके लिए दिल की बीमारियों से मरने का ख़तरा 20 गुना बढ़ा हुआ रहता है. अध्ययन अमरीकी चिकित्सा संघ के जर्नल JAMA (JOURNAL OF AMERICAN MEDICAL ASSOCIATION) में मार्च 2013 में प्रकाशित हुआ है.

अध्ययन के मुताबिक़ यह भी संभव है धमनियों की दीवारों और रक्त वाहिकाओं में इकठ्ठा हुआ केल्शियम दिल एवं रक्तवाहिकाओं के रोगों को हवा दे रहा हो. पूर्व में न्न्यूजीलैंड  में 2010 में संपन्न एक अध्ययन में यह मुद्दा उठाया गया था. ब्रितानी जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में बतलाया गया थ- "Calcium supplements with or without vitamin D modestly increase the risk of myocardial infarction (MI, Heart attack)."

महत्वपूर्ण कायिक प्रकार्यों को सुचारू रूप चलाये रखने के लिए शरीर में मौजूद केल्शियम का 01% से भी कम अंश चाहिए. बकाया 99% हमारी अस्थियों और मुक्तावली में जमा रहता है. बालिगों के अलावा शेष भारतीयों को चिकित्सकों के अनुसार 1000 मिलीग्राम केल्शियम ज़रूर लेना चाहिए.फिलवक्त इसी पे विमर्श/विवाद ज़ारी  है.

अध्ययन के अनुसार जो महिलायें कुदरती तथा सम्पूर्ण रूप में कुल मिलाके 1400 मिलीग्राम केल्शियम से ज्यादा रोज हजम कर जाती हैं उनके लिए दिल की बीमारियों से मरने का ख़तरा दो गुना बढ़ जाता है. एक और अध्ययन के मुताबिक़ वह पुरुष जो रोज़ाना कम से कम 1000 मिलीग्राम केल्शियम रोज़ लेते रहते हैं उनके लिए दिल से सम्बन्धी बीमारियों से मर जाने का ख़तरा 20% बढ़ जाता है.

सन्दर्भ सामिग्री: टाइम्‍स ऑफ इंडिया
Keywords: calcium supplements, calcium pills, heart attack risk, US National Institutes, journal of american medical association

मित्रों ऑनलाइन वोटिंग के आधार पर जर्मनी के बॉब्‍स इंटरनेशनल अवार्ड में 'सर्वश्रेष्‍ठ हिन्‍दी ब्‍लॉग' श्रेणी में 'तस्‍लीम' तथा 'सबसे रचनात्‍मक' श्रेणी में 'सर्प संसार' को विजेता घोषित किया गया है। इस आयो‍जन में अपना अमूल्‍य योगदान देने वाले सभी सुभेच्‍छुओं का हार्दिक आभार। पूरा समाचार यहां उपलब्‍ध है।

एक ऐसे मुल्क में जहां अस्थि सम्बन्धी समस्याएं उतना ही गंभीर रुख लिए रहतीं हैं जितना दिल की बीमारियाँ, केल्शियम की गोलियों के प्रयोग को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है माहिरों में. एक अमरीकी अध्ययन के मुताबिक़ गाहे बगाहे केल्शियम की गोली निगलने वाले लोगों के लिए दिल की बीमारी से मरने के मौके बढ़ सकते हैं. सन्देश यही है कि केल्शियम सम्पूरण लिया तो जाए मगर एहतियात के साथ, अधाधुंध तरीके से नहीं.

प्रवर हार्ट सर्जन डॉ रमाकांत पांडा के विचार में भारत को भी इस दिशा में कुछ सोचना चाहिए. विमर्श ज़रूरी है. भारतीय भी बे-तहाशा केल्शियम की गोलियां खा रहे हैं. ताज़ा अध्ययन  भारत के संदर्भ में भी विचारणीय ही नहीं प्रासंगिक भी है. जब तक बॉन स्केन  के बाद यह सुनिश्चित न हो जाए के कमीबेशी है या अन्य विटामिनों की शरीर में कमी है और माहिर इसका समर्थन न करे विवेक से काम लें. दूध, दही, चीज़ बंद गोभी, मच्छी आदि केल्शियम के अच्छे स्रोत समझे जाते हैं.

US National Institutes के सौजन्य से यह अध्ययन  सामने आया है जिसमें 50 से लेकर 71 साला लोगों को 12  वर्षों तक प्रेक्षण पर रखा गया. पता चला जो लोग रोजाना 1000 मिलीग्राम से भी ज्यादा केल्शियम रोजाना लेते रहे हैं उनके लिए दिल की बीमारियों से मरने का ख़तरा 20 गुना बढ़ा हुआ रहता है. अध्ययन अमरीकी चिकित्सा संघ के जर्नल JAMA (JOURNAL OF AMERICAN MEDICAL ASSOCIATION) में मार्च 2013 में प्रकाशित हुआ है.

अध्ययन के मुताबिक़ यह भी संभव है धमनियों की दीवारों और रक्त वाहिकाओं में इकठ्ठा हुआ केल्शियम दिल एवं रक्तवाहिकाओं के रोगों को हवा दे रहा हो. पूर्व में न्न्यूजीलैंड  में 2010 में संपन्न एक अध्ययन में यह मुद्दा उठाया गया था. ब्रितानी जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में बतलाया गया थ- "Calcium supplements with or without vitamin D modestly increase the risk of myocardial infarction (MI, Heart attack)."

महत्वपूर्ण कायिक प्रकार्यों को सुचारू रूप चलाये रखने के लिए शरीर में मौजूद केल्शियम का 01% से भी कम अंश चाहिए. बकाया 99% हमारी अस्थियों और मुक्तावली में जमा रहता है. बालिगों के अलावा शेष भारतीयों को चिकित्सकों के अनुसार 1000 मिलीग्राम केल्शियम ज़रूर लेना चाहिए.फिलवक्त इसी पे विमर्श/विवाद ज़ारी  है.

अध्ययन के अनुसार जो महिलायें कुदरती तथा सम्पूर्ण रूप में कुल मिलाके 1400 मिलीग्राम केल्शियम से ज्यादा रोज हजम कर जाती हैं उनके लिए दिल की बीमारियों से मरने का ख़तरा दो गुना बढ़ जाता है. एक और अध्ययन के मुताबिक़ वह पुरुष जो रोज़ाना कम से कम 1000 मिलीग्राम केल्शियम रोज़ लेते रहते हैं उनके लिए दिल से सम्बन्धी बीमारियों से मर जाने का ख़तरा 20% बढ़ जाता है.

सन्दर्भ सामिग्री: टाइम्‍स ऑफ इंडिया
Keywords: calcium supplements, calcium pills, heart attack risk, US National Institutes, journal of american medical association

मित्रों ऑनलाइन वोटिंग के आधार पर जर्मनी के बॉब्‍स इंटरनेशनल अवार्ड में 'सर्वश्रेष्‍ठ हिन्‍दी ब्‍लॉग' श्रेणी में 'तस्‍लीम' तथा 'सबसे रचनात्‍मक' श्रेणी में 'सर्प संसार' को विजेता घोषित किया गया है। इस आयो‍जन में अपना अमूल्‍य योगदान देने वाले सभी सुभेच्‍छुओं का हार्दिक आभार। पूरा समाचार यहां उपलब्‍ध है।

घनघोर पियक्कड़ सावधान हो जाएँ!

अमेरिका के मिसौरी विश्वविद्यालय में एक अध्ययन में घनघोर पियक्कड़ों में यकृत रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के बीच अब तक अज्ञात कनेक्शन का पता चला है. मिसौरी विश्वविद्यालय के मार्गरेट प्रॉक्टर मुलिगन प्रोफेसर डॉ शिवेंद्र शुक्ला, पीएचडी ने अपने अध्ययन में पाया है कि "घनघोर पियक्कड़ों (बिंज ड्रिंकर्स) में जिगर पर एक गहरा प्रभाव पड़ता है." डॉ शुक्ला के अनुसार पुराने पियक्कड़ों में जहाँ जिगर पर धीरे धीरे प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है वहीं  एक घनघोर पीने वाला कम समय में ही अपने जिगर और शरीर के हिस्सों और फलतः स्वास्थ्य को अधिक नुकसान पहुंचा सकता है.

समूची दुनिया में घनघोर पियक्कड़ों की जमात बढ़ रही है. पुरुष ही नहीं यहाँ तक कि महिलायें भी अकेले ही एक ही सिटिंग में कई पैग शराब को हलक के नीचे उतार रही हैं शराब दुर्व्यसन और शराबखोरी के अध्ययन के राष्ट्रीय संस्थान (National Institute on Alcohol Abuse and Alcoholism -NIAAA) द्वारा दो घंटे में चार या अधिक पैग के सेवन को महिलाओं के लिए 'घनघोर पियक्कड़' होना परिभाषित करता है, पुरुषों के लिए, यह दो घंटे में पांच या उससे अधिक पैग है. एक अनुमान के अनुसार विगत एक साल में अमेरिका में महिलाओं में 29 प्रतिशत और पुरुषों में 43 प्रतिशत घनघोर पियक्कडी की घटनाएँ पायी गयी हैं.

 डॉ शिवेंद्र शुक्ला
चूहों में शराब जोखिम के अपने अध्ययन के माध्यम से, डॉ शुक्ला की प्रयोगशाला में शोधकर्ताओं ने पुराने शराब के पियक्कड़ों की तुलना में ज्यादा पियक्कडी की घटनाओं में जिगर को चोट को काफी बढ़ा हुआ पाया पाया. जिगर या यकृत शरीर के लिए मुख्य चयापचय साइट के रूप में पोषक तत्व, दवा चयापचय और वितरण, हृदय, गुर्दे, रक्त वाहिकाओं और मस्तिष्क के ठीक ढंग से काम करने के लिए उत्तरदायी हैं.

वक्त रहते घनघोर पियक्कड़ संभल जाए तभी बेहतर है !

सम्बन्धित समाचार यहाँ, यहाँ और यहाँ देखा जा सकता है.
अमेरिका के मिसौरी विश्वविद्यालय में एक अध्ययन में घनघोर पियक्कड़ों में यकृत रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के बीच अब तक अज्ञात कनेक्शन का पता चला है. मिसौरी विश्वविद्यालय के मार्गरेट प्रॉक्टर मुलिगन प्रोफेसर डॉ शिवेंद्र शुक्ला, पीएचडी ने अपने अध्ययन में पाया है कि "घनघोर पियक्कड़ों (बिंज ड्रिंकर्स) में जिगर पर एक गहरा प्रभाव पड़ता है." डॉ शुक्ला के अनुसार पुराने पियक्कड़ों में जहाँ जिगर पर धीरे धीरे प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है वहीं  एक घनघोर पीने वाला कम समय में ही अपने जिगर और शरीर के हिस्सों और फलतः स्वास्थ्य को अधिक नुकसान पहुंचा सकता है.

समूची दुनिया में घनघोर पियक्कड़ों की जमात बढ़ रही है. पुरुष ही नहीं यहाँ तक कि महिलायें भी अकेले ही एक ही सिटिंग में कई पैग शराब को हलक के नीचे उतार रही हैं शराब दुर्व्यसन और शराबखोरी के अध्ययन के राष्ट्रीय संस्थान (National Institute on Alcohol Abuse and Alcoholism -NIAAA) द्वारा दो घंटे में चार या अधिक पैग के सेवन को महिलाओं के लिए 'घनघोर पियक्कड़' होना परिभाषित करता है, पुरुषों के लिए, यह दो घंटे में पांच या उससे अधिक पैग है. एक अनुमान के अनुसार विगत एक साल में अमेरिका में महिलाओं में 29 प्रतिशत और पुरुषों में 43 प्रतिशत घनघोर पियक्कडी की घटनाएँ पायी गयी हैं.

 डॉ शिवेंद्र शुक्ला
चूहों में शराब जोखिम के अपने अध्ययन के माध्यम से, डॉ शुक्ला की प्रयोगशाला में शोधकर्ताओं ने पुराने शराब के पियक्कड़ों की तुलना में ज्यादा पियक्कडी की घटनाओं में जिगर को चोट को काफी बढ़ा हुआ पाया पाया. जिगर या यकृत शरीर के लिए मुख्य चयापचय साइट के रूप में पोषक तत्व, दवा चयापचय और वितरण, हृदय, गुर्दे, रक्त वाहिकाओं और मस्तिष्क के ठीक ढंग से काम करने के लिए उत्तरदायी हैं.

वक्त रहते घनघोर पियक्कड़ संभल जाए तभी बेहतर है !

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डॉ0 अरविंद मिश्र को शताब्‍दी सम्‍मान।


# डॉ0 अरविंद मिश्र, महामहिम राज्यपाल छत्तीसगढ़ श्री शेखर दत्त से शताब्‍दी सम्मान ग्रहण करते हुए #
विज्ञान परिषद, प्रयाग, इलाहाबाद की चर्चित संस्‍था है, जिसकी स्‍थापना 10 मार्च 1913 को हुई थी। इसके संस्‍थापक थे डॉ0 गंगानाथ झा (संस्‍कृत), प्रो0 सालिगराम भार्गव (भौतिकी), प्रो0 रामदास गौड़ (रसायन विज्ञान) तथा प्रो0 हमीदुद्दीन (अरबी-फारसी), जो अपने-अपने विषयों के विशेषज्ञ थे और जनसामान्‍य में विज्ञान व प्रोद्योगिकी के प्रचार-प्रसार तथा विज्ञान लोकप्रिय के लिए प्रयत्‍नशील थे। 

विज्ञान को सरल भाषा में आम जन तक पहुंचाने के उद्देश्‍य से सन 1915 में विज्ञान परिषद ने 'विज्ञान' नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्‍भ किया, जिसका पहला अंक अप्रैल माह में प्रकाशित हुआ। इस प्रत्रिका के प्रथम सम्‍पादक का गौरव प्राप्‍त हुआ हिन्‍दी के उत्‍कृष्‍ट विद्वान पं0 श्रीधर पाठक को। 

सन 1958 में विज्ञान परिषद से 'विज्ञान परिषद अनुसंधान पत्रिका' का प्रकाशन प्रारम्‍भ हुआ। इसे हिन्‍दी की प्रथम त्रैमासिक शोध पत्रिका के रूप में जाना जाता है। इस पत्रिका के बारे में कहा जाता है कि यह भारत की सभी प्रमुख सरकारी और अर्धसरकारी वैज्ञानिक संस्‍थाओं के अतिरिक विश्‍व के 25 देशों में प्रसारित होती है।

1913 से लेकर आजतक के अपने सफर में 'विज्ञान परिषद' प्रयाग ने 100 साल का सफर तय किया है। इस सफर को यादगार बनाने के उद्देश्‍य से पिछले दिनों इलाहाबाद में परिषद का शताब्‍दी समारोह मनाया गया, जिसका उद्घाटन देश के मुख्‍य वैज्ञानिक एवं पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ0 ए0पी0जे0 अब्‍दुल कलाम ने किया था। उस अवसर पर परिषद ने भारत के विभिन्‍न भाषाओं के 50 लेखकों को शताब्‍दी सम्‍मान से विभूषित किया था। इस अवसर पर परिषद ने 300 पृष्‍ठों की 'शताब्‍दी वर्ष स्‍मारिका' का भी प्रकाशन किया था, जिसमें परिषद की विभिन्‍न गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।
श्री0 के0के0 यादव सम्‍मान ग्रहण करते हुए
शताब्‍दी सम्‍मान के समापन के अवसर पर 27 अप्रैल 2013 को आयोजित कार्यक्रम में विज्ञान परिषद ने पुन: 02 दर्जन से अधिक विज्ञान लेखकों को उनकी सुदीर्घ सेवाओं के लिए सम्‍मानित किया। सम्‍मानित लेखकों में साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन के अध्‍यक्ष डॉ0 अरविंद मिश्र का नाम प्रमुख है। डॉ0 मिश्र के अतिरिक्‍त यह सम्‍मान शुकदेव प्रसाद, डॉ0 राजीव रंजन उपाध्‍याय, निमिष कपूर, मनीष मोहन गोरे, अमित कुमार एवं ब्‍लॉगर कृष्‍ण कुमार यादव आदि को भी प्रदान किया।

सबाई परिवार इस अवसर पर सभी सम्‍मानित जनों को बधाई देता है और उनके यशस्‍वी जीवन की कामना करता है।
मित्रो, आपको सूचित करते हुए हमें हार्दिक प्रसन्‍नता हो रही है कि 'इंटरनेशनल बॉब्‍स अवार्ड-2013' की दौड़ में आपके प्रिय ब्‍लॉग 'तस्लीम' और 'सर्प संसार' सबसे आगे  है। इन्‍हें विजेता बनाने के लिए कृपया यहां पर क्लिक करें और अपना आशीर्वाद प्रदान करें।
 
Keywords: Vigyan Parishad Prayag, Shatabdi Samman, Shatabdi Varsh Smarika, Shukdev Prasad, Dr. Arvind Mishra, Nimish Kapoor, Manish Mohan Gore, Dr Rajiv Ranjan Upadhyay, Irfan Human

# डॉ0 अरविंद मिश्र, महामहिम राज्यपाल छत्तीसगढ़ श्री शेखर दत्त से शताब्‍दी सम्मान ग्रहण करते हुए #
विज्ञान परिषद, प्रयाग, इलाहाबाद की चर्चित संस्‍था है, जिसकी स्‍थापना 10 मार्च 1913 को हुई थी। इसके संस्‍थापक थे डॉ0 गंगानाथ झा (संस्‍कृत), प्रो0 सालिगराम भार्गव (भौतिकी), प्रो0 रामदास गौड़ (रसायन विज्ञान) तथा प्रो0 हमीदुद्दीन (अरबी-फारसी), जो अपने-अपने विषयों के विशेषज्ञ थे और जनसामान्‍य में विज्ञान व प्रोद्योगिकी के प्रचार-प्रसार तथा विज्ञान लोकप्रिय के लिए प्रयत्‍नशील थे। 

विज्ञान को सरल भाषा में आम जन तक पहुंचाने के उद्देश्‍य से सन 1915 में विज्ञान परिषद ने 'विज्ञान' नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्‍भ किया, जिसका पहला अंक अप्रैल माह में प्रकाशित हुआ। इस प्रत्रिका के प्रथम सम्‍पादक का गौरव प्राप्‍त हुआ हिन्‍दी के उत्‍कृष्‍ट विद्वान पं0 श्रीधर पाठक को। 

सन 1958 में विज्ञान परिषद से 'विज्ञान परिषद अनुसंधान पत्रिका' का प्रकाशन प्रारम्‍भ हुआ। इसे हिन्‍दी की प्रथम त्रैमासिक शोध पत्रिका के रूप में जाना जाता है। इस पत्रिका के बारे में कहा जाता है कि यह भारत की सभी प्रमुख सरकारी और अर्धसरकारी वैज्ञानिक संस्‍थाओं के अतिरिक विश्‍व के 25 देशों में प्रसारित होती है।

1913 से लेकर आजतक के अपने सफर में 'विज्ञान परिषद' प्रयाग ने 100 साल का सफर तय किया है। इस सफर को यादगार बनाने के उद्देश्‍य से पिछले दिनों इलाहाबाद में परिषद का शताब्‍दी समारोह मनाया गया, जिसका उद्घाटन देश के मुख्‍य वैज्ञानिक एवं पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ0 ए0पी0जे0 अब्‍दुल कलाम ने किया था। उस अवसर पर परिषद ने भारत के विभिन्‍न भाषाओं के 50 लेखकों को शताब्‍दी सम्‍मान से विभूषित किया था। इस अवसर पर परिषद ने 300 पृष्‍ठों की 'शताब्‍दी वर्ष स्‍मारिका' का भी प्रकाशन किया था, जिसमें परिषद की विभिन्‍न गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।
श्री0 के0के0 यादव सम्‍मान ग्रहण करते हुए
शताब्‍दी सम्‍मान के समापन के अवसर पर 27 अप्रैल 2013 को आयोजित कार्यक्रम में विज्ञान परिषद ने पुन: 02 दर्जन से अधिक विज्ञान लेखकों को उनकी सुदीर्घ सेवाओं के लिए सम्‍मानित किया। सम्‍मानित लेखकों में साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन के अध्‍यक्ष डॉ0 अरविंद मिश्र का नाम प्रमुख है। डॉ0 मिश्र के अतिरिक्‍त यह सम्‍मान शुकदेव प्रसाद, डॉ0 राजीव रंजन उपाध्‍याय, निमिष कपूर, मनीष मोहन गोरे, अमित कुमार एवं ब्‍लॉगर कृष्‍ण कुमार यादव आदि को भी प्रदान किया।

सबाई परिवार इस अवसर पर सभी सम्‍मानित जनों को बधाई देता है और उनके यशस्‍वी जीवन की कामना करता है।
मित्रो, आपको सूचित करते हुए हमें हार्दिक प्रसन्‍नता हो रही है कि 'इंटरनेशनल बॉब्‍स अवार्ड-2013' की दौड़ में आपके प्रिय ब्‍लॉग 'तस्लीम' और 'सर्प संसार' सबसे आगे  है। इन्‍हें विजेता बनाने के लिए कृपया यहां पर क्लिक करें और अपना आशीर्वाद प्रदान करें।
 
Keywords: Vigyan Parishad Prayag, Shatabdi Samman, Shatabdi Varsh Smarika, Shukdev Prasad, Dr. Arvind Mishra, Nimish Kapoor, Manish Mohan Gore, Dr Rajiv Ranjan Upadhyay, Irfan Human

...मेंटल केस भी हो सकता है धूम्रपान ।

धूम्रपान का शौक मनोरोग का एक लक्षण भी हो सकता है. एक ब्रितानी अध्ययन के अनुसार एक तिहाई धूम्रपानी (Smokers) किसी न किसी मनोविकार (Mental Disorder) से ग्रस्त रहते हैं. बतलाया गया ब्रिटेन में प्रत्येक तीन में से एक सिगरेट मनोरोगों से ग्रस्त व्यक्ति ही पी रहे हैं. जब इन आंकड़ों में ड्रग और शराब के लती लोगों को भी शरीक कर लिया जाता है तब यह अनुपात पी गई सिगरेटों का और भी बढ़ जाता है. यह अध्ययन रपट रॉयल कोलिज आफ फिजिशियंस (Royal College of Physicians) और रोयल कालिज आफ साइकिआटरिस्ट्स (Royal College of Psychiatrists) ने ज़ारी की है 

धूम्रपान की दरें (Smoking rates) गत पचास बरसों में आधे से भी कम रह गई है. लोग छिटक रहे हैं धूम्रपान से. लेकिन यह छिटकाव समाज की तमाम परतों में यकसां दिखलाई नहीं दिया है. वंचितों का शौक बन रहा है धूम्रपान इनमें शामिल हैं गरीब गुरबे, बे-घर लोग जिनके सिर पे छत नहीं है सजायाफ्ता लोग तथा मनोविकारों से ग्रस्त लोग. यह एक अभियोग है एक धब्बा है जो ब्रितानी जन स्वास्थ्य नीतियों और नैदानिक सेवाओं पर लगाया जा सकता है. 

रपट ने चेताया है जिसके अनुसार दस करोड़ ब्रितानी धूम्रपानियों में से कम से कम तीन करोड़ लोग किसी न किसी मनोविकार से ग्रस्त हैं. बीते साल इनमें से दो करोड़ को कोई न कोई साइकोएक्टिव दवा भी तजवीज़ की गई है. देर से कायम(दीर्घावधि) मनोरोगों से ग्रस्त रहने वालों की संख्या एक करोड़ को छू रही है. 

जहां आम पब्लिक में स्मोकिंग रेट्स आम जन में नाटकीय तौर पर गिरी हैं, पुरुषों में 56% से तथा महिलाओं में 42% से घटके 21% पर आ गई है वहीँ मनोविकार ग्रस्त लोगों में बामुश्किल ही थोड़ा बहुत बदलाव दिखा है. इनके लिए यह दर 40% पर रुकी हुई है. 

एक बड़ी चुनौती रहा है मनोरोगों से ग्रस्त रोगों को धूम्रपान से छोड़ने के लिए राजी करना मान मनोव्वल से मना लेना. इसी प्रकार से उन स्मोकर्स की शिनाख्त करना भी एक मुश्किल काम रहा आया है जिन्हें इलाज़ की ज़रुरत है, ब्रितानी लंग फ़ाउनडेशन का यही कहना है. "Routinely considering whether someone presenting with a lung disease, or indeed any patient who smokes, might benefit from referral to mental health services, could make the key difference for many individuals," Professor Stefan Spiro, Deputy chair of the British Lung foundation said. 

मनोरोग की उग्रता बढ़ने पर व्यक्ति और भी ज्यादा धूम्रपान करने लगता है. तकरीबन सभी साइकोटिक इलनेस से ग्रस्त व्यक्ति धूम्रपान करते देखे जाते हैं. शायद निकोटिन बेचैनी की उग्रता, अवसाद और अटेंशन डेफिसिट-Attention Deficit (स्थिर चित्त न हो पाने की स्थिति) को कुछ कम करती हो जिसमें मरीज़ ज़रुरत से ज्यादा एक्टिव (हाइपरएक्टिव) हो जाता है? इस सम्‍बंध में भी खोज किये जाने की आवश्‍यकता है।
मित्रो, 'इंटरनेशनल बॉब्‍स अवार्ड-2013' की दौड़ में आपके प्रिय ब्‍लॉग 'तस्लीम' और 'सर्प संसार' सबसे आगे  है। इन्‍हें विजेता बनाने के लिए कृपया यहां पर क्लिक करें और अपना आशीर्वाद प्रदान करें।
सन्दर्भ सामिग्री: Times of India
Keywords: Professor Stefan Spiro, British Lung foundation, Mental Disorder, Royal College of Physicians, Royal College of Psychiatrists, Smoking rates
धूम्रपान का शौक मनोरोग का एक लक्षण भी हो सकता है. एक ब्रितानी अध्ययन के अनुसार एक तिहाई धूम्रपानी (Smokers) किसी न किसी मनोविकार (Mental Disorder) से ग्रस्त रहते हैं. बतलाया गया ब्रिटेन में प्रत्येक तीन में से एक सिगरेट मनोरोगों से ग्रस्त व्यक्ति ही पी रहे हैं. जब इन आंकड़ों में ड्रग और शराब के लती लोगों को भी शरीक कर लिया जाता है तब यह अनुपात पी गई सिगरेटों का और भी बढ़ जाता है. यह अध्ययन रपट रॉयल कोलिज आफ फिजिशियंस (Royal College of Physicians) और रोयल कालिज आफ साइकिआटरिस्ट्स (Royal College of Psychiatrists) ने ज़ारी की है 

धूम्रपान की दरें (Smoking rates) गत पचास बरसों में आधे से भी कम रह गई है. लोग छिटक रहे हैं धूम्रपान से. लेकिन यह छिटकाव समाज की तमाम परतों में यकसां दिखलाई नहीं दिया है. वंचितों का शौक बन रहा है धूम्रपान इनमें शामिल हैं गरीब गुरबे, बे-घर लोग जिनके सिर पे छत नहीं है सजायाफ्ता लोग तथा मनोविकारों से ग्रस्त लोग. यह एक अभियोग है एक धब्बा है जो ब्रितानी जन स्वास्थ्य नीतियों और नैदानिक सेवाओं पर लगाया जा सकता है. 

रपट ने चेताया है जिसके अनुसार दस करोड़ ब्रितानी धूम्रपानियों में से कम से कम तीन करोड़ लोग किसी न किसी मनोविकार से ग्रस्त हैं. बीते साल इनमें से दो करोड़ को कोई न कोई साइकोएक्टिव दवा भी तजवीज़ की गई है. देर से कायम(दीर्घावधि) मनोरोगों से ग्रस्त रहने वालों की संख्या एक करोड़ को छू रही है. 

जहां आम पब्लिक में स्मोकिंग रेट्स आम जन में नाटकीय तौर पर गिरी हैं, पुरुषों में 56% से तथा महिलाओं में 42% से घटके 21% पर आ गई है वहीँ मनोविकार ग्रस्त लोगों में बामुश्किल ही थोड़ा बहुत बदलाव दिखा है. इनके लिए यह दर 40% पर रुकी हुई है. 

एक बड़ी चुनौती रहा है मनोरोगों से ग्रस्त रोगों को धूम्रपान से छोड़ने के लिए राजी करना मान मनोव्वल से मना लेना. इसी प्रकार से उन स्मोकर्स की शिनाख्त करना भी एक मुश्किल काम रहा आया है जिन्हें इलाज़ की ज़रुरत है, ब्रितानी लंग फ़ाउनडेशन का यही कहना है. "Routinely considering whether someone presenting with a lung disease, or indeed any patient who smokes, might benefit from referral to mental health services, could make the key difference for many individuals," Professor Stefan Spiro, Deputy chair of the British Lung foundation said. 

मनोरोग की उग्रता बढ़ने पर व्यक्ति और भी ज्यादा धूम्रपान करने लगता है. तकरीबन सभी साइकोटिक इलनेस से ग्रस्त व्यक्ति धूम्रपान करते देखे जाते हैं. शायद निकोटिन बेचैनी की उग्रता, अवसाद और अटेंशन डेफिसिट-Attention Deficit (स्थिर चित्त न हो पाने की स्थिति) को कुछ कम करती हो जिसमें मरीज़ ज़रुरत से ज्यादा एक्टिव (हाइपरएक्टिव) हो जाता है? इस सम्‍बंध में भी खोज किये जाने की आवश्‍यकता है।
मित्रो, 'इंटरनेशनल बॉब्‍स अवार्ड-2013' की दौड़ में आपके प्रिय ब्‍लॉग 'तस्लीम' और 'सर्प संसार' सबसे आगे  है। इन्‍हें विजेता बनाने के लिए कृपया यहां पर क्लिक करें और अपना आशीर्वाद प्रदान करें।
सन्दर्भ सामिग्री: Times of India
Keywords: Professor Stefan Spiro, British Lung foundation, Mental Disorder, Royal College of Physicians, Royal College of Psychiatrists, Smoking rates

प्‍लीज़ वोट करें, सपोर्ट करें....

मित्रो, विज्ञान संचार प्रेमियों के लिए इससे अधिक खुशी की बात और नहीं हो सकती कि 'बॉब्‍स इंटरनेशनल अवार्ड-2013' (Bobs Online Activism Award-2013) की 'हिन्‍दी का श्रेष्‍ठ ब्‍लॉग' (Best Blog Hindi) श्रेणी में तीन-तीन विज्ञान ब्‍लॉग नामित हुए हैं। ये ब्‍लॉग हैं: 
सर्प संसार (World of Snakess)
 
जैसा कि आप सब जानते हैं कि 'तस्‍लीम' एवं 'सर्प संसार' ब्‍लॉग 'साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन' के सहयोगी ब्‍लॉग हैं और 'ScientificWorld.in' डोमेन के द्वारा ही संचालित होते हैं, जबकि 'विज्ञान विश्‍व' ब्‍लॉग सबाई परिवार के सम्‍मानित सदस्‍य श्री आशीष श्रीवास्‍तव जी का लोकप्रिय ब्‍लॉग है। इन नामांकनों से स्‍पष्‍ट है कि विज्ञान लेखन एक गंभीर कार्य है और भले ही उसपर टिप्‍पणियां आएं अथवा नहीं, किन्‍तु उन्‍हें रेखांकित किया जा रहा है, उन्‍हें इतिहास में दर्ज किया जा रहा है। 

जैसा कि हम लोग पिछले 3 अप्रैल से देख रहे हैं कि 'हिन्‍दी का श्रेष्‍ठ ब्‍लॉग' श्रेणी में 'तस्‍लीम' ब्‍लॉग काफी आगे चल रहा है। अभी तक औसतन कुल वोट के 60 प्रतिशत वोट उसे ही प्राप्‍त हो रहे हैं, इसलिए उम्‍मीद जगती है कि आने वाले दिनों में भी 'तस्‍लीम' की बढ़त बनी रहेगी और वह हिन्‍दी के श्रेष्‍ठ ब्‍लॉग के रूप में जर्मनी में विज्ञान का झंडा लहराने में सफल होगा। 

मित्रो, सकारात्‍मक ब्‍लॉगिंग के इस शहकार को जिताने में आपकी अहम भूमिका है। इसलिए आपसे विनम्र निवेदन है कि कृपया 6 मई तक लगातार अपनी 'Facebook', 'Twitter' एवं 'Open ID' (ब्‍लॉग यूआरएल) से 'तस्‍लीम' को वोट के रूप में अपना आशीर्वाद प्रदान करते रहें। आपके इस अनन्‍य स्‍नेह के लिए हम हृदय से आभारी होंगे। 

मित्रो, हमारे लिए यह दोहरी प्रसन्‍नता का विषय है कि बॉब्‍स पुरस्‍कारों की एक अन्‍य श्रेणी 'सबसे रचनात्‍मक' (Most Creative and Original) में हिन्‍दी भाषा की ओर से 'सर्प संसार' ब्‍लॉग नामांकन पाने में कामयाब हुआ है। इस श्रेणी में भी यह ब्‍लॉग लगभग 35 प्रतिशत वोट के साथ सबसे आगे है। इसलिए उम्‍मीद बंधती है कि यदि इसी तरह इस ब्‍लॉग को भी आपका स्‍नेह/आशीर्वाद प्राप्‍त होता रहेगा, तो निश्‍चय ही इस श्रेणी में यह ब्‍लॉग जर्मनी में हिन्‍दी का परचम लहराने में सफल होगा।

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जैसा कि आप सब जानते हैं कि 'तस्‍लीम' एवं 'सर्प संसार' ब्‍लॉग 'साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन' के सहयोगी ब्‍लॉग हैं और 'ScientificWorld.in' डोमेन के द्वारा ही संचालित होते हैं, जबकि 'विज्ञान विश्‍व' ब्‍लॉग सबाई परिवार के सम्‍मानित सदस्‍य श्री आशीष श्रीवास्‍तव जी का लोकप्रिय ब्‍लॉग है। इन नामांकनों से स्‍पष्‍ट है कि विज्ञान लेखन एक गंभीर कार्य है और भले ही उसपर टिप्‍पणियां आएं अथवा नहीं, किन्‍तु उन्‍हें रेखांकित किया जा रहा है, उन्‍हें इतिहास में दर्ज किया जा रहा है। 

जैसा कि हम लोग पिछले 3 अप्रैल से देख रहे हैं कि 'हिन्‍दी का श्रेष्‍ठ ब्‍लॉग' श्रेणी में 'तस्‍लीम' ब्‍लॉग काफी आगे चल रहा है। अभी तक औसतन कुल वोट के 60 प्रतिशत वोट उसे ही प्राप्‍त हो रहे हैं, इसलिए उम्‍मीद जगती है कि आने वाले दिनों में भी 'तस्‍लीम' की बढ़त बनी रहेगी और वह हिन्‍दी के श्रेष्‍ठ ब्‍लॉग के रूप में जर्मनी में विज्ञान का झंडा लहराने में सफल होगा। 

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...अब बनेंगे खुशबू वाले टीवी.




दोस्तों डिस्प्ले स्क्रीन  इलेक्ट्रॉनिक दुनिया का एक सबसे महत्वपूरण हिस्सा है जिसने की हमारी जिन्दगी को बेहद  ही रोमांचक बना दिया है.जैसा की आप सब जानते ही है की डिस्प्ले स्क्रीन मुख्यत: इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे टी.वी, कंप्यूटर मॉनिटर, मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, प्रोजेक्टर और ए.टी.एम् मशीन इत्यादी में प्रयोग होती है . डिस्प्ले स्क्रीन टेक्नोलोजी में हो रहे विकास का फायदा आज हम सभी उठा रहे है. 

शुरुवाती दौर में इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले उपकरणों में "Vaccum Tube" प्रयोग होती थी, जिसमे की काफी विद्युत ऊर्जा खर्च होती थी  लेकिन जैसे जैसे इस टेक्नोलोजी में विकास होते गये वैसे वैसे आज के समय में "Vaccum Tube" की जगह चिप ( Integrated Circuit ) ने ले ली है. जिसके परिणामस्वरुप आज हम "एल.सी.डी" स्क्रीन का लुत्फ उठा रहे है जिसमे विद्युत् ऊर्जा भी कम खर्च होती है फिर धीरे धीरे इसका विकास टच स्क्रीन तक आ गया जो की मुख्यत मोबाइल और ए.टी.एम् मशीन में इनपुट देने के काम आती है और अब स्क्रीन टेक्नोलोजी का ये विकास "स्मेलिंग स्क्रीन" तक आ पंहुचा है.

अभी हाल ही में टोक्यो यूनिवर्सिटी (Tokyo University) के डिपार्टमेंट ऑफ़  एग्रीकल्चर  एंड  टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक  Haruka Matsukura और उनके साथियो ने इस स्क्रीन को विकसित  किया है जिसका नाम है "olfactory display system". इस स्क्रीन में जिस हिस्से पर हमको खाने पीने की चीजो के चित्र दिखाई देते है स्क्रीन के उस हिस्से से ही उन चीजो की गंध उत्पन्न होती है.  

इस सिस्टम में स्क्रीन के चारो कोनो में विशेष प्रकार के पंखे लगे है इन पंखो से उत्पन्न  होने वाली हवाओ का आपस में कई बार  टकराव कराया जाता है और  टकराव के बाद उत्पन्न होने वाली हवा में  गंध के अहसास के लिए उस गंध की भाप को ठीक उस समय पर   प्रवाहित किया जाता है  जिस समय पर व्यक्ति को  वो चित्र उस स्क्रीन के हिस्से पर दिखाई देता है   और फिर इस प्रकार बनी गंध युक्त हवा को इस प्रकार से स्क्रीन को देखने वाले व्यक्ति की और भेजा जाता जिससे की स्क्रीन को देख  रहे व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है की ये गंध स्क्रीन के कोनो में लगे पंखो से ना आकर स्क्रीन के उस हिस्से से आरही है जिस पर की वो चित्र प्रदर्शित हो रहा है. 

अब देखना ये है की ये स्क्रीन मार्केट में कब तक आती है और कब हम इसको  प्रयोग कर पायेगे. स्क्रीन के विकास का ये सिलसिला यही खत्म नहीं होगा अभी आगे भी अन्य प्रकार की स्क्रीनों का विकास संभव हो पायेगा. 

Keywords: scientific inventions, Vaccum Tube, tokyo university, Haruka Matsukura, Integrated Circuit, olfactory display system



दोस्तों डिस्प्ले स्क्रीन  इलेक्ट्रॉनिक दुनिया का एक सबसे महत्वपूरण हिस्सा है जिसने की हमारी जिन्दगी को बेहद  ही रोमांचक बना दिया है.जैसा की आप सब जानते ही है की डिस्प्ले स्क्रीन मुख्यत: इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे टी.वी, कंप्यूटर मॉनिटर, मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, प्रोजेक्टर और ए.टी.एम् मशीन इत्यादी में प्रयोग होती है . डिस्प्ले स्क्रीन टेक्नोलोजी में हो रहे विकास का फायदा आज हम सभी उठा रहे है. 

शुरुवाती दौर में इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले उपकरणों में "Vaccum Tube" प्रयोग होती थी, जिसमे की काफी विद्युत ऊर्जा खर्च होती थी  लेकिन जैसे जैसे इस टेक्नोलोजी में विकास होते गये वैसे वैसे आज के समय में "Vaccum Tube" की जगह चिप ( Integrated Circuit ) ने ले ली है. जिसके परिणामस्वरुप आज हम "एल.सी.डी" स्क्रीन का लुत्फ उठा रहे है जिसमे विद्युत् ऊर्जा भी कम खर्च होती है फिर धीरे धीरे इसका विकास टच स्क्रीन तक आ गया जो की मुख्यत मोबाइल और ए.टी.एम् मशीन में इनपुट देने के काम आती है और अब स्क्रीन टेक्नोलोजी का ये विकास "स्मेलिंग स्क्रीन" तक आ पंहुचा है.

अभी हाल ही में टोक्यो यूनिवर्सिटी (Tokyo University) के डिपार्टमेंट ऑफ़  एग्रीकल्चर  एंड  टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक  Haruka Matsukura और उनके साथियो ने इस स्क्रीन को विकसित  किया है जिसका नाम है "olfactory display system". इस स्क्रीन में जिस हिस्से पर हमको खाने पीने की चीजो के चित्र दिखाई देते है स्क्रीन के उस हिस्से से ही उन चीजो की गंध उत्पन्न होती है.  

इस सिस्टम में स्क्रीन के चारो कोनो में विशेष प्रकार के पंखे लगे है इन पंखो से उत्पन्न  होने वाली हवाओ का आपस में कई बार  टकराव कराया जाता है और  टकराव के बाद उत्पन्न होने वाली हवा में  गंध के अहसास के लिए उस गंध की भाप को ठीक उस समय पर   प्रवाहित किया जाता है  जिस समय पर व्यक्ति को  वो चित्र उस स्क्रीन के हिस्से पर दिखाई देता है   और फिर इस प्रकार बनी गंध युक्त हवा को इस प्रकार से स्क्रीन को देखने वाले व्यक्ति की और भेजा जाता जिससे की स्क्रीन को देख  रहे व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है की ये गंध स्क्रीन के कोनो में लगे पंखो से ना आकर स्क्रीन के उस हिस्से से आरही है जिस पर की वो चित्र प्रदर्शित हो रहा है. 

अब देखना ये है की ये स्क्रीन मार्केट में कब तक आती है और कब हम इसको  प्रयोग कर पायेगे. स्क्रीन के विकास का ये सिलसिला यही खत्म नहीं होगा अभी आगे भी अन्य प्रकार की स्क्रीनों का विकास संभव हो पायेगा. 

Keywords: scientific inventions, Vaccum Tube, tokyo university, Haruka Matsukura, Integrated Circuit, olfactory display system

ये है सबसे बुजुर्ग सितारा...


वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से मात्र 186 प्रकाश वर्ष की दूरी पर अब तक प्रेक्षण में लिए गए सबसे प्राचीन सितारे  HD 140283 का पता लगाया है. इसकी आयु 13.2 अरब वर्ष आंकी गई है. समझा जाता है यह महाविस्फोट के बाद बने शुरूआती सितारों की पीढ़ी से ताल्लुक रखता है. संभवतया सितारों की दूसरी पीढ़ी से जो बिग बेंग (Big Bang) के बाद पैदा हुए थे. सितारों की एटमी भट्टी में प्राथमिक ईंधन हाइड्रोजन (Hydrogen) से उत्तरोत्तर भारी तत्व बनते गए हैं. इस सितारे में कुछ भारी तत्व भी मौजूद हैं. जबकि पहली पीढ़ी के सितारों में हीलियम (Helium) से भारी तत्व मौजूद नहीं हैं. 

कैसे बने ये दूसरी पीढ़ी के सितारे 
पहली पीढ़ी के आदिम सितारों में से कुछ अपेक्षाकृत भारी सितारे उत्तरोत्तर होने वाले सुपरनोवा (Supernova) विस्फोट में फट गए होंगें. इनसे ही दूसरी पीढ़ी के HD 140283 जैसे सितारे पैदा हुए होंगें. सितारे अपनी जीवन अवधि के अंतिम चरण में कौन सी योनी में जायेंगे यह उनके द्रव्यमान पर निर्भर करता है. 

अपेक्षाकृत भारी सितारे (द्रव्यमान जिनका 2.5-10 गुना रहता है या और भी ज्यादा, सौर द्रव्यमान का) ही सुपरनोवा बनके फटते हैं. मोटापा सितारों को भी रास नहीं आता. इनका बाहरी खोल अन्तरिक्ष में छिटकता चला जाता है केंद्रीय भाग दबता खपता अपेक्षाकृत भारी तत्वों को जन्म देता है. उत्तरोत्तर भारी  रासायनिक तत्व पैदा करने वाली कुदरती एटमी भट्टियां हैं अन्तरिक्ष में मौजूद अरबों अरब सितारे. दो सौ अरब सितारे तो हमारी अपनी ही दूध गंगा (नीहारिका, मिल्की वे गेलेक्सी) में हैं. 

कोई दस खरब (10 टू दी पावर 12) नीहारिकाएं अन्तरिक्ष में मौजूद हैं. प्रत्येक में कोई सौ अरब (टेन टू दी पावर इलेवन) सितारे होंगें. इस प्रकार सृष्टि के गोचर हिस्से में कुल टेन टू दी पावर 23 सितारे होंगे. यह राशि कुल नीहारिकाओं की संख्या और एक नीहारिका में कुल सितारों की संख्या को परस्पर गुणा करने से प्राप्त हुई है. नीहारिका सितारों का एक विशाल झुण्ड होता है जिसमें अरबों सितारे परस्पर गुरुत्व की डोर से बंधे नर्तन एवं भ्रमण करते रहते हैं. 

सितारे HD 140283 के बारे में पेंसिलवानिया स्टेट यूनिवर्सिटी (Pennsylvania State University) के खगोल विज्ञानी होवर्ड बांड (Howard Bond) ने अमरीकन खगोल वैज्ञानिक संघ (American Astronomical Society) को इत्तला दी है. बकौल आपके यह अब तक का सबसे बुजुर्ग सितारा है जिसकी आयु का आकलन सुनिश्चित तौर पर किया गया है. अन्तरिक्ष में हबल दूरबीन (Hubble Telescope) की तैनाती इन अन्वेषणों के मूल में है. इसी की मदद से सितारों की पृथ्वी से संभावित दूरी का अब परिशुद्ध आकलन किया जाता है. सितारों की चमक का  भी. ब्राईटनेस को देख कर ही इसके हाइड्रोजन ईंधन खर्च करने की दर का आकलन किया जाता है. बस ईंधन खर्ची उम्र का पता दे देती है. 
Keywords: HD 140283, Howard Bond, Pennsylvania State University, American Astronomical Society, Milky Way, Galaxy, Supernova, Hydrogen, Helium,

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से मात्र 186 प्रकाश वर्ष की दूरी पर अब तक प्रेक्षण में लिए गए सबसे प्राचीन सितारे  HD 140283 का पता लगाया है. इसकी आयु 13.2 अरब वर्ष आंकी गई है. समझा जाता है यह महाविस्फोट के बाद बने शुरूआती सितारों की पीढ़ी से ताल्लुक रखता है. संभवतया सितारों की दूसरी पीढ़ी से जो बिग बेंग (Big Bang) के बाद पैदा हुए थे. सितारों की एटमी भट्टी में प्राथमिक ईंधन हाइड्रोजन (Hydrogen) से उत्तरोत्तर भारी तत्व बनते गए हैं. इस सितारे में कुछ भारी तत्व भी मौजूद हैं. जबकि पहली पीढ़ी के सितारों में हीलियम (Helium) से भारी तत्व मौजूद नहीं हैं. 

कैसे बने ये दूसरी पीढ़ी के सितारे 
पहली पीढ़ी के आदिम सितारों में से कुछ अपेक्षाकृत भारी सितारे उत्तरोत्तर होने वाले सुपरनोवा (Supernova) विस्फोट में फट गए होंगें. इनसे ही दूसरी पीढ़ी के HD 140283 जैसे सितारे पैदा हुए होंगें. सितारे अपनी जीवन अवधि के अंतिम चरण में कौन सी योनी में जायेंगे यह उनके द्रव्यमान पर निर्भर करता है. 

अपेक्षाकृत भारी सितारे (द्रव्यमान जिनका 2.5-10 गुना रहता है या और भी ज्यादा, सौर द्रव्यमान का) ही सुपरनोवा बनके फटते हैं. मोटापा सितारों को भी रास नहीं आता. इनका बाहरी खोल अन्तरिक्ष में छिटकता चला जाता है केंद्रीय भाग दबता खपता अपेक्षाकृत भारी तत्वों को जन्म देता है. उत्तरोत्तर भारी  रासायनिक तत्व पैदा करने वाली कुदरती एटमी भट्टियां हैं अन्तरिक्ष में मौजूद अरबों अरब सितारे. दो सौ अरब सितारे तो हमारी अपनी ही दूध गंगा (नीहारिका, मिल्की वे गेलेक्सी) में हैं. 

कोई दस खरब (10 टू दी पावर 12) नीहारिकाएं अन्तरिक्ष में मौजूद हैं. प्रत्येक में कोई सौ अरब (टेन टू दी पावर इलेवन) सितारे होंगें. इस प्रकार सृष्टि के गोचर हिस्से में कुल टेन टू दी पावर 23 सितारे होंगे. यह राशि कुल नीहारिकाओं की संख्या और एक नीहारिका में कुल सितारों की संख्या को परस्पर गुणा करने से प्राप्त हुई है. नीहारिका सितारों का एक विशाल झुण्ड होता है जिसमें अरबों सितारे परस्पर गुरुत्व की डोर से बंधे नर्तन एवं भ्रमण करते रहते हैं. 

सितारे HD 140283 के बारे में पेंसिलवानिया स्टेट यूनिवर्सिटी (Pennsylvania State University) के खगोल विज्ञानी होवर्ड बांड (Howard Bond) ने अमरीकन खगोल वैज्ञानिक संघ (American Astronomical Society) को इत्तला दी है. बकौल आपके यह अब तक का सबसे बुजुर्ग सितारा है जिसकी आयु का आकलन सुनिश्चित तौर पर किया गया है. अन्तरिक्ष में हबल दूरबीन (Hubble Telescope) की तैनाती इन अन्वेषणों के मूल में है. इसी की मदद से सितारों की पृथ्वी से संभावित दूरी का अब परिशुद्ध आकलन किया जाता है. सितारों की चमक का  भी. ब्राईटनेस को देख कर ही इसके हाइड्रोजन ईंधन खर्च करने की दर का आकलन किया जाता है. बस ईंधन खर्ची उम्र का पता दे देती है. 
Keywords: HD 140283, Howard Bond, Pennsylvania State University, American Astronomical Society, Milky Way, Galaxy, Supernova, Hydrogen, Helium,

अतीत और वर्तमान की समदिवारात्रि (Equinox)

झारखंड का महापाषाण स्थल
पाषाण कालीन सभ्यता अपने अंदर कई राज सहेजे हुए है, जिनके बारे में अभी भी हमारी जानकारी काफी कम है और इसपर कई दृष्टिकोणों से खोज की आवश्यकता है. आदिवासी विशिष्टता युक्त झाड़खंड में भी पाषाण कालीन सभ्यता के कई अवशेष बिखरे पड़े हैं जिनके कुछ उद्देश्य समय के साथ प्रकाश में आ रहे हैं. ऐसा ही एक महापाषाण स्थल झाड़खंड के हजारीबाग जिले के पंकरी बरवाडीह ग्राम में है. वर्षों से उपेक्षित से पड़े इस स्थल की ओर महापाषाण कालीन सभ्यता पर स्वैच्छिक खोजकार्य कर रहे श्री शुभाशीष दास जी का ध्यान आकर्षित हुआ. 

लगभग दस वर्षों के लगातार अध्ययन ने इस स्थल से जुड़े कई खगोलीय पहलुओं को उजागर किया है जिनकी पुष्टि ब्रिटेन, जर्मनी जैसे कई देशों के विशेषज्ञों ने भी की है, यह बात दीगर है कि अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप ही हमारे देश के भारतीय पुरातत्व संस्थान सहित कई प्रमुख व्यक्ति इस ओर एक सीमा तक ही आकर्षित हुए. बिना किसी विशेष बाह्य सहायता के सिर्फ अपने दृढनिश्चय के बल पर ही श्री शुभाशीष दास ने इस स्थल को अन्तराष्ट्रीय पहचान दिला दी है. 

इसकी विभिन्न खगोलीय पहचानों में से एक है इसका 'समदिवारात्रि' (Equinox) के अवलोकन में प्रयुक्त होना. Equinox जबकि दिन-रात दोनों बराबर होते हैं और वर्ष में दो बार 20/21 मार्च और 22/23 सितंबर को यह घटना घटित होती है. इस स्थल पर 'V' आकृति बनाते दो महापाषाण के मध्य से इन तिथियों को सूर्योदय होता दृष्टिगोचर होता है. प्रतीत होता है कि खगोलीय घटनाओं के प्रति अपनी उत्सुकता और संभवतः कालगणना के शुरूआती दौर में ऐसे प्रयास किये जाने की परंपरा रही होगी. 

बहरहाल श्री दास ने अपने प्रयासों से यहाँ लुप्त सी हो चुकी इस परंपरा को पुनर्स्थापित करने का अभिनव व महत्वपूर्ण प्रयास किया है. विगत 20 मार्च को भी कई स्थानीय तथा बाहर से आये खगोलप्रेमियों ने इस दृश्य का अवलोकन किया. संभवतः संपूर्ण भारत में यह एकमात्र जगह होगी जहाँ उक्त तिथियों पर आम जनता एक खगोलीय दृश्य को देखने एक महापाषाण स्थल पर एकत्रित होती हो. 

यधपि ब्रिटेन के स्टोन हेंज, जो कि Solstice के अध्ययन में प्रयुक्त होता था; जैसे कई विदेशी स्थलों पर यथोचित प्रचार-प्रसार और जागरूकता के कारण काफी लोग ऐसे अवसरों पर जुटते हैं. श्री दास जैसे जुनूनी व्यक्तिओं के प्रयासों और जज्बे को सलाम करते हुए आवश्यकता है कि हम इन स्थलों की खोज, संरक्षण व उनके प्रति जागरुकता लाने के सार्थक प्रयास भी करें. 
झारखंड का महापाषाण स्थल
पाषाण कालीन सभ्यता अपने अंदर कई राज सहेजे हुए है, जिनके बारे में अभी भी हमारी जानकारी काफी कम है और इसपर कई दृष्टिकोणों से खोज की आवश्यकता है. आदिवासी विशिष्टता युक्त झाड़खंड में भी पाषाण कालीन सभ्यता के कई अवशेष बिखरे पड़े हैं जिनके कुछ उद्देश्य समय के साथ प्रकाश में आ रहे हैं. ऐसा ही एक महापाषाण स्थल झाड़खंड के हजारीबाग जिले के पंकरी बरवाडीह ग्राम में है. वर्षों से उपेक्षित से पड़े इस स्थल की ओर महापाषाण कालीन सभ्यता पर स्वैच्छिक खोजकार्य कर रहे श्री शुभाशीष दास जी का ध्यान आकर्षित हुआ. 

लगभग दस वर्षों के लगातार अध्ययन ने इस स्थल से जुड़े कई खगोलीय पहलुओं को उजागर किया है जिनकी पुष्टि ब्रिटेन, जर्मनी जैसे कई देशों के विशेषज्ञों ने भी की है, यह बात दीगर है कि अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप ही हमारे देश के भारतीय पुरातत्व संस्थान सहित कई प्रमुख व्यक्ति इस ओर एक सीमा तक ही आकर्षित हुए. बिना किसी विशेष बाह्य सहायता के सिर्फ अपने दृढनिश्चय के बल पर ही श्री शुभाशीष दास ने इस स्थल को अन्तराष्ट्रीय पहचान दिला दी है. 

इसकी विभिन्न खगोलीय पहचानों में से एक है इसका 'समदिवारात्रि' (Equinox) के अवलोकन में प्रयुक्त होना. Equinox जबकि दिन-रात दोनों बराबर होते हैं और वर्ष में दो बार 20/21 मार्च और 22/23 सितंबर को यह घटना घटित होती है. इस स्थल पर 'V' आकृति बनाते दो महापाषाण के मध्य से इन तिथियों को सूर्योदय होता दृष्टिगोचर होता है. प्रतीत होता है कि खगोलीय घटनाओं के प्रति अपनी उत्सुकता और संभवतः कालगणना के शुरूआती दौर में ऐसे प्रयास किये जाने की परंपरा रही होगी. 

बहरहाल श्री दास ने अपने प्रयासों से यहाँ लुप्त सी हो चुकी इस परंपरा को पुनर्स्थापित करने का अभिनव व महत्वपूर्ण प्रयास किया है. विगत 20 मार्च को भी कई स्थानीय तथा बाहर से आये खगोलप्रेमियों ने इस दृश्य का अवलोकन किया. संभवतः संपूर्ण भारत में यह एकमात्र जगह होगी जहाँ उक्त तिथियों पर आम जनता एक खगोलीय दृश्य को देखने एक महापाषाण स्थल पर एकत्रित होती हो. 

यधपि ब्रिटेन के स्टोन हेंज, जो कि Solstice के अध्ययन में प्रयुक्त होता था; जैसे कई विदेशी स्थलों पर यथोचित प्रचार-प्रसार और जागरूकता के कारण काफी लोग ऐसे अवसरों पर जुटते हैं. श्री दास जैसे जुनूनी व्यक्तिओं के प्रयासों और जज्बे को सलाम करते हुए आवश्यकता है कि हम इन स्थलों की खोज, संरक्षण व उनके प्रति जागरुकता लाने के सार्थक प्रयास भी करें. 

भारतीय ने हासिल किया तपेदिक के इलाज़ में एक नया मुकाम...

डॉ0 बिकुल दास
तपेदिक (Tuberculosis) अर्थात टीबी (TB) का जीवाणु (Bacteria) बेहद चालाक प्रकृति का होता है। वह घात लगाकर अस्थि मज्जा (Bone Marrow), अस्थियों का मुलायम पदार्थ, की कलम कोशाओं (Stem Cells of Bone Marrow) के एक समूह में छिप जाता है और इसीलिए नियम निष्ठ होकर सावधानी पूर्वक सही इलाज़ लेते रहने के बाद भी तपेदिक रोग फिर उभर आता है. जीवाणु अनुकूल अवसर मिलते ही फिर इन छिपे हुए स्थानों से बाहर निकल आता है और इसीलिए तपेदिक को जड़ मूल से नष्ट करना दु:साध्य हो जाता है. ऐसे में न तो एंटीबायटिक्स (Antibiotics) इनकी खोह में पहुँच पाते हैं न हमारे रोग रोधी तंत्र की कोशिकाओं का हरावल दस्ता इनका कुछ बिगाड़ पाता है. 

यह कहना है भारतीय मूल के वैज्ञानिक बिकुल दास (Bikul Das) का जो गत 15 सालों से तपेदिक पर शोधरत हैं और फिलवक्त स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) में शोध कर रहे हैं. आपका विज्ञान पत्रिका साइंस ट्रांसलेशनल (Science Translational Magazine) में महत्वपूर्ण शोध कार्य प्रकाशित हुआ है. इस शोध में यह कहा गया है कि अब तपेदिक के जीवाणु का ढूंढ ढूंढकर खात्मा किया जा सकेगा क्‍योंकि इसकी खोह की टोह ले ली गई है. 

तपेदिक के खिलाफ जिहाद में इस शोध से नए इलाज़ की दिशा में एक कदम रख दिया गया है. वर्तमान में उपलब्ध तपेदिक की दवाएं इनकी खोह तक नहीं पहुँच पा रही थीं न ही इनके छिपने के ठिकानों का किसी को कोई इल्म था. गोहावटी मेडिकल कॉलेज (Guwahati Medical College) की प्रोफ़ेसर दीप ज्योति कलिता (Deep Jyoti Kalita) की इस शोध में भागेदारी रही है. आप इस कार्य को अति महत्वपूर्ण मानती हैं. 

ध्‍यातव्‍य है कि तपेदिक हर साल दुनिया भर में 19 लाख लोगों की जान ले लेता है. भारत में अतिरिक्त रूप से लोकप्रिय डॉट्स इलाज़ (DOTS Therapy), जिसमें मरीज़ को स्वास्थ्य कर्मी की मौजूदगी में नियमित दवा खिलाई जाती है, छ: महीनों में रोग के लक्षणों का शमन ज़रूर कर देता है, पर रोग को पूरी तरह से मिटा नहीं पाता. 

इडू मिशमी जनजाति
दास और उनके सहकर्मियों ने अपने शोध के लिए अरुणांचल प्रदेश (Arunachal Pradesh) के जातिसमूह इडू मिशमी (Idu-Mishimi) को चुना है. इस समुदाय में तपेदिक का प्रकोप बरपा रहता है. आपकी टीम कलम कोशिकाओं में छिपे तपेदिक के जीवाणुओं से आनुवंशिक पदार्थ प्राप्त करने में भी कामयाब रही है. एक्टिव बैक्टीरिया भी इन कोशाओं तथा सीधे सीधे तपेदिक के मरीजों से हासिल करने में कामयाब रही है. वह भी तब जब इनका व्यापक इलाज़ चलता रहा है. बकौल आपके अन्य संक्रमण कारी एजेंट्स भी इसी लुका छिपी वाली रणनीति का इस्तेमाल करते होंगे. ऐसा संकेत शोध के नतीजों से मिलने लगा है. 

अब टीम के लिए देखना यह बाकी है कैसे यह जीवाणु अल्प संख्यक कलम कोशाओं के समूह तक कैसे पहुंचकर उन्हें संक्रमित करता है और सालों बाद फिर सक्रीय हो जाता है. रोग के कथित सफल और सटीक इलाज़ करावाने के बाद भी.

Keywords: Tuberculosis, TB, Bacteria, Bone Marrow, Stem Cells of Bone Marrow, Antibiotics, Bikul Das, Stanford University, Science Translational Magazine, Guwahati Medical College, Deep Jyoti Kalita, DOTS Therapy, Idu-Mishmi,
अगर आपको 'साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन' का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।
डॉ0 बिकुल दास
तपेदिक (Tuberculosis) अर्थात टीबी (TB) का जीवाणु (Bacteria) बेहद चालाक प्रकृति का होता है। वह घात लगाकर अस्थि मज्जा (Bone Marrow), अस्थियों का मुलायम पदार्थ, की कलम कोशाओं (Stem Cells of Bone Marrow) के एक समूह में छिप जाता है और इसीलिए नियम निष्ठ होकर सावधानी पूर्वक सही इलाज़ लेते रहने के बाद भी तपेदिक रोग फिर उभर आता है. जीवाणु अनुकूल अवसर मिलते ही फिर इन छिपे हुए स्थानों से बाहर निकल आता है और इसीलिए तपेदिक को जड़ मूल से नष्ट करना दु:साध्य हो जाता है. ऐसे में न तो एंटीबायटिक्स (Antibiotics) इनकी खोह में पहुँच पाते हैं न हमारे रोग रोधी तंत्र की कोशिकाओं का हरावल दस्ता इनका कुछ बिगाड़ पाता है. 

यह कहना है भारतीय मूल के वैज्ञानिक बिकुल दास (Bikul Das) का जो गत 15 सालों से तपेदिक पर शोधरत हैं और फिलवक्त स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) में शोध कर रहे हैं. आपका विज्ञान पत्रिका साइंस ट्रांसलेशनल (Science Translational Magazine) में महत्वपूर्ण शोध कार्य प्रकाशित हुआ है. इस शोध में यह कहा गया है कि अब तपेदिक के जीवाणु का ढूंढ ढूंढकर खात्मा किया जा सकेगा क्‍योंकि इसकी खोह की टोह ले ली गई है. 

तपेदिक के खिलाफ जिहाद में इस शोध से नए इलाज़ की दिशा में एक कदम रख दिया गया है. वर्तमान में उपलब्ध तपेदिक की दवाएं इनकी खोह तक नहीं पहुँच पा रही थीं न ही इनके छिपने के ठिकानों का किसी को कोई इल्म था. गोहावटी मेडिकल कॉलेज (Guwahati Medical College) की प्रोफ़ेसर दीप ज्योति कलिता (Deep Jyoti Kalita) की इस शोध में भागेदारी रही है. आप इस कार्य को अति महत्वपूर्ण मानती हैं. 

ध्‍यातव्‍य है कि तपेदिक हर साल दुनिया भर में 19 लाख लोगों की जान ले लेता है. भारत में अतिरिक्त रूप से लोकप्रिय डॉट्स इलाज़ (DOTS Therapy), जिसमें मरीज़ को स्वास्थ्य कर्मी की मौजूदगी में नियमित दवा खिलाई जाती है, छ: महीनों में रोग के लक्षणों का शमन ज़रूर कर देता है, पर रोग को पूरी तरह से मिटा नहीं पाता. 

इडू मिशमी जनजाति
दास और उनके सहकर्मियों ने अपने शोध के लिए अरुणांचल प्रदेश (Arunachal Pradesh) के जातिसमूह इडू मिशमी (Idu-Mishimi) को चुना है. इस समुदाय में तपेदिक का प्रकोप बरपा रहता है. आपकी टीम कलम कोशिकाओं में छिपे तपेदिक के जीवाणुओं से आनुवंशिक पदार्थ प्राप्त करने में भी कामयाब रही है. एक्टिव बैक्टीरिया भी इन कोशाओं तथा सीधे सीधे तपेदिक के मरीजों से हासिल करने में कामयाब रही है. वह भी तब जब इनका व्यापक इलाज़ चलता रहा है. बकौल आपके अन्य संक्रमण कारी एजेंट्स भी इसी लुका छिपी वाली रणनीति का इस्तेमाल करते होंगे. ऐसा संकेत शोध के नतीजों से मिलने लगा है. 

अब टीम के लिए देखना यह बाकी है कैसे यह जीवाणु अल्प संख्यक कलम कोशाओं के समूह तक कैसे पहुंचकर उन्हें संक्रमित करता है और सालों बाद फिर सक्रीय हो जाता है. रोग के कथित सफल और सटीक इलाज़ करावाने के बाद भी.

Keywords: Tuberculosis, TB, Bacteria, Bone Marrow, Stem Cells of Bone Marrow, Antibiotics, Bikul Das, Stanford University, Science Translational Magazine, Guwahati Medical College, Deep Jyoti Kalita, DOTS Therapy, Idu-Mishmi,
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मधुमक्‍खी ने सुझाई सुरक्षित यौन संसर्ग की राह।

एक महत्वपूर्ण अन्वेषण में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मधुमख्खी के डंक में ऐसे नैनोकण (Nano Particles) होते हैं जो एक प्रकार का विष लिए (Toxin) रहते हैं. इस विष के अध्‍ययन से यह ज्ञात हुआ है कि इसमें एचआईवी-एड्स विषाणु (HIV Aids Virus) को नष्ट करने की क्षमता मौजूद रहती है. खोज में यह भी पता चला है कि यह विष एचआईवी विषाणु पर तो घातक असर दिखाता है, लेकिन ये अतिसूक्ष्म (अणु आकारीय) कण आसपास की कोशाओं को बे-असर छोड़ देते हैं. 

इस अन्वेषण से एक ऐसा Vaginal Gel बना लेने की संभावना बलवती हो गई है जो महिला-पुरुष के परस्पर यौन-संसर्ग से लगने वाले संक्रमण को थाम सकती है. योनी में मैथुन पूर्व चुपड़ लेने वाले इस जेल को तैयार किया है वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसन (Washington University School of Medicine) के वैज्ञानिकों ने. 

ज्ञातव्‍य है कि मधुमक्‍खी डंक मारने के दौरान ऐसा विषैला पदार्थ (Bee Venom) छोड़ती है जिसमें एक असरकारी जीव-विष (Toxin) मौजूद रहता है जो विषाणु एचआईवी को घेरे रखने वाले सुरक्षा कवच में सैंध लगाके अनेक सूक्ष्म सूराख पैदा कर देता है. कई अन्य विषाणुओं के कवच के साथ भी यह जीव-विष जिसे Melittin कहा जाता है ऐसा ही करता है. इस पदार्थ की बड़ी मात्रा एचआईवी कुनबे में तबाही ला सकती है. 

The new study shows that melittin loaded onto these nanoparticles does not harm normal cells because researcher Joshua L Hood added protective bumpers to the nanoparticles surface. 

स्वस्थ कोशाओं को यह विषैला पदार्थ इसीलिए कोई क्षति नहीं पहुंचा पाता है क्योंकि बी वेनम में मौजूद नैनोकणों की सतह पर टक्कर-रोक (Bumpers) जड़ दिए गए हैं. ये नैनोकण अपने से आकार में बड़ी कोशाओं से टकराके लौट आते हैं. कोशाएं इसीलिए निरापद बनी रहती हैं क्योंकि ये कण कोशाओं से खासे छोटे होते हैं. 

सन्दर्भ सामिग्री: The times of India 
Key Words: Bee Venom, Vaginal gel, Bee HIV Aids Virus, Venom kill HIV, Bumpers, Melittin, Washington University School of Medicine, Safe Sexual Relation, Safe Sex, Nano Particles

एक महत्वपूर्ण अन्वेषण में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मधुमख्खी के डंक में ऐसे नैनोकण (Nano Particles) होते हैं जो एक प्रकार का विष लिए (Toxin) रहते हैं. इस विष के अध्‍ययन से यह ज्ञात हुआ है कि इसमें एचआईवी-एड्स विषाणु (HIV Aids Virus) को नष्ट करने की क्षमता मौजूद रहती है. खोज में यह भी पता चला है कि यह विष एचआईवी विषाणु पर तो घातक असर दिखाता है, लेकिन ये अतिसूक्ष्म (अणु आकारीय) कण आसपास की कोशाओं को बे-असर छोड़ देते हैं. 

इस अन्वेषण से एक ऐसा Vaginal Gel बना लेने की संभावना बलवती हो गई है जो महिला-पुरुष के परस्पर यौन-संसर्ग से लगने वाले संक्रमण को थाम सकती है. योनी में मैथुन पूर्व चुपड़ लेने वाले इस जेल को तैयार किया है वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसन (Washington University School of Medicine) के वैज्ञानिकों ने. 

ज्ञातव्‍य है कि मधुमक्‍खी डंक मारने के दौरान ऐसा विषैला पदार्थ (Bee Venom) छोड़ती है जिसमें एक असरकारी जीव-विष (Toxin) मौजूद रहता है जो विषाणु एचआईवी को घेरे रखने वाले सुरक्षा कवच में सैंध लगाके अनेक सूक्ष्म सूराख पैदा कर देता है. कई अन्य विषाणुओं के कवच के साथ भी यह जीव-विष जिसे Melittin कहा जाता है ऐसा ही करता है. इस पदार्थ की बड़ी मात्रा एचआईवी कुनबे में तबाही ला सकती है. 

The new study shows that melittin loaded onto these nanoparticles does not harm normal cells because researcher Joshua L Hood added protective bumpers to the nanoparticles surface. 

स्वस्थ कोशाओं को यह विषैला पदार्थ इसीलिए कोई क्षति नहीं पहुंचा पाता है क्योंकि बी वेनम में मौजूद नैनोकणों की सतह पर टक्कर-रोक (Bumpers) जड़ दिए गए हैं. ये नैनोकण अपने से आकार में बड़ी कोशाओं से टकराके लौट आते हैं. कोशाएं इसीलिए निरापद बनी रहती हैं क्योंकि ये कण कोशाओं से खासे छोटे होते हैं. 

सन्दर्भ सामिग्री: The times of India 
Key Words: Bee Venom, Vaginal gel, Bee HIV Aids Virus, Venom kill HIV, Bumpers, Melittin, Washington University School of Medicine, Safe Sexual Relation, Safe Sex, Nano Particles

धुम्रपान एवं शराब से बचाने में कारगर है सुबह का नाश्ता।

सुबह का नाश्ता बच्चों को समझने, सीखने और सोचने की बेहतर क्षमता से संपन्न चतुर सुजान बनाता है. एक अध्ययन के अनुसार ऐसे बच्चे जो तकरीबन रोजाना नाश्ता करते हैं बुद्धि कोशांक के मामले में भी बेहतर अंक हासिल करते हैं फिर चाहे वह ओरल आई क्यु (Oral IQ) की बात हो या प्रदर्शन एवं कार्यक्रम निष्पादन से ताल्लुक रखने वाले परफोर्मेंस आई क्यु (Performance IQ) की. इनका आई क्यु का कुल जोड़ उन नौनिहालों से कहीं बेहतर रहता है जो कभी कभार ही सुबह का नाश्ता करते हैं. 

अपने इस अध्ययन में रिसर्चरों ने चीन के 1,269 बालकों के नाश्ता खाने की नियमितता और उनके बुद्धि कौशल अंक का जायजा लेने के बाद पता लगाया है कि जो बच्चे नाश्ता लेने में आनाकानी करते हैं, नियमित नाश्ता नहीं लेते हैं, वह बुद्धि कौशल के मौखिक परीक्षण में 5.58 अंकों से तथा प्रदर्शन एवं कार्य निष्पादन परीक्षण (परफोर्मेंस आई क्यु) में 2.50 अंकों से तथा कुल मिलाके 4.6 अंकों से पिछड़ जाते हैं बरक्स उन बच्चों के जो नियम निष्ठ होकर सुबह का नाश्ता लेते हैं. 

शोधार्थियों के अनुसार बालपन में ही अच्छी बुरी आदतों के संस्कार पड़ते हैं खान पान रहनी सहनी, जीवन शैली एक रूप इख्त्यार करने लगती है जिसका तात्कालिक असर तो पड़ता ही है दूरगामी (दीर्घकालिक असर भी आगे जाके देखने को मिलता है) भी पड़ता है. पता चला है जो बच्‍चे अनियमित रहते हैं ब्रेकफास्ट के मामले में वह जल्दी हो धूम्रपान भी करने लगते हैं शराब की और भी प्रवृत्त होने लगते हैं. व्यायाम भी कभी कभार ही करते हैं. 

6 साल का होते होते बालक की बोध सम्बन्धी क्षमता, मौखिक रूप से भी और कार्यनिष्पादन रूप से भी, बूझने एवं सोचने की क्षमता तेज़ी से विकसित होने लगती है. बहुत ही महत्वपूर्ण समय है यह जीवन का जहां नाश्ते करने की आदत के पोषक एवं सामाजिक पहलू अपनी भूमिका संभालने लगते हैं. यदि आपने रात का भोजन आठ बजे भी किया है और सुबह नाश्ता सात बजे कर रहे हैं तो 11 घंटा तक आपके दिमाग की कोशाओं को ईंधन नहीं मिला है. वह चिल्लाने लगती हैं ईंधन के लिए अगर आप बिना ब्रेकफास्ट किए स्कूल का रूख कर लें और वहां दोपहर पूर्व 11-12 बजे लंच ब्रेक में ही कुछ खाएं. दिमागी ईंधन है सुबह का नाश्ता. 

इसके अलावा माँ बाप के साथ ब्रेकफास्ट टेबिल पर हल्का फुल्का विमर्श आगे चलके बहुत काम आता है. आपका सामन्य ज्ञान भी बढ़ता है शब्द कोष भी. तेज़ी से विकसित होता है बूझने सोचने समझने की क्षमता बढती है. साथ ही लिखने की क्षमता भी पनपने लगती है.खाने की मेज़ के गिर्द हुआ विमर्श बड़े काम आता है. 

स्कूल भी अपनी भूमिका से बच नहीं सकते. स्कूल लगने के समय में या तो नौनिहालों के अनुरूप बदलाव हो या स्कूल नाश्ता करवाए और उसके बाद सुबह का पाठ, सुबह की सीख/पाठ्य क्रम शुरू किया जाए. 

नाश्ता न सिर्फ प्रतिभा को पंख लगाता है, बच्‍चों में पाए जाने वाले व्यवहार सम्बन्धी विकारों की संभावना को भी कम करता है. आगे जाके इन बालकों को वयस्क के रूप में अपने पेशे से ज्यादा परितोष प्राप्त होता है, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में उसकी कामयाबी के मौके बढ़ते हैं. कुल मिलाकर दीर्घावधि में हमारे भौतिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों से ही जाकर जुड़ती है सुबह के नाश्ते की नव्ज़. 

सन्दर्भ सामग्री: www.mumbaimirror.com
Keywords: Breakfast could make kids smarter, benefit of breakfast, kids care, kids health, kids healthy snack, Performance IQ, Oral IQ
सुबह का नाश्ता बच्चों को समझने, सीखने और सोचने की बेहतर क्षमता से संपन्न चतुर सुजान बनाता है. एक अध्ययन के अनुसार ऐसे बच्चे जो तकरीबन रोजाना नाश्ता करते हैं बुद्धि कोशांक के मामले में भी बेहतर अंक हासिल करते हैं फिर चाहे वह ओरल आई क्यु (Oral IQ) की बात हो या प्रदर्शन एवं कार्यक्रम निष्पादन से ताल्लुक रखने वाले परफोर्मेंस आई क्यु (Performance IQ) की. इनका आई क्यु का कुल जोड़ उन नौनिहालों से कहीं बेहतर रहता है जो कभी कभार ही सुबह का नाश्ता करते हैं. 

अपने इस अध्ययन में रिसर्चरों ने चीन के 1,269 बालकों के नाश्ता खाने की नियमितता और उनके बुद्धि कौशल अंक का जायजा लेने के बाद पता लगाया है कि जो बच्चे नाश्ता लेने में आनाकानी करते हैं, नियमित नाश्ता नहीं लेते हैं, वह बुद्धि कौशल के मौखिक परीक्षण में 5.58 अंकों से तथा प्रदर्शन एवं कार्य निष्पादन परीक्षण (परफोर्मेंस आई क्यु) में 2.50 अंकों से तथा कुल मिलाके 4.6 अंकों से पिछड़ जाते हैं बरक्स उन बच्चों के जो नियम निष्ठ होकर सुबह का नाश्ता लेते हैं. 

शोधार्थियों के अनुसार बालपन में ही अच्छी बुरी आदतों के संस्कार पड़ते हैं खान पान रहनी सहनी, जीवन शैली एक रूप इख्त्यार करने लगती है जिसका तात्कालिक असर तो पड़ता ही है दूरगामी (दीर्घकालिक असर भी आगे जाके देखने को मिलता है) भी पड़ता है. पता चला है जो बच्‍चे अनियमित रहते हैं ब्रेकफास्ट के मामले में वह जल्दी हो धूम्रपान भी करने लगते हैं शराब की और भी प्रवृत्त होने लगते हैं. व्यायाम भी कभी कभार ही करते हैं. 

6 साल का होते होते बालक की बोध सम्बन्धी क्षमता, मौखिक रूप से भी और कार्यनिष्पादन रूप से भी, बूझने एवं सोचने की क्षमता तेज़ी से विकसित होने लगती है. बहुत ही महत्वपूर्ण समय है यह जीवन का जहां नाश्ते करने की आदत के पोषक एवं सामाजिक पहलू अपनी भूमिका संभालने लगते हैं. यदि आपने रात का भोजन आठ बजे भी किया है और सुबह नाश्ता सात बजे कर रहे हैं तो 11 घंटा तक आपके दिमाग की कोशाओं को ईंधन नहीं मिला है. वह चिल्लाने लगती हैं ईंधन के लिए अगर आप बिना ब्रेकफास्ट किए स्कूल का रूख कर लें और वहां दोपहर पूर्व 11-12 बजे लंच ब्रेक में ही कुछ खाएं. दिमागी ईंधन है सुबह का नाश्ता. 

इसके अलावा माँ बाप के साथ ब्रेकफास्ट टेबिल पर हल्का फुल्का विमर्श आगे चलके बहुत काम आता है. आपका सामन्य ज्ञान भी बढ़ता है शब्द कोष भी. तेज़ी से विकसित होता है बूझने सोचने समझने की क्षमता बढती है. साथ ही लिखने की क्षमता भी पनपने लगती है.खाने की मेज़ के गिर्द हुआ विमर्श बड़े काम आता है. 

स्कूल भी अपनी भूमिका से बच नहीं सकते. स्कूल लगने के समय में या तो नौनिहालों के अनुरूप बदलाव हो या स्कूल नाश्ता करवाए और उसके बाद सुबह का पाठ, सुबह की सीख/पाठ्य क्रम शुरू किया जाए. 

नाश्ता न सिर्फ प्रतिभा को पंख लगाता है, बच्‍चों में पाए जाने वाले व्यवहार सम्बन्धी विकारों की संभावना को भी कम करता है. आगे जाके इन बालकों को वयस्क के रूप में अपने पेशे से ज्यादा परितोष प्राप्त होता है, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में उसकी कामयाबी के मौके बढ़ते हैं. कुल मिलाकर दीर्घावधि में हमारे भौतिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों से ही जाकर जुड़ती है सुबह के नाश्ते की नव्ज़. 

सन्दर्भ सामग्री: www.mumbaimirror.com
Keywords: Breakfast could make kids smarter, benefit of breakfast, kids care, kids health, kids healthy snack, Performance IQ, Oral IQ

आसमानी खतरों से सावधानी...


अक्सर उन लोगों को घोर निराशावादी कहके उनका मज़ाक उड़ाया जाता है जो आसमानी खतरों की प्रागुक्ति करते हैं, आसमान से आने वाली आफतों के प्रति सावधान करते हैं. अक्सर इन लोगों ने आसमानी आफतों की समय रहते टोह न ले पाने के प्रति चेताया भी  है. टोही उपकरणों का भी रोना रोया है. 

मज़ाक उड़ाने वालों को अब रूस के साइबेरिया क्षेत्र के ऊपर आई आसमानी फायर बाल (Bolide or meteor) ने जिसमें सैंकड़ों लोग घायल हो गए और हज़ारों सदमे में चले गए, इन बड़बोलों का, दूसरों को निराशावादी कहके  मखौल उड़ाने वालों का कुछ तो सुल्तानी भरम तोड़ा होगा. यकायक बात होने लगी है अन्तरिक्ष की कक्षा में एक ऐसी दूरबीन की तैनाती की जो सौरमंडल परिवार से आने वाले खतरों को वक्त रहते तौल सके.

गौरतलब है सिलिकोन वेळी (सैन होज़े, केलिफोर्निया राज्य) के युवा उद्यमी जो  इस दिशा में काम करते रहे जिन्होनें eBay, Google, Facebook जैसी कम्पनियां  खड़ी  की हैं इस काम पर भी अब तक लाखों डॉलर की खर्ची कर चुके हैं. अब वह अभिनव टोही उपकरणों के लिए और रकम जुटाने में जुट गए हैं. क्या यह हमारा दुर्भाग्य नहीं होगा कि हम अपने सुल्तानी गुरूर में आसमान से आने वाली आफतों से सिर्फ इसलिए मारे जाए, हम लापरवाह बने उस ओर  से आँखें मूंदे हुए थे. यही  कहना है Edward Lu का. आप अमरीकी अन्तरिक्ष एजेंसी के एक पूर्व अन्तरिक्ष यात्री, गूगल  के कार्यकारी अधिकारी हैं. आसमानी आफतों की टोह लेने वाले  प्रयासों से आप जुड़े हुए हैं. उन्हीं के लफ्जों में- "This is  a wake -up call from space .We have got to pay attention to what's out there."

बेशक खगोल शाष्त्री किसी भी क्षुद्रग्रह  या ऐसे धूमकेतु की बात नहीं करते जिससे पृथ्वीवासियों  को कोई बड़ा ख़तरा हो .लेकिन अमरीकी अन्तरिक्ष संस्था नासा  इससे इत्तेफाक नहीं रखती है. बकौल इसके कोई दस फीसद से थोड़े ही कम ऐसे बड़े खतरे आसमानी आपदाओं के मौजूद हैं. भौमेतर हमलों से पृथ्वी वासियों को किस प्रकार बचाया जाए ऐसे ही प्रयासों के लिए लू का समूह काम कर रहा है जिसने अपनी संस्था का नाम रखा है B612 Foundation. 

यह नामकरण उस काल्पनिक क्षुद्र ग्रह से ताल्लुक रखता है जिसपे एक नन्ना राजकुमार रहता था. Planetary Resources नासा के अलावा ऐसे ही एक निजी समूह का नाम है जो न सिर्फ क्षुद्र ग्रहों की शिनाख्त करना चाहता है इनसे बहुमूल्य खनिज भी निकालना चाहता है खुदाई करके. 

रूस के साइबेरिया इलाके में उल्कापिंड से मची तबाही के बाद नासा के ग्रह विज्ञान (Planetary science) के निदेशक जेम्स ग्रीन ने एक भेंट वार्ता में कहा-हमारा काम सुरक्षा प्रबंधों को पुख्ता करना है, फस्ट लाइन आफ डिफेन्स खड़ी करना है और हम इस मामले को पूरी गंभीरता से लेते हैं. इस ग्रह पर  रहने वाला कोई भी प्राणि आसमानी आफत से इससे पहले आहत नहीं हुआ है, यह बात अब इतिहास में दफन हो चुकी है. 

रूस दुर्घटना के बाद भौमेतर आपदाओं से, आसमानी आफतों से बचने के लिए अब लोग ज्यादा दमखम से काम करेंगे .एक न ऊर्जा भर दी है इस घटना ने इस काम से जुड़े तमाम लोगों में। 


Keywords: space threats, space hazards, cosmic hazards, meteor fall, Wake up call from space, B612 Foundation, Planetary Resources, Planetary science

अक्सर उन लोगों को घोर निराशावादी कहके उनका मज़ाक उड़ाया जाता है जो आसमानी खतरों की प्रागुक्ति करते हैं, आसमान से आने वाली आफतों के प्रति सावधान करते हैं. अक्सर इन लोगों ने आसमानी आफतों की समय रहते टोह न ले पाने के प्रति चेताया भी  है. टोही उपकरणों का भी रोना रोया है. 

मज़ाक उड़ाने वालों को अब रूस के साइबेरिया क्षेत्र के ऊपर आई आसमानी फायर बाल (Bolide or meteor) ने जिसमें सैंकड़ों लोग घायल हो गए और हज़ारों सदमे में चले गए, इन बड़बोलों का, दूसरों को निराशावादी कहके  मखौल उड़ाने वालों का कुछ तो सुल्तानी भरम तोड़ा होगा. यकायक बात होने लगी है अन्तरिक्ष की कक्षा में एक ऐसी दूरबीन की तैनाती की जो सौरमंडल परिवार से आने वाले खतरों को वक्त रहते तौल सके.

गौरतलब है सिलिकोन वेळी (सैन होज़े, केलिफोर्निया राज्य) के युवा उद्यमी जो  इस दिशा में काम करते रहे जिन्होनें eBay, Google, Facebook जैसी कम्पनियां  खड़ी  की हैं इस काम पर भी अब तक लाखों डॉलर की खर्ची कर चुके हैं. अब वह अभिनव टोही उपकरणों के लिए और रकम जुटाने में जुट गए हैं. क्या यह हमारा दुर्भाग्य नहीं होगा कि हम अपने सुल्तानी गुरूर में आसमान से आने वाली आफतों से सिर्फ इसलिए मारे जाए, हम लापरवाह बने उस ओर  से आँखें मूंदे हुए थे. यही  कहना है Edward Lu का. आप अमरीकी अन्तरिक्ष एजेंसी के एक पूर्व अन्तरिक्ष यात्री, गूगल  के कार्यकारी अधिकारी हैं. आसमानी आफतों की टोह लेने वाले  प्रयासों से आप जुड़े हुए हैं. उन्हीं के लफ्जों में- "This is  a wake -up call from space .We have got to pay attention to what's out there."

बेशक खगोल शाष्त्री किसी भी क्षुद्रग्रह  या ऐसे धूमकेतु की बात नहीं करते जिससे पृथ्वीवासियों  को कोई बड़ा ख़तरा हो .लेकिन अमरीकी अन्तरिक्ष संस्था नासा  इससे इत्तेफाक नहीं रखती है. बकौल इसके कोई दस फीसद से थोड़े ही कम ऐसे बड़े खतरे आसमानी आपदाओं के मौजूद हैं. भौमेतर हमलों से पृथ्वी वासियों को किस प्रकार बचाया जाए ऐसे ही प्रयासों के लिए लू का समूह काम कर रहा है जिसने अपनी संस्था का नाम रखा है B612 Foundation. 

यह नामकरण उस काल्पनिक क्षुद्र ग्रह से ताल्लुक रखता है जिसपे एक नन्ना राजकुमार रहता था. Planetary Resources नासा के अलावा ऐसे ही एक निजी समूह का नाम है जो न सिर्फ क्षुद्र ग्रहों की शिनाख्त करना चाहता है इनसे बहुमूल्य खनिज भी निकालना चाहता है खुदाई करके. 

रूस के साइबेरिया इलाके में उल्कापिंड से मची तबाही के बाद नासा के ग्रह विज्ञान (Planetary science) के निदेशक जेम्स ग्रीन ने एक भेंट वार्ता में कहा-हमारा काम सुरक्षा प्रबंधों को पुख्ता करना है, फस्ट लाइन आफ डिफेन्स खड़ी करना है और हम इस मामले को पूरी गंभीरता से लेते हैं. इस ग्रह पर  रहने वाला कोई भी प्राणि आसमानी आफत से इससे पहले आहत नहीं हुआ है, यह बात अब इतिहास में दफन हो चुकी है. 

रूस दुर्घटना के बाद भौमेतर आपदाओं से, आसमानी आफतों से बचने के लिए अब लोग ज्यादा दमखम से काम करेंगे .एक न ऊर्जा भर दी है इस घटना ने इस काम से जुड़े तमाम लोगों में। 


Keywords: space threats, space hazards, cosmic hazards, meteor fall, Wake up call from space, B612 Foundation, Planetary Resources, Planetary science

रूस का वह भयावह उल्कापात!

जाने माने विज्ञान संचारक वीरेंद्र कुमार शर्मा जी की सधी लेखनी दे रही है ब्‍यौरा रूस में हुए भयानक उल्कापात का। वे बता रहे हैं कि कैसे ये उल्काएँ पथभ्रष्ट पुच्छल ताराओं के अवशेष भी हो सकते हैं! 

धूमकेतु (Comet) सूरज के नियतकालिक मेहमान होते हैं जो एक ख़ास अवधि के बाद सुदूर अन्तरिक्ष से (अक्सर मंगल और बृहस्पति के बीच से) मिलने आते हैं. सूरज के साथ हर भेंट में इनका 10% द्रव्यमान उड़ जाता है. बतलादें आपको उल्काएं धूमकेतु के ही टुकड़े होते हैं जो अन्तरिक्ष में तैरते रहते हैं.

जब यह पृथ्वी के वायुमंडल में गुरुत्वबल के दखल से दाखिल होते हैं तब रात्रिकालीन आकाश में प्रकाश की एक चमकीली रेखा बन जाती है. अक्सर ये वायुमंडल के घर्षण बल से पूरी तरह जल जाते हैं. कभी कभार इनके अधजले, बिना जले अंश जब पृथ्वी पर आ धमकते हैं तब ये उल्का पिंड के रूप में पृथ्वी पर पहुँचते हैं. इसे ही कहते हैं उल्कापात. अक्सर इनका वेग पृथ्वी पर गिरते वक्त 30,000 किलोमीटर प्रतिघंटा तक होता है.

केन्द्रिय रूस के ऊपरी आकाश में शुक्रवार 15 फरवरी, 2013 को यही हुआ था. इस उल्कापात में तकरीबन हजार लोग ज़ख़्मी हो गए. प्रत्यक्षदर्शियों को लगा कोई हवाई जहाज आग पकड़ने के बाद तेज़ी से पृथ्वी की ओर गिर रहा है. नि:शब्द लेकिन तभी एक जोरदार धमाके ने सब को दहला दिया.

Chelyabinsk के उराल्स नगर का प्रात: कालीन ट्रेफिक देखते ही देखते रुक गया. माहिरों के अनुसार इस उल्कापात का ऐसटेरोइड (क्षुद्र ग्रह) 2012 DA14 से कोई लेना देना नहीं है जो पृथ्वी की कक्षा से शुक्रवार देर रात गए 27,000 किलोमीटर दूरी से गुजरा है. माहिरों के अनुसार तकरीबन 10 मीट्रिटन तौल वाले ऐसे उल्काओं का पृथ्वी पर गिरना एक आम घटना नहीं है बिरले ही ऐसा होता है.

एक अनुमान के अनुसार उल्कापात की चपेट में आकर 300 इमारतें ध्वस्त हो चुकीं हैं. Chelyabinsk के गवर्नर के सौजन्य से बतलाया गया है, चेब्राकुल नगर की सीमा के बाहर एक झील में यह उल्का पहुंची है. बर्फ से ज़मी इस झील में इससे 6 मीटर दायरे वाला गढ़ढा हो गया है. हर साल छोटे छोटे 5-10 उल्कापात पृथ्वी पर दर्ज़ होते हैं. कल जैसा अपेक्षाकृत बड़ा उल्कापात औसतन पांच सालों में एक ही बार होता है.

आखिरी बार ऐसा ही उल्कापात 2008 में हुआ था. पृथ्वी के वायुमंडल में दाखिल होने के बीस घंटा पूर्व ही इसे प्रेक्षण में ले लिया गया था. अब तक का सबसे बड़ा उल्कापात (उल्का विस्फोट) 1908 में रूस के साइबेरिया (Siberia) क्षेत्र के तुंगुस्का (Tunguska) में दर्ज़ हुआ था. इस विस्फोट में 8 करोड़ वृक्ष जड़ से उखड़ गए थे. पृथ्वी की कोख में एक विशाल गढ़ढा बन गया था जिसका इस्तेमाल अब रेडिओ दूरबीन (Reflecting type radio telescope) के रूप में किया जाता है.

उल्काएं अपने भीतर बेशकीमती धातुएं (शोध पिटारा) छिपाए रहतीं हैं इनकी रासायनिक बुनावट संरचना के अनुरूप इनके प्रत्येक ग्राम द्रव्यमान की कीमत $670 तक आंकी जाती है. माहिर अब ऐसे मौकों को मुल्तवी रखने की ताक में हैं जब कोई विशालकाय उल्का पिंड किसी नगर पर आ गिरे। मिसाइल दाग के इसे पृथ्वी की कक्षा से परे धकेला जा सकेगा समय रहते?

Keywords; russian meteor shower, meteor and meteorite, meteor explode, meteor explodes over russia, Chelyabinsk City, world largest meteor explodes, meteor explodes over siberia
जाने माने विज्ञान संचारक वीरेंद्र कुमार शर्मा जी की सधी लेखनी दे रही है ब्‍यौरा रूस में हुए भयानक उल्कापात का। वे बता रहे हैं कि कैसे ये उल्काएँ पथभ्रष्ट पुच्छल ताराओं के अवशेष भी हो सकते हैं! 

धूमकेतु (Comet) सूरज के नियतकालिक मेहमान होते हैं जो एक ख़ास अवधि के बाद सुदूर अन्तरिक्ष से (अक्सर मंगल और बृहस्पति के बीच से) मिलने आते हैं. सूरज के साथ हर भेंट में इनका 10% द्रव्यमान उड़ जाता है. बतलादें आपको उल्काएं धूमकेतु के ही टुकड़े होते हैं जो अन्तरिक्ष में तैरते रहते हैं.

जब यह पृथ्वी के वायुमंडल में गुरुत्वबल के दखल से दाखिल होते हैं तब रात्रिकालीन आकाश में प्रकाश की एक चमकीली रेखा बन जाती है. अक्सर ये वायुमंडल के घर्षण बल से पूरी तरह जल जाते हैं. कभी कभार इनके अधजले, बिना जले अंश जब पृथ्वी पर आ धमकते हैं तब ये उल्का पिंड के रूप में पृथ्वी पर पहुँचते हैं. इसे ही कहते हैं उल्कापात. अक्सर इनका वेग पृथ्वी पर गिरते वक्त 30,000 किलोमीटर प्रतिघंटा तक होता है.

केन्द्रिय रूस के ऊपरी आकाश में शुक्रवार 15 फरवरी, 2013 को यही हुआ था. इस उल्कापात में तकरीबन हजार लोग ज़ख़्मी हो गए. प्रत्यक्षदर्शियों को लगा कोई हवाई जहाज आग पकड़ने के बाद तेज़ी से पृथ्वी की ओर गिर रहा है. नि:शब्द लेकिन तभी एक जोरदार धमाके ने सब को दहला दिया.

Chelyabinsk के उराल्स नगर का प्रात: कालीन ट्रेफिक देखते ही देखते रुक गया. माहिरों के अनुसार इस उल्कापात का ऐसटेरोइड (क्षुद्र ग्रह) 2012 DA14 से कोई लेना देना नहीं है जो पृथ्वी की कक्षा से शुक्रवार देर रात गए 27,000 किलोमीटर दूरी से गुजरा है. माहिरों के अनुसार तकरीबन 10 मीट्रिटन तौल वाले ऐसे उल्काओं का पृथ्वी पर गिरना एक आम घटना नहीं है बिरले ही ऐसा होता है.

एक अनुमान के अनुसार उल्कापात की चपेट में आकर 300 इमारतें ध्वस्त हो चुकीं हैं. Chelyabinsk के गवर्नर के सौजन्य से बतलाया गया है, चेब्राकुल नगर की सीमा के बाहर एक झील में यह उल्का पहुंची है. बर्फ से ज़मी इस झील में इससे 6 मीटर दायरे वाला गढ़ढा हो गया है. हर साल छोटे छोटे 5-10 उल्कापात पृथ्वी पर दर्ज़ होते हैं. कल जैसा अपेक्षाकृत बड़ा उल्कापात औसतन पांच सालों में एक ही बार होता है.

आखिरी बार ऐसा ही उल्कापात 2008 में हुआ था. पृथ्वी के वायुमंडल में दाखिल होने के बीस घंटा पूर्व ही इसे प्रेक्षण में ले लिया गया था. अब तक का सबसे बड़ा उल्कापात (उल्का विस्फोट) 1908 में रूस के साइबेरिया (Siberia) क्षेत्र के तुंगुस्का (Tunguska) में दर्ज़ हुआ था. इस विस्फोट में 8 करोड़ वृक्ष जड़ से उखड़ गए थे. पृथ्वी की कोख में एक विशाल गढ़ढा बन गया था जिसका इस्तेमाल अब रेडिओ दूरबीन (Reflecting type radio telescope) के रूप में किया जाता है.

उल्काएं अपने भीतर बेशकीमती धातुएं (शोध पिटारा) छिपाए रहतीं हैं इनकी रासायनिक बुनावट संरचना के अनुरूप इनके प्रत्येक ग्राम द्रव्यमान की कीमत $670 तक आंकी जाती है. माहिर अब ऐसे मौकों को मुल्तवी रखने की ताक में हैं जब कोई विशालकाय उल्का पिंड किसी नगर पर आ गिरे। मिसाइल दाग के इसे पृथ्वी की कक्षा से परे धकेला जा सकेगा समय रहते?

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न्‍यूटन के लॉ ऑफ ग्रेविटेशन से सम्‍बंधित महत्‍वपूर्ण खोज।

अर्थ टाइड (Earth Tide) से सम्बंधित व्यापक आंकड़े जुटाने के बाद चीन के वैज्ञानिकों को ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जिनसे पुष्ट होता है कि गुरुत्वीय प्रभाव प्रकाश के कुदरती निर्वातीय वेग से ही आगे बढ़ते हैं. गुरुत्व बल ज्ञात बलों में सबसे कमज़ोर बल समझा जाता है दो कणों के बीच लेकिन जब बात नीहारिकाओं, अन्तरिक्ष के अन्य पिंडों के बीच लगने वाले इसी गुरुत्वीय प्रभाव की होती है तब यही बल पूरी कायनात को नचाने वाला प्रबल बल साबित होता है. 

साइंसदान बरसों से गुरुत्व तरंगों का वेग माप लेने की ताक में थे लेकिन अभी तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी थी कोई भरोसेमंद और मान्य तरीका हाथ नहीं आया था. विज्ञानी अब लगातार पूर्ण एवं वलयाकार सौर ग्रहणों (Annular solar eclipses) के छ: प्रेक्षण लेने के बाद, ज्वार-भाटा से जुटाए आंकड़ों के बाद उक्त नतीजों पे पहुंचे हैं. An annular solar eclipse is a solar eclipse in which all but the outermost rim of the sun is blocked by the moon, leaving a ring of sunlight visible round the moon. 

इसे वलयाकार सौर ग्रहण इसीलिए कहा जाता है क्योंकि पृथ्वी वासियों को इस अवधि में चन्द्र के गिर्द प्रकाश का एक घेरा दिखलाई देता है. सूरज की बाहरी परिधि को छोड़ शेष हिस्से को चाँद आच्छादित कर लेता है. चीनी विज्ञान अकादमी (chinese science academy) के तहत काम करने वाले भू एवं भू-भौतिकी संस्थान (department of geology and geophysics) के रिसर्चरों के अनुसार न्यूटन के अर्थ टाइड (earth tides) से सम्बन्धी सूत्र में एक घटक ग्रेविटी के संचरण से भी सबद्ध है. 'That the Newtonian Earth tide formula includes a factor related to the propagation of gravity, state-run Xinhua news agency reported. 

उक्त आंकड़ों के आधार पर ही शोधार्थियों की एक टीम ने चीनी भूकंप विद्या प्रशासन (Chinese earthquake administration) तथा यूनिवर्सिटी आफ दी CAS के साइंसदानों के साथ काम करते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि सूर्य से निसृत गुरुत्वीय बल (तरंगें) तथा पृथ्वी पर पहुंचे प्रभावों का वेग एक समान नहीं होता है. इसमें ठीक उतना ही अंतर रह जाता है जितना समय प्रकाश पृथ्वी पर सूरज से निकल कर पहुँचने में लगाता है. 

विशेष: न्यूटन ने गुरूत्‍वाकर्षण सम्बन्धी एक नियम दिया था- युनिवर्सल लॉ ऑफ़ ग्रेविटेशन (Universal law of gravitation) सार्वत्रिक गुर्त्वाकर्षण नियम. इसकी व्याख्या दो तरह से की गई है: (1) सृष्टि का हरेक कण/पिंड प्रत्येक दूसरे कण/पिंड पर एक बल डालता है. यानी पिंड अ पिंड ब पर बल डालेगा और ब पिंड अ पर. यानी एक पिंड दूसरे पिंड को आकर्षित भी कर रहा है उसके द्वारा आकर्षित भी हो रहा है. यह असर दूरगामी है अनंत  दूरी तक जाता है. यह पारस्परिक आकर्षण पार्टिकिल-पार्टिकिल इंटेरेकशन (Particle Particle Interaction) कहलाता है. 

इसी बात को यूं भी कहा जाता है. सृष्टि के हरेक पिंड के गिर्द एक गुर्त्वीय क्षेत्र (Gravitational Field) रहता है. यह गुरुत्वीय क्षेत्र ही दूसरे पिंड पर बल डालता है. यह एक दूसरे पर प्रभाव/अन्योन्य क्रिया फील्ड-पार्टिकिल इंटेरेकशन (Field Particle Interaction) कहलाता है. गुरुत्वीय प्रभाव शब्द प्रयोग अन्योन्य क्रिया ही है यहाँ परस्पर आश्रित. गुरुत्वीय बल तरंगें, गुरुत्वीय क्षेत्र का वेग, गुरुत्वीय प्रभाव प्रकाश के वेग से आगे बढ़ते हैं. यही इस रिपोर्ट का आशय रहा है. 

संदर्भ सामग्री: Gravity travels at speed of light? Proof found : Experts/Times of India, Mumbai Keywords: isaac Newton, universal law of gravitation, chinese science achievements, department of geology and geophysics, chinese science academy
अगर आपको 'साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन' का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।
अर्थ टाइड (Earth Tide) से सम्बंधित व्यापक आंकड़े जुटाने के बाद चीन के वैज्ञानिकों को ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जिनसे पुष्ट होता है कि गुरुत्वीय प्रभाव प्रकाश के कुदरती निर्वातीय वेग से ही आगे बढ़ते हैं. गुरुत्व बल ज्ञात बलों में सबसे कमज़ोर बल समझा जाता है दो कणों के बीच लेकिन जब बात नीहारिकाओं, अन्तरिक्ष के अन्य पिंडों के बीच लगने वाले इसी गुरुत्वीय प्रभाव की होती है तब यही बल पूरी कायनात को नचाने वाला प्रबल बल साबित होता है. 

साइंसदान बरसों से गुरुत्व तरंगों का वेग माप लेने की ताक में थे लेकिन अभी तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी थी कोई भरोसेमंद और मान्य तरीका हाथ नहीं आया था. विज्ञानी अब लगातार पूर्ण एवं वलयाकार सौर ग्रहणों (Annular solar eclipses) के छ: प्रेक्षण लेने के बाद, ज्वार-भाटा से जुटाए आंकड़ों के बाद उक्त नतीजों पे पहुंचे हैं. An annular solar eclipse is a solar eclipse in which all but the outermost rim of the sun is blocked by the moon, leaving a ring of sunlight visible round the moon. 

इसे वलयाकार सौर ग्रहण इसीलिए कहा जाता है क्योंकि पृथ्वी वासियों को इस अवधि में चन्द्र के गिर्द प्रकाश का एक घेरा दिखलाई देता है. सूरज की बाहरी परिधि को छोड़ शेष हिस्से को चाँद आच्छादित कर लेता है. चीनी विज्ञान अकादमी (chinese science academy) के तहत काम करने वाले भू एवं भू-भौतिकी संस्थान (department of geology and geophysics) के रिसर्चरों के अनुसार न्यूटन के अर्थ टाइड (earth tides) से सम्बन्धी सूत्र में एक घटक ग्रेविटी के संचरण से भी सबद्ध है. 'That the Newtonian Earth tide formula includes a factor related to the propagation of gravity, state-run Xinhua news agency reported. 

उक्त आंकड़ों के आधार पर ही शोधार्थियों की एक टीम ने चीनी भूकंप विद्या प्रशासन (Chinese earthquake administration) तथा यूनिवर्सिटी आफ दी CAS के साइंसदानों के साथ काम करते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि सूर्य से निसृत गुरुत्वीय बल (तरंगें) तथा पृथ्वी पर पहुंचे प्रभावों का वेग एक समान नहीं होता है. इसमें ठीक उतना ही अंतर रह जाता है जितना समय प्रकाश पृथ्वी पर सूरज से निकल कर पहुँचने में लगाता है. 

विशेष: न्यूटन ने गुरूत्‍वाकर्षण सम्बन्धी एक नियम दिया था- युनिवर्सल लॉ ऑफ़ ग्रेविटेशन (Universal law of gravitation) सार्वत्रिक गुर्त्वाकर्षण नियम. इसकी व्याख्या दो तरह से की गई है: (1) सृष्टि का हरेक कण/पिंड प्रत्येक दूसरे कण/पिंड पर एक बल डालता है. यानी पिंड अ पिंड ब पर बल डालेगा और ब पिंड अ पर. यानी एक पिंड दूसरे पिंड को आकर्षित भी कर रहा है उसके द्वारा आकर्षित भी हो रहा है. यह असर दूरगामी है अनंत  दूरी तक जाता है. यह पारस्परिक आकर्षण पार्टिकिल-पार्टिकिल इंटेरेकशन (Particle Particle Interaction) कहलाता है. 

इसी बात को यूं भी कहा जाता है. सृष्टि के हरेक पिंड के गिर्द एक गुर्त्वीय क्षेत्र (Gravitational Field) रहता है. यह गुरुत्वीय क्षेत्र ही दूसरे पिंड पर बल डालता है. यह एक दूसरे पर प्रभाव/अन्योन्य क्रिया फील्ड-पार्टिकिल इंटेरेकशन (Field Particle Interaction) कहलाता है. गुरुत्वीय प्रभाव शब्द प्रयोग अन्योन्य क्रिया ही है यहाँ परस्पर आश्रित. गुरुत्वीय बल तरंगें, गुरुत्वीय क्षेत्र का वेग, गुरुत्वीय प्रभाव प्रकाश के वेग से आगे बढ़ते हैं. यही इस रिपोर्ट का आशय रहा है. 

संदर्भ सामग्री: Gravity travels at speed of light? Proof found : Experts/Times of India, Mumbai Keywords: isaac Newton, universal law of gravitation, chinese science achievements, department of geology and geophysics, chinese science academy
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रोबोट रेस्टोरेंट (Robot Restaurant) में आपका स्वागत है!


अरे ओ छोटू !

हां चाचा !

कछू  सुनत रहो की नाय ?

का चाचा,  का भयो ?

हम सुनत रहे है कि हाल ही में चीन  में एक रोबोट रेस्टोरेंट खुला है जिसमे सभी काम रोबोट करते है !

बापू अगर आने वाले समय में हर क्षेत्र में  सभी काम रोबोट  करने लगे तो केवल रोबोट बनाने वालो को ही नौकरी मिला करेगी, पर बापू अभी वो दिन बहुत दूर है और हम भारतीय है जुगाड़ तकनीक हमेशा साथ लेकर चलते हैं इसलिए अभी इससे घबराना नहीं है।

हां बेटा ऐसा ही होगा !

हम  पुरुषों और महिलाओं के हाथ  का बना खाना तो रोज ही खाते है पर अगर आपको रोबोट के हाथ के बने खाने का स्वाद चखना है तो चाइना (China) चले जाइये. चाइना में  Heilongjiang province in China के सिटी Harbin  में ये रोबोट रेस्टोरेंट खुला है. जहा पर वेटर को टिप भी नहीं पड़ेगी।  यहाँ पर  पर 20 रोबोट काम करते हैं। यहाँ पर रिसेप्शनिस्ट से लेकर वेटर, कूक, इंटरट्रेनर का सभी काम रोबोट करते हैं. 

जैसे ही आप रेस्टोरेंट में प्रवेश करेंगे तो  रिसेप्शनिस्ट रोबोट (Receptionist Robot) अपना हाथ (Machenical Arm) आपकी ओर बढाकर आपका स्वागत करेगा और आपसे कहेगा "Earth Person, Hello, Welcome to Robot Restourent". उसके बाद आप मेनू में से अपना व्यंजन चुन कर अपना आर्डर दे सकते हैं। आपका आर्डर देते ही किचन में काम करने वाला  कुक रोबोट (Coock Robot) आपके द्वारा आर्डर किये व्यंजन को बनाना शुरू करेगा. और  उसके बनते ही वेटर रोबोट (Waiter Robot) उस व्यंजन को किचन से लेकर आपकी टेबल तक लायेगा. जैसे ही आप व्यंजन को खाना शुर करेंगे तभी एक इंटरट्रेनर रोबोट (Entertainer Robot) गाना सुनकर आपका मनोरंजन करेगा.  इस रेस्टोरेंट में रोबोट के चलने फिरने के लिए एक विशेष प्रकार के ट्रैक का उपयोग किया गया है जो कि रेस्टोरेंट के फर्श पर लगे हैं।


रेस्‍टोरेंट चीफ इंजिनियर "Lin Hasheng" के अनुसार इस रेस्टोरेंट को बनाने में USD 8 million का खर्च आया है. इन सभी रोबोट को मैनेज करने के लिए एक अलग से कंप्यूटर रूम है जिसमे पुरूष ओर महिला वर्ग के स्टाफ सदस्य इनको कंट्रोल करते है. अपने व्यस्त समय  के बाद खाली समय में इन रोबोट को विद्युत ऊर्जा मदद से चार्ज किया जाता है। एक रोबोट को 2 घंटे चार्ज करने के बाद उससे 5 घंटे तक काम लिया जा सकता है।

अब एक गंभीर सवाल ये है कि अगर आने वाले समय में सभी काम रोबोट करने लगेगे तो हम लोग क्या करेंगे? फिलहाल अभी वो दिन बहुत दूर है। रोबोट का उपयोग केवल कुछ सीमा में या जरूरत पड़ने होना चाहिए!

Keywords: Robot Restaurant, Receptionist Robot, Waiter Robot, Entertainer Robot, Coock Robot, Lin Hasheng
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अरे ओ छोटू !

हां चाचा !

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हम सुनत रहे है कि हाल ही में चीन  में एक रोबोट रेस्टोरेंट खुला है जिसमे सभी काम रोबोट करते है !

बापू अगर आने वाले समय में हर क्षेत्र में  सभी काम रोबोट  करने लगे तो केवल रोबोट बनाने वालो को ही नौकरी मिला करेगी, पर बापू अभी वो दिन बहुत दूर है और हम भारतीय है जुगाड़ तकनीक हमेशा साथ लेकर चलते हैं इसलिए अभी इससे घबराना नहीं है।

हां बेटा ऐसा ही होगा !

हम  पुरुषों और महिलाओं के हाथ  का बना खाना तो रोज ही खाते है पर अगर आपको रोबोट के हाथ के बने खाने का स्वाद चखना है तो चाइना (China) चले जाइये. चाइना में  Heilongjiang province in China के सिटी Harbin  में ये रोबोट रेस्टोरेंट खुला है. जहा पर वेटर को टिप भी नहीं पड़ेगी।  यहाँ पर  पर 20 रोबोट काम करते हैं। यहाँ पर रिसेप्शनिस्ट से लेकर वेटर, कूक, इंटरट्रेनर का सभी काम रोबोट करते हैं. 

जैसे ही आप रेस्टोरेंट में प्रवेश करेंगे तो  रिसेप्शनिस्ट रोबोट (Receptionist Robot) अपना हाथ (Machenical Arm) आपकी ओर बढाकर आपका स्वागत करेगा और आपसे कहेगा "Earth Person, Hello, Welcome to Robot Restourent". उसके बाद आप मेनू में से अपना व्यंजन चुन कर अपना आर्डर दे सकते हैं। आपका आर्डर देते ही किचन में काम करने वाला  कुक रोबोट (Coock Robot) आपके द्वारा आर्डर किये व्यंजन को बनाना शुरू करेगा. और  उसके बनते ही वेटर रोबोट (Waiter Robot) उस व्यंजन को किचन से लेकर आपकी टेबल तक लायेगा. जैसे ही आप व्यंजन को खाना शुर करेंगे तभी एक इंटरट्रेनर रोबोट (Entertainer Robot) गाना सुनकर आपका मनोरंजन करेगा.  इस रेस्टोरेंट में रोबोट के चलने फिरने के लिए एक विशेष प्रकार के ट्रैक का उपयोग किया गया है जो कि रेस्टोरेंट के फर्श पर लगे हैं।


रेस्‍टोरेंट चीफ इंजिनियर "Lin Hasheng" के अनुसार इस रेस्टोरेंट को बनाने में USD 8 million का खर्च आया है. इन सभी रोबोट को मैनेज करने के लिए एक अलग से कंप्यूटर रूम है जिसमे पुरूष ओर महिला वर्ग के स्टाफ सदस्य इनको कंट्रोल करते है. अपने व्यस्त समय  के बाद खाली समय में इन रोबोट को विद्युत ऊर्जा मदद से चार्ज किया जाता है। एक रोबोट को 2 घंटे चार्ज करने के बाद उससे 5 घंटे तक काम लिया जा सकता है।

अब एक गंभीर सवाल ये है कि अगर आने वाले समय में सभी काम रोबोट करने लगेगे तो हम लोग क्या करेंगे? फिलहाल अभी वो दिन बहुत दूर है। रोबोट का उपयोग केवल कुछ सीमा में या जरूरत पड़ने होना चाहिए!

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